प्रकृति का सुंदर उपहार जल का इंद्रधनुष, जल संरक्षण की महत्ता समझें

By डॉ. प्रभात कुमार सिंघल | Jun 05, 2020

प्रकृति प्रदत्त नदियों का बहता कलकल करता जल, खूबसूरत झरने, हरे भरे पहाड़, रमणीक उद्यान, हरी भरी वृक्षों से आच्छादित लुभावनी वादियां, पर्वतीय क्षेत्रों का सौन्दर्य, पहाड़ों पर बर्फ का आनंद, गर्मी के मौसम में पर्वतीय स्थलों की सैर, हरे भरे जंगल, अभ्यारणयों में कुंचाले भरते हिरण, बारहसिंघा, उछल-कूद करते बन्दरों की अठखेलियां, विचरण करते शेर, पक्षियों का कलरव, नृत्य करते मयूर, कोयल की मीठी कूक, रंगबिरंगे, समुद्र की लहरें, बरसात की रिमझिम फुंवार, सावन की घटा जैसे प्रकृति के खूबसूरत नज़रें भला किसका मन नहीं मोह लेंगे। प्रकृति का यह सुन्दर उपहार मानव जीवन को सहज, सरल और आनंदमय बनाता है। 


यही सब कुछ जो परी (उपसर्ग) अर्थात हमारे चारों ओर की परिधी या परिक्षेत्र का आवरण है को ही हम पर्यावरण के नाम से पुकारते है। जल, वायु, पृथ्वी, अग्नि और आकाश मानव जीवन के मूलभूत तत्व हैं। इन पंचतत्वों से ही मानव जीवन का निर्माण माना जाता है और इन्हीं से हमारी सृष्टि और मानव का अस्तित्व है। जब तक सृष्टि के इन पंचभूत तत्वों का समन्वय, संतुलन और संगठन निर्धारित परिमाण में संयोजित रहता है तो हम कहते है हमारा पर्यावरण सही है। जैसे ही इन घटकों का संतुलन बिगड़ता है तो पर्यावरण भी बिगडता है और हम कहते है कि पर्यावरण दूषित हो रहा है। प्रकृति और मनुष्य का सम्बंध आदि काल से परस्पर निर्भर रहा है। 

 

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पर्यावरण के इन घटकों की चर्चा करें तो हम देखते हैं कि पुराने समय से ही नदियों के किनारे सभ्यताओं का विकास हुआ। गंगा, यमुना, कावेरी, शिप्रा आदि नदियों को सदैव से पवित्र मानकर देवी स्वरूप इनकी पूजा का विधान अविरल चल रहा हैं। हमारी ये पवित्र-पावन देवतुल्य नदियां आज हमारे ही कारण प्रदूषित हो रही हैं। हम है कि मानते ही नहीं और मनुष्य के अंतिम संस्कार की रस्मों, गंदा कचरा फेंक कर, नालों को नदियों में छोड़कर इन्हें आये दिन प्रदूषित करने पर लगे हैं। एक रिपोर्ट के मुताबिक देश में 150 नदियां पूर्णरूप से प्रदूषित हो चुकी हैं और इनमें सबसे ज्यादा 28 नदियां अकेले महाराष्ट्र राज्य में हैं। नदियों के पेट से रेत खनन नदियों के जीवन के लिये बड़ा खतरा है। कई नदियां तो नक्शे से ही गायब हो गई है और कुछ नदियों का मार्ग सकरा हो गया हैं। नदियों को केवल नदी ही समझा होता तो शायद नदी स्वस्छ रहती और हमें गंगा स्वछता जैसे अभियान चलाने की आवश्यकता नहीं पड़ती। पतितपावनी गंगा नदी को शुद्ध करने के लिए स्वछता अभ्यांन चलना पड़ रहा है। अपनी मौज़ मस्ती के लिए हमने हमनें जलाशयों एवं झीलों के बीच में और नदियों के किनारे होटल और मनोरंजन के साधन विकसित कर प्रदूषित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी।


