By प्रभासाक्षी न्यूज़ डेस्क | Aug 02, 2026
नयी दिल्ली, दो अगस्त ‘‘मैं समय हूं। मैं कभी रुकता नहीं, मैं हमेशा आगे बढ़ता रहता हूं।’’ दूरदर्शन के चर्चित धारावाहिक ‘महाभारत’ के लिए राही मासूम रजा की लिखी इन शुरुआती पंक्तियों की गूंज शनिवार को अंजुमन तरक्की उर्दू (हिंद) के सभागार में सुनाई दी। यह आयोजन रजा की रचनात्मक विरासत, उनकी अनूठी और धर्मनिरपेक्ष विचारधारा को याद करते हुए उनके जन्मशती वर्ष समारोह की शुरुआत के लिए किया गया।
उसने कहा कि अब तक व्यापक रूप से माना जाता रहा है कि उनका जन्म एक सितंबर 1927 को हुआ था। अंजुमन तरक्की उर्दू (हिंद) महासचिव अतहर फारूकी ने एक बयान में कहा, ‘‘समारोह की शुरुआत जानबूझकर एक अगस्त से की गई है, क्योंकि यही राही मासूम रजा की वास्तविक जन्मतिथि है। अज्ञात कारणों से लंबे समय तक यह गलत धारणा बनी रही कि उनका जन्म एक सितंबर को हुआ था।
इस भूल को सुधारना ही जन्मशती वर्ष की सार्थक शुरुआत है।’’ वर्ष 1988 में प्रसारित धारावाहिक ‘महाभारत’ के संवाद लेखन के लिए प्रसिद्ध रजा का पहला उपन्यास ‘आधा गांव’ भारतीय साहित्य में उनकी मजबूत पहचान का आधार बना। जन्मशती समारोह के प्रमुख कार्यक्रमों में ‘आधा गांव’ का उसकी मूल उर्दू लिपि में प्रकाशन शामिल है। यह उपन्यास पहली बार 1966 में हिंदी में प्रकाशित हुआ था।
फारूकी ने कहा, ‘‘‘आधा गांव’ का मूल उर्दू पाठ राही की उनकी हस्तलिपि में अंजुमन के अभिलेखागार तक पहुंचा। यह पांडुलिपि परिवार ने सुरक्षित रखी थी और इससे एक बड़े अकादमिक प्रयास की शुरुआत हुई।’’ उन्होंने कहा कि उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले के गंगौली गांव की पृष्ठभूमि पर आधारित और विभाजन के दौर में शिया मुस्लिम जमींदार परिवारों के जीवन को चित्रित करने वाला यह उपन्यास खड़ी बोली के साहित्यिक इतिहास में उर्दू लिपि के स्थान पर नई चर्चा शुरू करने का अवसर देगा। कार्यक्रम में कांग्रेस नेता और संस्था के आजीवन न्यासी सलमान खुर्शीद ने कहा कि रजा की रचनाओं का उर्दू में प्रकाशन केवल लेखक के साथ ही नहीं, बल्कि उस साझा सांस्कृतिक विरासत के साथ भी न्याय करेगा, जिसका चित्रण उन्होंने अपनी रचनाओं में किया है।
उन्होंने कहा, ‘‘लंबे समय से मुझे लगता रहा है कि हम अपनी गंगा-जमुनी संस्कृति और स्वाभाविक रूप से राही मासूम रजा के साथ न्याय नहीं कर पाए। आज उसे सुधारने का प्रयास सफल होता दिखाई दे रहा है।’’ उन्होंने कहा कि जन्मशती वर्ष के दौरान होने वाले कार्यक्रम गंगा-जमुनी तहजीब की भावना को और मजबूत करेंगे। इस अवसर पर पूर्व लोकसभा सदस्य सुभाषिनी अली, प्रोफेसर हरीश त्रिवेदी, विभूति नारायण राय, प्रोफेसर शफी किदवई, प्रोफेसर आसिम सिद्दीकी और प्रोफेसर मोहम्मद सज्जाद भी मौजूद थे।
भारतीय प्रशानिक सेवा के पूर्व अधिकारी और लेखक तथा कुंवरपाल सिंह और कमलेश्वर जैसे हिंदी एवं उर्दू के प्रतिष्ठित साहित्यकारों के करीबी सहयोगी रहे विभूति नारायण राय ने कहा कि राही मासूम रजा को ‘आधा गांव’ का उर्दू में प्रकाशन कराने के लिए काफी संघर्ष करना पड़ा था। राय ने कहा कि इसकी वजह उपन्यास की थी। ‘आधा गांव’ में भोजपुरी का प्रभाव है और इसमें बोलचाल की के ऐसे शब्द भी हैं जिन्हें उर्दू प्रकाशक स्वीकार करने में हिचकते थे।
उन्होंने कहा, ‘‘एक बार मैंने पांडुलिपि एक प्रकाशक को भेजी तो उसने उसमें से सभी अपशब्द हटा दिए। इससे कुंवरपाल सिंह बहुत नाराज हुए।’’ उन्होंने बताया कि बाद में कुंवरपाल सिंह ने रजा के साथ बैठकर पूरी पुस्तक का अनुवाद किया, जिसके प्रूफ स्वयं रजा ने देखे। उन्होंने बताया कि इसके बाद अक्षर प्रकाशन ने 1966 में इसे हिंदी में प्रकाशित किया।