By अभिनय आकाश | Aug 14, 2026
चीन तेज़ी से जहाज़ बना रहा है और इतनी तेज़ी से एयरक्राफ़्ट कैरियर तैयार कर रहा है कि नई दिल्ली से लेकर टोक्यो और कैनबरा तक चिंता बढ़ गई है। लेकिन एक नए आकलन के मुताबिक, इतने सारे स्टील और दिखावे के बावजूद, बीजिंग के खास एयरक्राफ़्ट कैरियर (जिन्हें 'फ़्लैट-टॉप' भी कहा जाता है) दुश्मन की पनडुब्बी के सही जगह पर पहुँचते ही आसान शिकार बन सकते हैं। यह चेतावनी वॉशिंगटन DC स्थित थिंक टैंक सेंटर फ़ॉर स्ट्रैटेजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज़ (CSIS) ने दी है। इस थिंक टैंक ने बताया है कि कैसे अमेरिका और उसके सहयोगी देश, प्रशांत क्षेत्र में किसी बड़े टकराव के दौरान सैद्धांतिक रूप से चीन के कैरियर ग्रुप्स को खतरे में डाल सकते हैं। चीन ने ब्लू-वॉटर नेवी बनाने में भारी निवेश किया है; फ़ुज़ियान कैरियर का अभी समुद्री परीक्षण चल रहा है और कई और कैरियर बनाने की योजना है। इन प्लेटफ़ॉर्म्स का मकसद चीन की सीमाओं से बहुत दूर अपनी ताकत दिखाना है, जो समुद्री दबदबे के मामले में अमेरिका को टक्कर देने की बीजिंग की महत्वाकांक्षा को दर्शाता है। रिपोर्ट में पाँच तरह की "लागत-बढ़ाने वाली" (cost-imposition) रणनीति बताई गई है, जिसका निशाना चीन के एयरक्राफ़्ट कैरियर हैं। रिपोर्ट के अनुसार, इस रणनीति के पाँच हिस्से हैं: ज़मीन से मार करने वाले मिसाइल नेटवर्क, सैटेलाइट-गाइडेड लंबी दूरी के हवाई हमले, साइबर और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध, ड्रोन के झुंड और पनडुब्बी से घात लगाकर हमला करना।
पीपुल्स लिबरेशन आर्मी नेवी (PLAN) कागज़ पर तो अपने प्रतिद्वंद्वियों से आगे निकल गई है उसके पास ज़्यादा हल (hulls), बड़े डेक और नए एयरक्राफ्ट हैं। लेकिन एंटी-सबमरीन वॉरफेयर (पनडुब्बी-रोधी युद्ध) के मामले में स्थिति अलग है। रिपोर्ट में दुश्मन की पनडुब्बियों—खासकर पश्चिमी प्रशांत क्षेत्र में घूम रही अमेरिकी अटैक सबमरीन—का पता लगाने और उन्हें ट्रैक करने की चीन की क्षमता में लगातार कमियों की ओर इशारा किया गया है। पानी के नीचे की यह 'ब्लाइंड स्पॉट' (अदृश्यता) वाली स्थिति अब पहले से कहीं ज़्यादा अहम हो गई है। CSIS की रिपोर्ट के मुताबिक, चीन अपनी ताकत का प्रदर्शन करना चाहता है और जैसे-जैसे उसकी क्षमता बढ़ेगी, वह अपने कैरियर को अपने तटों से दूर ले जाएगा। चीन इन जहाजों को 'पहली द्वीप श्रृंखला' (first island chain) से आगे और 'दूसरी द्वीप श्रृंखला' की ओर ले जा रहा है, ताकि प्रशांत महासागर के अंदरूनी हिस्सों और उससे आगे तक अपनी ताकत का प्रदर्शन कर सके। उदाहरण के लिए, जापान ने बीजिंग के बढ़ते प्रभाव को लेकर पहले ही चेतावनी दे दी है और अपनी रक्षा क्षमताओं को बेहतर बना रहा है।