By नीरज कुमार दुबे | Aug 27, 2026
राजस्थान हाईकोर्ट के भीतर कथित प्रशासनिक अव्यवस्था, पक्षपात और न्यायिक कार्यप्रणाली को लेकर उठा विवाद अब देश की सर्वोच्च न्यायिक संस्था के दरवाजे तक पहुंच गया है। हम आपको बता दें कि सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ न्यायाधीश जस्टिस संदीप मेहता ने राजस्थान हाईकोर्ट के कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश जस्टिस संजीव प्रकाश शर्मा के खिलाफ एक के बाद एक तीन पत्र लिखकर गंभीर आरोप लगाए हैं और उन्हें तत्काल राजस्थान से बाहर स्थानांतरित करने की मांग की है। इस असाधारण न्यायिक टकराव ने न्यायपालिका के गलियारों में हलचल तेज कर दी है।
जस्टिस संदीप मेहता ने अपने पत्रों में आरोप लगाया कि कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश के रूप में जस्टिस संजीव प्रकाश शर्मा ने कई मौकों पर ऐसे अधिकारों का इस्तेमाल किया, जो संस्था के नेतृत्वकर्ता के पद की गरिमा के अनुरूप नहीं बताए जा सकते। उन्होंने कथित तौर पर जस्टिस संजीव प्रकाश शर्मा की न्यायिक कार्यप्रणाली को लेकर मिली शिकायतों का भी जिक्र किया और कहा कि प्रथम दृष्टया कुछ मामलों में उनकी निष्पक्षता और सत्यनिष्ठा को लेकर सवाल खड़े होते हैं।
विवाद का एक बड़ा पहलू जस्टिस संजीव प्रकाश शर्मा का करीब दस महीने से कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश के पद पर बने रहना भी है। जस्टिस संदीप मेहता ने इसे असामान्य रूप से लंबी अवधि बताते हुए राजस्थान हाईकोर्ट में किसी अन्य हाईकोर्ट से नियमित मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति की मांग की है। उन्होंने अपनी शिकायतों में यह भी सवाल उठाया कि जब जस्टिस संजीव प्रकाश शर्मा 26 सितंबर को सेवानिवृत्त होने वाले हैं, तो उन्हें पद पर बने रहने देने का औचित्य क्या है।
10 अगस्त के पत्र में जस्टिस संदीप मेहता ने कथित पक्षपात, कुछ वकीलों को कथित तौर पर विशेष लाभ मिलने और रोस्टर के दुरुपयोग से जुड़े कुछ उदाहरणों का उल्लेख किया। वहीं 17 अगस्त के पत्र में उन्होंने कथित “गंभीर कुप्रशासन” और “बेहद संदिग्ध गतिविधियों” का मुद्दा दोहराते हुए मुख्य न्यायाधीश से तत्काल हस्तक्षेप की मांग की।
जस्टिस संदीप मेहता ने यह भी आरोप लगाया कि जस्टिस संजीव प्रकाश शर्मा अपने साथी न्यायाधीशों को प्रतिशोधात्मक कार्रवाई, यहां तक कि स्थानांतरण की धमकी देते रहे और कथित तौर पर मुख्य न्यायाधीश के साथ अपनी निकटता का हवाला देते थे। उन्होंने राजस्थान हाईकोर्ट के एक मौजूदा न्यायाधीश जस्टिस उमा शंकर व्यास की शिकायत का भी जिक्र किया, जिसमें उनकी पत्नी जो जिला न्यायपालिका की वरिष्ठ अधिकारी हैं, उनके प्रति कथित प्रतिशोधात्मक रवैया अपनाने का आरोप लगाया गया था।
जोधपुर में नए कोर्ट भवन के उद्घाटन को कथित तौर पर व्यक्तिगत इच्छा और मनमर्जी के कारण रोकने का मामला भी पत्रों में उठाया गया है। आरोप है कि इस फैसले से संस्था को गंभीर नुकसान पहुंचा।
हालांकि, इन गंभीर आरोपों के बीच भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने स्पष्ट कर दिया है कि किसी न्यायाधीश के खिलाफ लगाए गए आरोपों का फैसला मीडिया या सार्वजनिक बहस के जरिए नहीं किया जा सकता। उन्होंने जस्टिस संजीव प्रकाश शर्मा से जवाब मांग लिया है और कहा है कि जस्टिस संदीप मेहता की शिकायतों की जांच स्थापित संस्थागत प्रक्रिया के तहत की जा रही है।
CJI ने अपने सार्वजनिक बयान में कहा है कि किसी न्यायाधीश के खिलाफ आरोप लगाए जाने भर से उन्हें दोषी नहीं माना जा सकता। संबंधित न्यायाधीश को अपना पक्ष रखने का पूरा और निष्पक्ष अवसर मिलना चाहिए। मुख्य न्यायाधीश ने साफ कहा कि सुप्रीम कोर्ट व्यक्तिगत शिकायतों को मीडिया में चल रहे परस्पर दावों के आधार पर तय नहीं होने देगा।
हम आपको बता दें कि स्थापित प्रक्रिया के तहत यदि किसी न्यायाधीश के जवाब को असंतोषजनक पाया जाता है और आरोप इतने गंभीर हों कि विस्तृत जांच जरूरी हो, तो मुख्य न्यायाधीश की ओर से न्यायाधीशों की एक आंतरिक समिति गठित की जा सकती है। फिलहाल CJI सूर्यकांत ने कहा है कि मामला उचित स्तर पर विचाराधीन है और कोई भी निर्णय जस्टिस संदीप मेहता द्वारा उपलब्ध कराई गई सामग्री तथा जस्टिस संजीव प्रकाश शर्मा के जवाब, दोनों पर विचार करने के बाद ही लिया जाएगा।
बहरहाल, राजस्थान हाईकोर्ट के भीतर शुरू हुआ यह विवाद अब केवल दो न्यायाधीशों के बीच मतभेद का मामला नहीं रह गया है। आरोप सीधे न्यायिक प्रशासन, संस्थागत नेतृत्व और हाईकोर्ट की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर रहे हैं। अब निगाहें जस्टिस संजीव प्रकाश शर्मा के जवाब और उसके बाद सुप्रीम कोर्ट की संस्थागत प्रक्रिया पर टिकी हैं। आने वाले दिनों में यह तय होगा कि मामला आंतरिक जांच तक पहुंचता है या संस्थागत स्तर पर कोई प्रशासनिक समाधान निकाल लिया जाता है।