हिमालय पर ग्लेशियर बढ़ते हुए तापमान से पिघल रहे हैं। कुछ ग्लेशियरों ने अपना स्थान बदल लिया है। ग्लेशियरों के पिघलने से सारा पानी नदियों में आता है और नदी का जीवन बनता है। यदि तापमान यूँ ही बढ़ता रहा और ग्लेशियरों का अस्तित्व समाप्त हो गया तो नदियां कहा से बचेंगी। यहां हमें पानी के साथ-साथ प्रकृति के अग्नि तत्व का प्रकोप बढ़ते हुए तापमान के रूप में नजर आता है। तापमान बढ़ने का असर हमारे प्रकृति और मौसम चक्र पर पड़ा है। बरसात होने के दिनों में कमी आई है। इस पर भी हम वर्षा जल संरक्षण के प्रति उदासीनता बरत रहे है। परम्परागत जल स्त्रोतों बावड़ियों व तलाबों आदि के संरक्षण की भी दरकार है। पानी की कमी का असर मनुष्यों पर ही नहीं वरन् वनों में रहने वाले पशु-पक्षियों पर भी पड़ा हैं। पहले जब बरसात खूब होती थी तो जंगल भी हरे भरे रहते थे,जल स्रोत पानी से लबालब भरे रहते थे और वर्ष भर इन्हें पानी की कमी नहीं रहती थी। अब तो कई बार हालात ऐसे हो जाते हैं कि पशु-पक्षियों के लिए पीने के पानी की व्यवस्था सरकार को करनी पड़ती है। 

 

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सृष्टि के पांच भूत तत्वों में जीवनदायिनी मूल्यवान जल तत्व की पृथ्वी पर उपलब्धता की चर्चा करें तो यह जानकर आश्चर्य होगा कि केवल 3 प्रतिशत जल पीने योग्य है जिसमें से 2 प्रतिशत पानी ग्लेशियर और बर्फ के रूप में है एवं सही अर्थों में 1 प्रतिशत जल ही पीने योग्य उपलब्ध है। इसमें भी जल का बड़ा भाग सिंचाई के काम आ जाता है। इस प्रकार स्वच्छ पेयजल जल बहुत ही कम मात्रा में उपलब्ध है जबकि कुल  जल का 97 प्रतिशत जल खारा होने से पीने योग्य नहीं है। जिस तेजी से औद्योगिकरण एवं नगरीकरन बढ़ा है ऐसे में सब को शुद्ध पेयजल सुलभ करना किसी चुनोती से कम नहीं है। गर्मियों में देश में कई जगह जल का विकट संकट उत्पन्न हो जाता है और हर बार यह सोच कर की बरसात आ जायेगी और संकट दूर हो जाएगा, जैसे-तैसे गर्मी का सीजन निकाल देते हैं। बरसात आती है पर बरसात के दिन कम होते जा रहे हैं। कहीं तो हालात बाढ़ के बन जाते हैं तो कहीं औसत वर्षा भी नहीं होती। हम हैं कि गर्मियों में झेले जल संकट को दर किनार कर देते हैं और वर्षों जल संरक्षण के प्रति कभी जतन नहीं करते। इसके प्रति उदासीनता बरतते हैं। सरकार ने अपने स्तर से जल संरक्षण की मुहिम चला रखी है परन्तु इस के प्रति नागरिकों की उदासीनता चिंतनीय हैं। गांवों में तो वर्षा जल संरक्षण के कुछ काम जरूर हो जाते हैं परंतु शहरों में नागरिकों में इसके प्रति जिम्मेदारी का जरा सा भी अहसास देखने को नहीं मिलता। एक और तथ्य गौरतलब हैं कि विशेषज्ञों के मुताबिक 86 प्रतिशत बीमारियां प्रदूषित एवं असुरक्षित जल के उपयोग की वजह से होती हैं। अनुमान लगाया गया है कि विश्व मे 1.10 अरब लोग असुरक्षित जल पीने को विवश हैं। दूषित जल की वजह से करीब 1600 जलीय प्रजातियां लुप्त होने के कगार पर हैं।


