Yes Milord: ₹10 के लिए गई Railway Job हाईकोर्ट के फैसले से वापस तो मिल गई, 25 सालों में जो कुछ खोया है उसे वापस कैसे लौटाएंगे?

By अभिनय आकाश | Apr 18, 2026

10 रुपए का सिक्का है आज के टाइम में किसी मेट्रो सिटी में अगर आप यह किसी भिखारी को दे दे तो वो भी देखकर उतना खुश नहीं होता। 10 रुपए में पहली बहुत सारी चीजें आ जाया करती थी। मगर अब 10 रुपए वाली बिस्किट के लिए भी पूछना पड़ता है कि 10 रुपए वाली बिस्किट कितने की है? 10 रुपए की कीमत अभी कितनी है? इसका अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि इन दोनों मार्केट में 20 रुपए का सिक्का भी कितना चलन में आ गया है। यह हो गई हमारे आपके लिए ₹10 की वैल्यू। मगर किसी के लिए इसी 10 रुपए की वैल्यू एक सरकारी नौकरी में 20 साल से ज्यादा की बर्खास्तगी 25 साल कोर्ट कचहरी के चक्कर और मान सम्मान की लड़ाई के बराबर है। एक व्यक्ति जिसकी नौकरी इसी ₹10 ने खा ली और 25 साल बाद सारा मामला झूठा निकला। यह केस एक मामूली रेलवे क्लर्क का है। रेलवे में नारायण टिकट बुकिंग का काम करते थे। तैनाती थी मध्य प्रदेश के नरसिंहपुर डिवीजन में आने वाले श्रीधाम रेलवे स्टेशन पर। आम दिनों की ही तरह 4 जनवरी 2001 को भी कई पैसेंजर्स उनसे वहां ट्रेन टिकट खरीदने आए। आप जानते ही हैं तब कंप्यूटरटर्स उतने प्रचलन में नहीं थे। सो ऑनलाइन टिकट बुकिंग का सवाल ही नहीं उठता। इसलिए रेलवे स्टेशन के इन आम टिकट काउंटर्स पर उन दिनों खास भीड़ दिखने को मिलती थी।

इसे भी पढ़ें: तेलंगाना की बजाए असम क्यों नहीं गए...अभिषेक मनु सिंघवी की दलील भी काम न आई, पवन खेड़ा को SC से नहीं मिली अग्रिम जमानत

10 ने खा ली नौकरी

हिसाब भी ठीक नहीं बैठ रहा था। एक समय अधिकारियों ने दावा किया कि 778 रुपये ज़्यादा थे। बाद में जाँच-पड़ताल के दौरान, यह रकम बहुत कम होकर सिर्फ़ 7 रुपये रह गई। लेकिन तब तक, नुकसान हो चुका था। जब 2026 में यह मामला आखिरकार अपने अंजाम तक पहुँचा, तो हाई कोर्ट ने मामले की तह तक जाकर जाँच की, और जो सामने आया वह गुनाह की नहीं, बल्कि प्रक्रियागत विफलता की कहानी थी। कोर्ट को 10 रुपये के आरोप की पुष्टि करने वाला कोई भी स्वतंत्र गवाह नहीं मिला। एकमात्र गवाही उसी विजिलेंस टीम के 'डेकॉय' (छद्म) सदस्य की थी। किसी भी यात्री ने कभी कोई शिकायत नहीं की थी। इससे भी ज़्यादा चौंकाने वाली बात यह थी कि जाँच अधिकारी ने अभियोजक और न्यायाधीश - दोनों की भूमिका निभाई थी। कोर्ट ने फैसला सुनाते हुए कहा कि आरोप तो संभावना के पैमाने पर भी साबित नहीं होते और इस तरह ट्रिब्यूनल के फैसले को बरकरार रखते हुए रेलवे की याचिका खारिज कर दी। फैसले में यह भी कहा गया कि अगर कोई छोटी-मोटी चूक हुई भी थी, तो भी सेवा से बर्खास्त करना कठोर और असंगत था। नारायण नायर के लिए यह एक जीत है, लेकिन देर से मिली जीत।

25 सालों में जो कुछ खोया है उसे वापस कैसे लौटाएंगे?

अपने जजमेंट के आखिर में कोर्ट ने लिखा जांच में कई तरह की गड़बड़ियां पाई गई हैं। ज्यादातर इल्जाम शक से परे पुख्ता तौर पर साबित नहीं हो पाए हैं। इसलिए ट्राइबनल ने सही तौर पर यह माना है कि आरोप साबित नहीं हुए। इस जांच में प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत को फॉलो नहीं किया गया। इसी आधार पर भारतीय संविधान के आर्टिकल 227 के तहत रेलवे की ये याचिका खारिज की जाती है। साथ ही सेंट्रल एडमिनिस्ट्रेटिव ट्रिब्यूनल के आदेश को बरकरार रखा जाता है। कॉस्ट यानी मुकदमे के खर्च को लेकर कोई आर्डर नहीं दिया गया है। ये कोर्ट के शब्द थे। यानी 25 साल केस लड़ने के बाद एक आम से बेगुनाह टिकट बुकिंग क्लर्क के नौकरी तो लौट गई लेकिन उसने इन 25 सालों में जो कुछ खोया है उसे वापस कैसे लौटाएंगे?

प्रमुख खबरें

Tourism बनेगा Economic Growth का इंजन, हर राज्य विकसित करे एक वर्ल्ड क्लास डेस्टिनेशन– NITI Aayog

Matka King Review: सत्ता, जोखिम और वफादारी की जंग में विजय वर्मा का राजसी प्रदर्शन

Womens Reservation पर Rajiv Ranjan का Congress पर बड़ा हमला, PM Modi के प्रयासों को किया विफल

Putin से पहले भारत आ सकते हैं Ukraine के राष्ट्रपति, Zelensky के करीबी ने दिल्ली में Jaishankar और Doval से की मुलाकात