संयुक्त राष्ट्र संघ की प्रासंगिकता पर उठते सवाल

By डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा | Sep 22, 2026

अमेरिका-ईरान युद्ध हो या फिर रुस यूक्रेन युद्ध और इसी तरह दुनिया के देशों के सामने आ रही गंभीर समस्याओं के चलते संयुक्त राष्ट्र संघ की प्रासंगिकता पर सवाल उठने लगे हैं। अमेरिका-ईरान युद्ध के चलते आज दुनिया के देश ईंधन की समस्या से दो चार हो रहे हैं। शक्तिशाली देशों के दादागिरी चरम पर पहुंचती जा रही है। आज हार्मुज का रास्ता बंद है तो अन्य वैकल्पिक रास्तों पर भी अवरोध आ रहे हैं। दुनिया के अन्य देशों की समस्याओं के प्रति कोई गंभीर नहीं है। पेट्रोल पदार्थों और एलपीजी की आवाजाही प्रभावित होने से ईंधन के भावों में बेतहासा बढ़ोतरी हो रही है। ऊर्जा संकट हो रहा है। आवागमन के साधनों का प्रमुख माध्यम पेट्रोल-डीजल आदि है और उनकी उपलब्धता पर पड़ रहे असर के कारण सभी देशों में सीधे आमजन प्रभावित हो रहे हैं। आखिर ऐसे समय में ही संयुक्त राष्ट्र संघ जैसी संस्थाओं की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। पर जो तस्वीर सामने आ रही हैं वह साफ है कि युद्ध करने वाले देशों पर दबाव ड़ालने की स्थिति में ना तो कोई वैश्विक संस्था रह गई है और ना ही कोई सर्वमान्य वैश्विक नेता। आखिर यह कोई एक दिन का पराभव तो नहीं हैं बल्कि देखा जाएं तो संयुक्त राष्ट्र को तो योजनाबद्ध तरीके से शक्तिहीन किया गया है। अमेरिका जैसे देशों द्वारा बिना बजह फण्डिंग बाधित या कम की जाती है तो वीटो पॉवर स्वयं में नकारात्मक भूमिका में है। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में नए सदस्यों के प्रवेश को टाला जा रहा है तो इसे पंगु बनाने में कोई कमी नहीं छोड़ी जा रही है।

इसे भी पढ़ें: Imran Khan की पार्टी के कार्यकर्ताओं की हड्डी-पसली तोड़ने की तैयारी! Pakistan में बड़ी संख्या में लोगों के घायल होने की संभावना के चलते खाली कराये जा रहे अस्पताल

सौ टके का सवाल यह है कि आज यूएन दुनिया के देशों के बीच संघर्ष या तनाव कम करने में निर्णायक भूमिका नहीं निभा पा रहा है। अमेरिका-ईरान या रुस-यूक्रेन युद्ध सबके सामने है। यह कोई दो देशों के बीच युद्ध नहीं है अपितु इन युद्धों की आंच दुनिया के अधिकांश देशों पर किसी ना किसी रुप में पहुंच रही है। आज वर्चस्व सिद्ध करने या दादागिरी ही एक मात्र ध्येय रह गया है। पर रुस और अमेरिका अभी भी यह नहीं समझ पा रहे कि युद्धारंभ से पहले चंद घंटों या चंद दिनों का युद्ध समझ कर जोश में आ गए थे आज हालात उनके लिए ना निगलते बन रही हैं और ना ही निगलते बन रही है। इन युद्धों ने यह भी सिद्ध कर दिया है कि सामने वाला देश कितना भी छोटा क्यों ना हो पर युद्ध को लंबा किसनी की क्षमता उसमें हैं। अमेरिका इजरायल ने जब ईरान पर आक्रमण किया तब उन्होंने बहुत गाल बजाएं थे पर आज जो हालात है वह सबके सामने हैं। यही रुस यूक्रेन की बात है चंद दिनों का युद्ध कब सालों लंबा युद्ध होता जा रहा है यह सबके सामने हैं। आज संयुक्त राष्ट्र संघ प्रभावी या कारगर होता तो हालात इतने खराब नहीं होते। आज संयुक्त राष्ट्र संघ नख-दंत विहीन संस्था रह गया है।

अमेरिका सहित विकसित देश फण्डिंग में कमी कर देते हैं या रोक देते हें तो यूएन अपने आप में इतना सक्षम नहीं है कि देशों पर दबाव बना सके। सुरक्षा परिषद का वीटो का अधिकार भी एक प्रमुख बाधा ही है। सुरक्षा परिषद में भारत के प्रवेश को लंबे समय से रोका जा रहा है। नए सदस्य किसी को स्वीकार ही नहीं हो रहे।

एक बात साफ हो जानी चाहिए कि संयुक्त राष्ट्र संघ का गठन एक सकारात्मक संदेश के साथ हुआ था। समय आ गया है जब दुनिया के देशों को संयुक्त राष्ट्र् संघ की भूमिका नए सीरे से तय करनी होगी। यूएन को दिखावटी संस्था के स्थान पर अधिकारपूर्ण और निर्णय क्षमता युक्त संस्था बनानी होगी। लोगों में विश्वास बनाना होगा कि यूएन केवल संस्था नहीं अपितु वह अपने दायित्वों को पूरा करने और दादागिरी करने वाले देशों पर लगाम लगाने की स्थिति में हो या ना हो पर एक ऐसा भ्रम तो पैदा करने की स्थिति में हो ताकि शक्तिशाली देशों की मोनोपोली को सीमित किया जा सके।  

- डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा

प्रमुख खबरें

7 दिन में खोल देंगे होर्मुज, लेकिन...ईरान ने अमेरिका के सामने रख दी कौन सी शर्त! क्या ट्रंप होंगे राजी?

Asian Games में महिला Cricket टीम ने जीता गोल्ड, पुरुष बैडमिंटन और वुशु में पदक पक्के

Srihari Nataraj पहुंचे Asian Games फाइनल में, Sepaktakraw में Japan ने भारत को हराया

Skin Care: ब्यूटीफुल स्किन के लिए नारियल तेल लगाएं या बादाम तेल? जानिए किसका असर बेहतर