Jan Gan Man: SC ST Reservation में Creamy Layer का सवाल फिर Supreme Court के दरवाजे पर पहुँचा

By नीरज कुमार दुबे | Jan 13, 2026

सुप्रीम कोर्ट ने उस जनहित याचिका पर सुनवाई के लिए सहमति जताई है, जिसमें अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के आरक्षण से क्रीमी लेयर को बाहर करने की मांग की गई है। अदालत ने केंद्र सरकार और सभी राज्य सरकारों से इस विषय पर जवाब मांगा है। इसका अर्थ यह है कि अब यह प्रश्न संवैधानिक जांच के दायरे में आ चुका है। हम आपको बता दें कि उच्चतम न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता अश्विनी उपाध्याय द्वारा दाखिल याचिका का मूल तर्क यह है कि SC और ST समुदायों के भीतर भी अब एक ऐसा वर्ग उभर आया है, जो सामाजिक और आर्थिक रूप से अपेक्षाकृत मजबूत हो चुका है। सरकारी नौकरियों, उच्च शिक्षा और सत्ता के ढांचों में यही वर्ग बार बार आरक्षण का लाभ उठा रहा है, जबकि वास्तव में हाशिये पर खड़े लोग पीछे छूट जाते हैं। याचिकाकर्ता अश्विनी उपाध्याय का कहना है कि आरक्षण का उद्देश्य पीढ़ी दर पीढ़ी लाभ पहुंचाना नहीं था, बल्कि सामाजिक अन्याय से उबारना था। अगर कोई परिवार पहले ही इस अन्याय से काफी हद तक मुक्त हो चुका है, तो उसे उसी श्रेणी में बनाए रखना न्याय के साथ समझौता है।

इसे भी पढ़ें: एक जमानत पर सुप्रीम कोर्ट का निर्णय और देश विरोधी गैंग सक्रिय

दूसरी ओर, इस याचिका के सामने आते ही इसके विरोध और समर्थन में बयान आने शुरू हो गए हैं। एक पक्ष का मानना है कि आर्थिक या पदगत उन्नति के बावजूद सामाजिक भेदभाव समाप्त नहीं हुआ है। आज भी भेदभाव, अपमान और बहिष्कार की घटनाएं सामने आती हैं। ऐसे में केवल आय या पद के आधार पर किसी को क्रीमी लेयर में डाल देना सामाजिक सच्चाई को नजरअंदाज करना होगा। उनका कहना है कि SC और ST का आरक्षण केवल गरीबी नहीं, बल्कि ऐतिहासिक उत्पीड़न का प्रतिकार है।

हालांकि यह भी एक कड़वा सच है कि आरक्षण का लाभ कई बार एक सीमित वर्ग तक सिमट कर रह गया है। गांवों और दूरदराज के इलाकों में रहने वाले सबसे कमजोर परिवार अब भी शिक्षा और अवसर से दूर हैं। उनके लिए आरक्षण एक कागजी वादा बनता जा रहा है। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या व्यवस्था को अधिक लक्षित और न्यायपूर्ण बनाने का समय नहीं आ गया?

देखा जाये तो अब यह मामला केवल अदालत के फैसले तक सीमित नहीं रह सकता। इसका असर राजनीति, समाज और नीति निर्माण पर पड़ेगा। अगर क्रीमी लेयर की अवधारणा को SC और ST आरक्षण में लागू किया जाता है, तो यह एक बड़ा बदलाव होगा। यह बदलाव संवेदनशील भी होगा और विवादास्पद भी, क्योंकि इससे समुदाय के भीतर नई रेखाएं खिंच सकती हैं।

कुल मिलाकर देखें तो यह बहस टालने की नहीं, बल्कि परिपक्वता से संभालने की है। आरक्षण अगर अपने मूल उद्देश्य से भटक रहा है, तो उस पर सवाल उठना लोकतंत्र की ताकत है। साथ ही यह भी जरूरी है कि सुधार के नाम पर किसी भी समुदाय की पीड़ा और ऐतिहासिक अनुभव को हल्के में न लिया जाए। संतुलन यही है कि सबसे कमजोर को प्राथमिकता मिले।

प्रमुख खबरें

Women Health: क्या प्रेग्नेंसी वाला Sugar, Delivery के बाद भी बना रहता है? जानें पूरा सच

Ram Navami पर PM Modi का राष्ट्र के नाम संदेश, प्रभु राम के आशीर्वाद से पूरा होगा Viksit Bharat का संकल्प

Donald Trump का सनसनीखेज दावा, Iran ने दिया था Supreme Leader बनने का Offer!

Bengal में किसकी सरकार? Pre-Poll Survey ने खोला राज, TMC और BJP की सीटों का पूरा गणित