मनुष्य ने अपनी जरूरत के लिए वृक्षों की अन्धाधुन्ध कटाई की। जंगल खाली होने लगे और पशु-पक्षियों के लिए भी संकट पैदा कर दिया। वृक्षों का ही अभाव है कि आये दिन पर्वतों की चट्टाने खिसकने और गिरने की घटनायें सामने आती है। पृथ्वी के गर्भ में छिपे हीरे, सोना, चांदी, पीतल, लोहा, नग, विभिन्न प्रकार की खनिज सम्पदा, पत्थर आदि का बडे पैमाने पर किया गया दोहन पृथ्वी के तत्वों के असंतुलन का बड़ा कारण बन गया है। इसी प्रकार खेती में अधिक पेस्टेसाइट डालकर व आवश्यकता से अधिक पानी डालकर जमीन का स्वास्थ खराब कर रहे हैं और इससे वांछित उपज भी नहीं मिल रही हैं। जैविक खेती की ओर लौटने की मुहिम चल रही हैं। 


मानव जीवन, जीवनदायनी ऑक्सीजन पर निर्भर है। प्रकृति मेंऑक्सीजन पैदा करने की एक मात्र फैक्ट्री है हमारे वृक्ष। वातावरण में ऑक्सीजन की कमी हो रही है तथा कार्बनडाइक्साइड एवं अन्य जहरीली गैसे बढ़ रही है। एसी एवं कूलर के बढते उपयोग, धुआं छोडते वाहन, कारखानों से निकलता धुआं और विषैली गैसे ऐसे प्रमुख कारण है जो वायु को प्रदूषित कर रहे हैं। प्रदूषण से वायु को बचाने के लिए एक मात्र रास्ता है अधिक से अधिक वृक्ष लगाये जाये। कारखानों में प्रदूषण रोकने के संयंत्र लगे तथा धुआं फेकने वाले वाहनों को बंद किया जाये।

 

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जीवन तत्व आकाश में तापमान निरंतर बढ़ रहा है और पृथ्वी के कुछ ऊपर तक ही सांस लेने योग्य हवा उपलब्ध है। जैसे-जैसे ऊपर की ओर जाते है ऑक्सीजन की मात्रा कम होती जाती है। हमें इस संतुलन को भी बनाये रखना होगा।


विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर सभी को अपने आस-पास का पर्यावरण बचाने व स्वच्छ रखने का संकल्प लेना होगा। हमारा पानी प्रदूषित नहीं हो, वायु शुद्ध रहे, अधिक से अधिक पेड़ लगाये, नदियों को प्रदूषित होने से रोके, वर्षा जल का समुचित संरक्षण के उपाय हों, जंगल कटने से बचे तथा हम स्वयं भी अच्छे पर्यावरण का निर्माण करें एवं भावी पीढ़ी को भी इसके प्रति सावचेत एवं जागरूक करें। हमें जल के साथ-साथ अपनी पृथ्वीं को भी बचाना होगा। पृथ्वी के तत्वों के संयोजन को बनाये रखने के लिए एक मात्र उपाय है कटते हुए वनों को बचाया जाये और अधिक से अधिक वृक्षारोपण किया जाए वर्षा जल संरक्षण एवं जल को प्रदूषित होने से बचाने के लिए लोग जागरूक हो कर आगे आये। 


डॉ. प्रभात कुमार सिंघल

लेखक एवं अधिस्वीकृत स्वतंत्र पत्रकार 

पूर्व जॉइंट डायरेक्टर, सूचना एवं जनसम्पर्क विभाग, राजस्थान


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