राज्यसभा चुनाव का मोदी कैबिनेट पर भी पड़ेगा असर, मुख्तार अब्बास नकवी और आरसीपी सिंह अब आगे क्या करेंगे?

By अभिनय आकाश | May 31, 2022

हमारी देश के संसद के दो सदन है, पहला- लोकसभा और दूसरा-राज्यसभा। लोकसभा को संसद का निचला सदन कहा जाता है। इसके सदस्य जनता द्वारा चुने जाते हैं। वहीं  राज्यसभा को उच्च सदन कहा जाता है और इसके सदस्यों को जनता की तरफ से चुने जाने वाले प्रतिनिधि यानी विधायक चुनते हैं। इस संदर्भ में राज्यसभा सदस्यों के चुनाव को अप्रत्यक्ष चुनाव कहा जाता है। 15 राज्यों की 57 सीटों पर 10 जून को वोटिंग होनी है। नतीजे भी उसी दिन मिल जाएंगे। लेकिन कई लोगों के नतीजे उससे पहले ही आ गए। राज्यसभा सीटों को लेकर बीजेपी, कांग्रेस, जेडीयू और जेएमएम ने अपनी-अपनी तरफ से उम्मदावारों का ऐलान कर दिया है। इसके बाद लगभग सभी दलों में कहीं खुशी, कहीं गम का माहौल है। 31 मई को नामांकन का आखिरी दिन था और इसके साथ ही राज्यसभा चुनाव के उम्मीदवारों की तस्वीर साफ हो गई। लेकिन इससे पहले जब एक-एक कर राजनीतिक पार्टियां अपने उम्मीदवारों के नाम का ऐलान कर रहीं थी। लोगों की नजर कांग्रेस की सूची पर थी कि क्या गांधी परिवार का मुखर विरोध करने वाला समूह जिसे जी-23 कहा जाता है। उसका कुछ भला होगा। इस समूह का हिस्सा रहे कपिल सिब्बल तो पहले ही सपा के समर्थन से राज्यसभा आने की तैयारी कर चुके हैं। बाकी बचे नेताओं में गुलाम नबी आजाद, आनंद शर्मा जैसे चेहरे नेपथ्य में छूट गए। अपनी पार्टी के फैसले से जिन दो केंद्रीय मंत्रियों की कुर्सी खतरे में पड़ गई है, उनमें  बीजेपी के नेता मुख्तार अब्बास नकवी और जेडीयू से आरसीपी सिंह शामिल हैं। भाजपा ने पीयूष गोयल और निर्मला सीतारमण को फिर से प्रत्याशी बनाया है, लेकिन मुख्तार अब्बास नकवी को टिकट नहीं मिला है। दूसरी ओर जेडीयू के कोटे से केंद्र सरकार में मंत्री आरसीपी सिंह को भी उनकी पार्टी ने राज्यसभा नहीं भेजने का फैसला लिया है। ऐसे में आइए जानते हैं कि मोदी कैबिनेट से दो मंत्रियों का इस्तीफा होगा? मुख्यार अब्बास नकवी और आरसीपी सिंह के सामने आगे और कौन से विकल्प मौजूद हैं। 

रामपुर के उपचुनाव में ठोकेंगे ताल

मुख्तार अब्बास नकवी के मंत्री पद पर खतरा मंडराने लगा है। क्योंकि अगर नकवी संसद नहीं पहुंचते हैं तो ऐसी स्थिति में उन्हें 6 महीने के भीतर मंत्री पद छोड़ना पड़ सकता है। ऐसे में चर्चा है कि अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी को रामपुर से लोकसभा का उपचुनाव लड़ाया जाएगा। आजम खान के विधानसभा चुनाव में जीत दर्ज करने और फिर सांसद का पद त्यागने के बाद से ये सीट खाली है। बीजेपी मुख्तार अब्बास नकवी को रामपुर सीट से 23 जून को होने वाले लोकसभा उपचुनाव में उतारने की योजना है। नकवी इससे पहले 1998 में रामपुर से जीतकर लोकसभा पहुंच चुके हैं। जिसके बाद उन्हें तत्कालीन अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में सूचना प्रसारण मंत्रालय की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। 

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संगठन में संभालेंगे अहम जिम्मेदारी

इस साल के अंत में दो राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं। गुजरात और हिमाचल प्रदेश बीजेपी के लिहाजे से बेहद अहम हैं। एक पीएम मोदी और गृह मंत्री अमित शाह का गृह राज्य है तो दूसरा बीजेपी अध्यक्ष जेपी नड्डा का गृह राज्य है। इसके अलावा साल 2024 में लोकसभा के चुनाव भी होने हैं। ऐसे में मुख्तार अब्बास नकवी को संगठन में अहम जिम्मेदारी दी जा सकती है। इससे पहले भी कई वरिष्ठ मंत्रियों को मोदी कैबिनेट से हटाकर संगठन में जिम्मेदारियां दी जा चुकी हैं। 

मनोनीत होकर जाएंगे उच्च सदन?

