मशहूर शायर और गीतकार के साथ प्रसिद्ध चित्रकार भी थे राहत इंदौरी

By अमृता गोस्वामी | Aug 12, 2020

‘ये हादसा तो किसी दिन गुजरने वाला था

शायर राहत इंदौरी आज हमारे बीच नहीं रहे, दुनिया भर में मशहूर शायर राहत इंदौरी का आज 11 अगस्त 2020 को 70 साल की उम्र में दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया और अपने लाखों चाहने वालों को आज अचानक वह अलविदा कह गए।

देश के हर दिल अजीज मशहूर शायर राहत इंदौरी साहब का पूरा नाम राहत उल्ला कुरैशी था, गीत-गजल और शायरी की दुनिया में उन्हे ‘राहत इंदौरी’ के नाम से जाना गया। 

राहत इंदौरी का जन्म 1 जनवरी 1950 को मध्यप्रदेश के इंदौर जिले में हुआ था, इनके पिता का नाम रफ्तुल्लाह कुरैशी था जो एक कपड़ा मिल में कर्मचारी थे, इनकी माता का नाम मकबूल उन्निसा बेगम था। शेरो-शायरी में बेतहाशा शोहरत हासिल करने वाले राहत इंदौरी बचपन से ही चित्रकारी में भी रूचि रखते थे। परिवार की आर्थिक स्थिति ठीक न होने की वजह से महज 10 साल की उम्र में राहत साहब ने एक साइन-चित्रकार के रूप में प्रोफेशनल कार्य किया और थोड़े ही समय में वे इंदौर के नामी साइनबोर्ड चित्रकार के रूप में जाने गए। साइनबोर्ड चित्रकारी के अलावा राहत इंदौरी ने पुस्तकों के कवर डिजाइन और बॉलीवुड फिल्मों के पोस्टर और बैनर भी बनाए। 

प्रारंभिक शिक्षा राहत साहब की इंदौर के नूतन स्कूल में हुई फिर इस्लामिया करीमिया कॉलेज इंदौर से इन्होंने 1973 में स्नातक और 1975 में भोपाल के बरकत उल्लाह विश्वविद्यालय से उर्दू साहित्य में स्नातकोत्तर की डिग्री हासिल की। पढ़ाई में उनकी योग्यता सराहनीय थी, स्नातकोत्तर के बाद 1985 में उन्होंने मध्य प्रदेश में भोज (मुक्त) विश्वविद्यालय, भोपाल से उर्दू साहित्य में पीएचडी की और उर्दू साहित्य के प्रोफेसर के रूप में अध्यापन तो किया ही, इनके मार्गदर्शन में कई छात्रों ने पीएचडी भी की।  

राहत इंदौरी ने दो शादियां कीं उनकी पत्नियां अंजुम रहबर और सीमा राहत हैं तथा बेटों के नाम फैसल राहत, सतलज़ राहत और बेटी का नाम शिब्ली है।

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कविताओं और शायरियां लिखने का शौक रखने वाले राहत इंदौरी शुरूआती दौर में अपने दोस्तों को शायरियां लिखकर सुनाया करते थे। एक बार इंदौर के एक मुशायरे में बड़े-बड़े शायर आए थे, राहत इंदौरी भी इस मुशायरे में श्रोता के रूप में मौजूद थे, वहां वे एक बड़े शायर के पास डरते-डरते पहुंचे, उनसे ऑटोग्राफ मांगा और पूछा कि सर, मैं भी शायर बनना चाहता हूं, मुझे क्या करना होगा। उस बड़े शायर ने जवाब दिया कि पहले तो आप 5 हजार शेर याद कीजिए फिर शायर बनने की दिशा में आगे बढ़ना। राहत इंदौरी ने कहा- बस इतना ही, मुझे तो इससे भी ज्यादा शेर जब़ानी याद हैं। शायर ने कहा तो देर किस बात की शुरू हो जाइए। 

बस फिर क्या था राहत ने भी शायरी शुरू कर दी और शायरी की दुनिया में अपनी एक अलग पहचान बनाई। राहत इंदौरी की शायरी की एक खास शैली थी।

रोजा तो नहीं रखता मगर अफ्तारी समझता है, जैसे मशहूर शेर लिखने वाले राहत इंदौरी ने 19 वर्ष की उम्र में 1972 में, इंदौर में अपनी पहली कविता को सार्वजनिक रूप से पढ़ा, उसके बाद वे लगातार लगभग पांच दशक तक कवि सम्मेलनों में अपनी शायरी से अपने प्रशंसकों के बीच वाहवाही बटोरते रहे। अपनी अधिकतर शायरियां राहत ने सियासत और मोहब्बत पर कीं। राहत की शायरियों के साथ ही उनकी बुलंद आवाज और शायरी पढ़ने के उनके निराले अंदाज को दुनिया भर में पसंद किया गया।

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भारत के अलावा राहत इंदौरी की शायरियों को उनके कवि सम्मेलनों में विदेशों अमरीका, ब्रिटेन, कनाडा, सिंगापुर, मॉरीशस, कुवैत, बहरीन, ओमान, पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल इत्यादि में बहुत पसंद किया गया।   

शेरो-शायरी के साथ ही राहत इंदौरी ने फिल्मों में कई गीत भी लिखे जो खासे हिट हुए, फिल्मों में उनके लिखे गीत ‘तुमसा कोई प्यारा कोई मासूम नहीं है’, ‘दिल को हजार बार रोका’, ‘चोरी-चोरी जब नजरे मिलीं’ देखो-देखो जानम हम दिल अपना तेरे लिए लाए, एम बोले तो मैं मास्टर, नींद चुरायी मेरी किसने ओ सनम,. इत्यादि हैं। 

आइए याद करते हैं राहत इंदौरी जी को, उनके फेमस शेयरों से-

पहले दीप जलें तो चर्चे होते थे

और अब शहर जलें तो हैरत नहीं होती।

 

आंखों में पानी रखो होंठों पर चिंगारी रखो

जिंदा रहना है तो तरकीबें बहुत सारी रखो।

 

ऐसी सर्दी है कि सूरज भी दुहाई मांगे 

जो हो परदेस में वो किससे रजाई मांगे। 

 

शाम के बाद जब तुम सहर देख लो 

कुछ फकीरों को खाना खिलाया करो 

 

अपने सीने में दो गज जमीं बांधकर 

आसमानों का जर्फ आजमाया करो।

 

चांद सूरज कहां, अपनी मंजिल कहां

ऐसे वैसों को मुंह मत लगाया करो।

 

अब असद तुम्हारे लिये कुछ नहीं रहा

गलियों के सारे संग तो सौदाई ले गया।

  

उंगलियां यूं न सब पर उठाया करो

खर्च करने से पहले कमाया करो।

 

जिन्दगी क्या है खुद ही समझ जाओगे

बारिशों में पतंगें उड़ाया करो।

 

आग में फूलने-फलने का हुनर जानते हैं

न बुझा हमको के जलने का हुनर जानते हैं।

 

लोग हर मोड़ पे रुक रुक के संभलते क्यूं हैं

इतना डरते हैं तो फिर घर से निकलते क्यूं हैं।

 

अगर खिलाफ हैं होने दो जान थोड़ी है

ये सब धुआँ है कोई आसमान थोड़ी है। 

 

लगेगी आग तो आएँगे घर कई जद में

यहाँ पे सिर्फ हमारा मकान थोड़ी है। 

 

सभी का खून है शामिल यहाँ की मिट्टी में

किसी के बाप का हिन्दोस्तान थोड़ी है।

अमृता गोस्वामी

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