बारिश और दुनिया (व्यंग्य)

By संतोष उत्सुक | Jun 21, 2023

बारिश कहीं कहीं तो इतनी ज्यादा हो रही है कि टीवी पर देखने और सुनने में डरावनी लगती है। जहां गरमी में सूखा बरस रहा है वहां लोग जान की खैर मना रहे हैं कि बहने और डूबने से तो बचे। लगता है शानदार आपदा प्रबंधन ने घबराकर पानी में डूबकर आत्महत्या कर ली है। कहीं इस बार भी, डरे हुए मगरमच्छ पानी से बचने के लिए मकान की छत पर न चढ़ जाएं। कोई चीज़ समाज के लिए अच्छी है या बुरी यह तो महान व्यक्तित्व के मालिक ही बता सकते हैं। एक बार उन्होंने फरमाया था कि मैच शुरू होकर फिर बारिश के कारण रुक जाना सबसे बुरी घटना है। बारिश अच्छे भले खेल के मैदान को परेशान कर देती है। खिलाड़ी फिसलकर चोटिल होने लगते हैं। कमबख्त बुरी चीज़ बारिश इतना ज़रूरी काम भी नहीं होने देती। 

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ज़िम्मेदार सरकार को संजीदा जांच आदेश देने पड़ते हैं और जांच अधिकारी को उचित रिपोर्ट तैयार करनी होती है। बुद्धिमान विकासजी इतनी समझदारी से नया देश बसा रहे हैं लेकिन नासमझ बारिश जब चाहे जितनी चाहे, अपनी मर्ज़ी से होती रहती है। विकसित इंसान सब कुछ अपनी सुविधानुसार ही चाहता है तो बारिश को भी इंसान के इशारों पर चलना सीख लेना चाहिए। यदि विकासजी कुछ ऐसा करवा दें तो सरकार का करोड़ों रुपया बच सकता है। बारिश न भी हो तो ज़्यादा फर्क नहीं पड़ेगा। आमजन के पास तो डूबकर मरने के लिए भूखे, प्यासे, उधार और बीमार रास्ते हैं। बाज़ार के किसी शातिर प्रतिनिधि ने ही सृष्टि पालक को सुझाया किया होगा कि संसार बसाइए। उन्होंने धरती पर आदम और हव्वा को सेब खाने के लिए भेज तो दिया, अब उनकी करोड़ों संतानें ही उनके लिए निरंतर मुश्किलें पैदा कर रही है। 

शैलेंद्र ने तो दशकों पहले ही सवाल उठा दिया था, ‘दुनिया बनाने वाले क्या तेरे मन में समाई, काहे को दुनिया बनाई,’ लेकिन दुनिया बनाने वाला कभी जवाब नहीं देता। सृष्टि रचयिता को सोच समझ कर फैसला लेना चाहिए था, किसी उत्पाद विशेषज्ञ से ही सर्वे, अध्ययन, विश्लेषण करवा लेते कि दुनिया बसाने के कितने ज़्यादा बुरे या अच्छे परिणाम हो सकते है। 

- संतोष उत्सुक

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