राज्यसभा में मनोनीत सांसदों की संख्या 12 होती है। जिन्हें राष्ट्रपति की तरफ से नामित किया जाता है। इस वक्त पांच मनोनीत सदस्य हैं जबकि सात सीटें खाली हैं। ऐसे में ये संभव है कि भाजपा मुख्तार को राष्ट्रपति की ओर से नामित कराकर फिर से राज्यसभा भेज दे और मौजूदा जिम्मेदारी को कायम रखा जाए।  

 नीतीश कुमार ने आरसीपी के कतरे पर

नरेंद्र मोदी सरकार  के कैबिनेट मंत्री आरसीपी सिंह, नीतीश कुमार के एक दम खासमखास माने जाते वाले नेता। यूपी कैडर के पूर्व आईएएस अधिकारी। अटल बिहारी वाजपेयी सरकार वाली एनडीए में जब नीतीश कुमार मंत्री बने तो आरसीपी सिंह से उनका परिचय हुआ। परिचय साझेदारी में बदली। जब नीतीश कुमार के हाथ में बिहार की सत्ता आई तो ये उनके ब्यूरोक्रेट नं 1 बन गए। फिर सियासत में आते हुए राज्यसभा में एंट्री ले ली। जेडीयू के अध्यक्ष भी बने। लेकिन उसके बाद से ही नीतीश और आरसीपी के बीच में समीकरण बिगड़ने की पटकाथा लिखा जाने लगी। कहा जाता है कि मोदी सरकार 2.0 के मंत्रीमंडल का गठन जेडीयू के पार्टी अध्यक्ष के तौर पर आरसीपी सिंह को पार्टी ने बीजेपी के साथ दो कैबिनेट और दो राज्य स्तर के मंत्री पद के लिए बातचीत की जिम्मेदारी सौपी थी। लेकिन वो अकेले ही मंत्री बन गए थे। जातीय जनगणना में उनकी लाइन पार्टी से अलग रही है। यूपी चुनाव में पार्टी की ओर से बीजेपी के  साथ तालमेल करने में नाकाम रहे। चर्चाएं यहां तक होने लगी कि उन्हें जेडीयू में बीजेपी का आदमी माना जाने लगा। सभी की निगाहें एक अणे मार्ग पर टिकी थी। जेडीयू ने आरसीपी सिंह का टिकट काटकर खीरू महतो को टिकट दिया है। माना जा रहा है कि आरसीपी सिंह को मौका न देकर नीतीश कुमार ने उन्हें और बीजेपी दोनों को संकेत देने की कोशिश की है। इसके साथ ही कहा जा रहा है कि अब जेडीयू सरकार में शामिल नहीं होगी। इसके जरिए भी जेडीयू बीजेपी को अपनी नाखुशी का संकेत देना चाह रही है। 

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मोदी के निर्देश पर आगे कदम उठाएंगे आरसीपी

जेडीयू से राज्यसभा का टिकट नहीं मिलने के बाद केंद्रीय मंत्री आरसीपी सिंह ने कहा कि मंत्री पद पर बने रहने या इस्तीफा देने के बारे में वो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सलाह पर काम करेंगे। जिस पार्टी के सिंह कभी अध्यक्ष थे, उसी में किनारे लगा दिए जाने के बाद पहली बार पत्रकारों से बात करते हुए उन्होंने कहा कि वो मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के वफादार हैं और उन्हीं की पूर्ण सहमति से केंद्र में मंत्री बने थे। वहीं नीतीश कुमार ने कहा है कि सिंह को समय से पहले मंत्री पद छोड़ने की जरूरत नहीं है। नीतीश ने कहा कि आरसीपी को पार्टी ने कई महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां दी हैं जिनमें लगातार दो बार सांसद बनाना भी शामिल है। आईएएस अधिकारी रहने के समय से ही उन्हें मान्यता दी जा रही है।

किस राज्य से कितने माननीय सांसद राज्यसभा आएंगे 

  उत्तर प्रदेश 11
 बिहार 5
 झारखंड 2
 छत्तीसगढ़ 2
 ओडिशा 3
 आंध्र प्रदेश 4
 महाराष्ट्र 6
 तमिलनाडु 6
 कर्नाटक  4
 मध्य प्रदेश 3
 राजस्थान  4
 हरियाणा 2
 पंजाब 2
 उत्तराखंड 1
 तेलंगाना 2
 कुल  15 57 सीटें

क्या मोदी कैबिनेट का होगा विस्तार?

