अरविंद केजरीवाल की गिरफ्तारी से उपजते सवाल

By कमलेश पांडे | Mar 22, 2024

आबकारी नीति घोटाले में दिल्ली के मुख्यमंत्री और आप सुप्रीमो अरविंद केजरीवाल को गिरफ्तार किया जाना सही है या गलत- यह प्रशासनिक और न्यायिक विमर्श का विषय है। लेकिन आम चुनाव 2024 के ठीक पहले और देश में आदर्श चुनाव आचार संहिता लागू होने के तत्काल बाद जिस तरह से उन्हें गिरफ्तार किया गया, यह भारतीय लोकतंत्र और सियासत के लिए कोई शुभ संकेत नहीं है!

वहीं, जगह जगह सक्षम माननीय न्यायालय को पत्र भेजकर उसकी प्रतिलिपि सोशल मीडिया पर पोस्ट की जाए और स्थानीय मीडिया को भेजी जाए, ताकि भ्रष्टाचार विरोधी जनजागृति पैदा हो सके। वैसे तो लोकल मीडिया में ऐसे प्रकरण हमेशा प्रकाश में आते रहते हैं, लेकिन उनपर प्रशासनिक खामोशी के खिलाफ न्यायालय जाने के कम ही मामले प्रकाश में आते हैं। शायद इसलिए कि भ्रष्टाचार के हमाम में कहीं न कहीं हर कोई नँगा है।

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अमूमन विपक्षी दल भी ऐसे मामलों में धरना-प्रदर्शन के अलावा ज्यादा दूरदर्शी रवैये नहीं अपनाते, जिसके चलते ठोस कार्रवाई नहीं हो पाती। इससे जनता अक्सर परेशान रहा करती है। इसलिए भ्रष्टाचार का पुरजोर विरोध करना जरूरी है ताकि सत्ता पक्ष के इशारे पर पक्षपात पूर्ण कार्रवाई करने वाले भारतीय प्रशासन को चुनावों में बेनकाब करते हुए जनादेश मांगा जाए।

आपको याद होगा कि अरविंद केजरीवाल और आप पार्टी का जन्म यूपीए सरकार के दूसरे कार्यकाल में चले एक भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन की कोख से ही हुआ है। ऐसे में आबकारी नीति घोटाले में आप मुखिया और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की गिरफ्तारी अपने आपमें एक यक्ष प्रश्न है। वह यह कि भारतीय सियासत वह काजल की कोठरी है, जहां से बेदाग निकलना नामुमकिन है। क्योंकि दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के पास तो कोई विभाग भी नहीं था, फिर भी वो फंस गए।

इस बात में कोई दो राय नहीं कि भ्रष्टाचार के मामले में भारतीय प्रशासन द्वारा जो पीक एंड चूज कार्रवाई की जाती है, वह भारतीय संवैधानिक व्यवस्था के लिए किसी अभिशाप से कम नहीं है। चाहे न्यायपालिका हो या मीडिया, प्रशासनिक तिकड़म को समझने में प्रायः विफल प्रतीत हुए हैं! रही बात विधायिका की तो प्रशासनिक अधिकारियों को इस तरह की मनमानी करने की छूट देने के लिए सत्ता पक्ष के साथ-साथ विपक्ष भी कम जिम्मेदार नहीं है। क्योंकि जिन कानूनों के आधार पर ऐसी कार्रवाईयां होती आईं हैं, उसे अंतिम रूप तो आखिर संसद या विधान मंडलों में ही दी जाती है।

सच कहूं तो देश में भ्रष्टाचार 'हरि अनंत, हरि कथा अनंता' की तरह सर्वव्यापी है। प्रशासनिक और पुलिस अधिकारियों की समझदारी या मिलीभगत से सही को गलत और गलत को सही ठहराने के बहुतेरे उदाहरण हर किसी को उसके आसपास में ही मिल जाएंगे। बावजूद इसके भ्रष्टाचार रोकने के लिए प्रशासनिक तिकड़म जारी रहती है। उसने अरविंद केजरीवाल को भ्रष्टाचारियों की कतार में खड़ा करके इस बात के संकेत दे दिए हैं कि 'भ्रष्टाचार' को 'शिष्टाचार' के इतर तरह तरह से परिभाषित करने का खेल न कभी चला है और न ही चलने दिया जाएगा। इसकी सूची में बलि का बकरा अक्सर राजनेता बनेंगे, जबकि उनसे जुड़े अधिकारियों की भी गिरफ्तारी साथ साथ होनी चाहिए। क्योंकि 'पवित्र पाप' यानी भ्रष्टाचार कोई भी राजनेता अकेला नहीं कर सकता, जब तक कि अधिकारियों का एक सलाहकार वर्ग या जिम्मेदार वर्ग उनसे मिला हुआ न हो।

यह ठीक है कि आप नेता अरविंद केजरीवाल को अब प्रमुख विपक्षी दलों का साथ मिल गया है, जिससे उनकी परेशानी कुछ कम होगी। लेकिन केंद्र में सत्तारूढ़ भाजपा को इससे लेने के देने भी पड़ सकते हैं। क्योंकि अरविंद केजरीवाल का आजतक का इतिहास यही रहा है कि अपने विरुद्ध पैदा किए हुए हर मुद्दे का सियासी लाभ अंततोगत्वा उन्होंने ही उठाया है। इस बार भी वो यही करेंगे! हो सकता है कि दो राज्यों में अपनी सरकार बनाने वाली पहली विपक्षी पार्टी आप, जिसे अब राष्ट्रीय पार्टी का भी दर्जा मिल चुका है, अपने मिशन 2024 के तहत अपना देशव्यापी विस्तार कर ले और अपने सांसदों की संख्या 2 अंकों में लेते आये। यदि ऐसा होता है तो यह उसकी बड़ी उपलब्धि होगी।

आपको पता होना चाहिए कि अरविंद केजरीवाल एकदम हठी राजनेता है। वो गिरफ्तार हो गए, लेकिन त्यागपत्र नहीं दिया। इससे मुख्यमंत्री रहते हुए गिरफ्तार होने वाले वो पहले राजनेता बन गए। आगे भी वो कोई बड़ा गुल अवश्य खिलाएंगे। आप नेता सत्येंद्र जैन, मनीष सिसोदिया, संजय सिंह के बाद अरविंद केजरीवाल की गिरफ्तारी से इस बात को बल मिलता है कि 'आप' नेताओं की अग्रिम पंक्ति को ईडी ने लगभग खाली कर दिया। हालांकि, उसकी दूसरी पंक्ति के नेता आपस में कितना सामंजस्य बिठाकर अगली रणनीति बनाएंगे, सारी भावी सफलता इस बात पर ही निर्भर करेगी।

- कमलेश पांडेय

वरिष्ठ पत्रकार व स्तम्भकार

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