दोनों को राज्यसभा सदस्यता समाप्त होते ही इस्तीफा देना जरूरी नहीं है। नियम के मुताबिक किसी भी सदन का सदस्य नहीं होने के बाद भी दोनों अगले छह महीने तक मंत्री बने रह सकते हैं। दोनों अगर छह महीने के अंदर लोकसभा या राज्यसभा का सदस्य नहीं बनते तो दोनों को इस्तीफा देना पड़ेगा। मौजूदा मंत्रिमंडल में तीन मंत्री बनाए जाने की गुजाइंश है। दो और मंत्रियों मुख्यार अब्बास नकवी और आरसीपी सिंह के इस्ताफी देने की स्थिति में कैबिनेट में पांच मंत्रियों के लिए जगह खाली हो जाएगी। ऐसे में प्रधानमंत्री मंत्रिमंडल का विस्तार अभी भी कर सकते हैं। लेकिन, इसकी गुजाइंश न के बराबर ही है। 

निर्दलीय सुभाष चन्द्रा ने बढ़ाई कांग्रेस की मुश्किल

सुभाष चंद्रा हरियाणा से निर्दलीय राज्यसभा सांसद हैं और अब उनका कार्यकाल भी पूरा हो रहा है। लेकिन इस बार हरियाणा का नंबर गेम उनके पक्ष में नहीं है। जिसके बाद सुभाष चंद्रा ने राजस्थान से बीजेपी से राज्यसभा चुनाव लड़ने की रणनीति बनाई है। राजस्थान के मौजूदा संख्याबल के हिसाब से बीजेपी केवल एक सीट पर जीत रही है। वहीं दूसरी सीट पाने के लिए उसे 11 वोट की दरकार है। बीजेपी ने एक पक्की सीट के लिए घनश्याम तिवारी को उम्मीदवार बनाया है। कांग्रेस के पास तीन में से दो सीट पर पार्टी का बहुमत है, तीसरी सीट जीतने के लिए काग्रेस को निर्दलीय और सहयोगी दलों के समर्थन की जरुरत होगी। बीजेपी के पास दूसरी सीट के लिए 30 अतरिक्त वोट हैं। ऐसे में ये सीट ये सीट निर्दलीय प्रत्याशी सुभाष चंद्रा को जीतने के लिए बीजेपी के तीस वोट के अतिरिक्त 11 वोटों की जरूरत होगी। यानी कुल 41 वोट सुभाष चंद्रा को जीतने के लिए चाहिए। 

फिर से चर्चा में आया 2016 का स्याही कांड 

सुभाष चंद्रा के राजस्थान से उम्मीदावर बनने के साथ ही हरियाणा के छह साल पुराने स्याही कांड की याद फिर से ताजा हो गई। साल 2016 में हरियाणा में राज्यसभा चुनाव के दौरान कुछ ऐसा हुआ जो सुर्खियां बन गया था। उस वक्त मीडिया जगत के दिग्गज सुभाष चंद्रा की चुनाव में हुई जीत विवादों में आ गई थी। 2016 में हरियाणा के राज्यसभा चुनाव में बीजेपी ने निर्दलीय के तौर पर सुभाष चंद्रा को बाहर से समर्थन दिया था। कांग्रेस और इनेलो ने सुप्रीम कोर्ट के वकील आरके आनंद को उम्मीदवार बनाया था। संख्या बल सुभाष चंद्रा के पक्ष में नहीं थे। लेकिन 14 कांग्रेस विधायकों के वोट गलत पेन इस्तेमाल करने की वजह से रद्द हो गए थे।  राज्यसभा चुनाव के लिए एक तरह की  बैंगनी स्याही वाली पेन से ही वोट करने होते हैं। ये पेन चुनाव आयोग की तरफ से दी जाती है। इसी स्याही के पेन से ही टिक मार्क करना होता है। लेकिन कांग्रेस के 14 उम्मीदवारों के वोट पर दूसरी पेन के निशान थे जिसके चलते उनके वोट कैंसिल कर दिये गये। कहा जाता है कि  वोटिंग के दौरान रणनीतिक रूप से किसी ने बैंगनी स्याही की जगह ब्ल्यू स्याही वाला पेन रख दिया। मामला कोर्ट में भी गया था. लेकिन अभी तक यह तय नहीं हुआ है कि वो स्याही अलग थी या नहीं।

-अभिनय आकाश

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