Rakshabandhan 2025: नारी रक्षा का संकल्प, एक सामाजिक चेतना

By ललित गर्ग | Aug 07, 2025

भारत की सांस्कृतिक परंपराओं और त्योहारों की भूमि पर रक्षाबंधन एक ऐसा पर्व है जो केवल भाई-बहन के रिश्ते तक सीमित नहीं, बल्कि संपूर्ण समाज में आत्मीयता, कर्तव्यबोध, और नैतिक मूल्यों के पुनर्संवेदन का पर्व है। यह पर्व नारी अस्मिता, समानता, सुरक्षा और प्रेम की भावनाओं का प्रतिनिधित्व करता है। राखी का धागा जितना कोमल दिखता है, उतनी ही उसमें गहराई और दृढ़ता होती है, यह एक ऐसा लौकिक बंधन है, जो प्रेम, आदर्शों और जिम्मेदारियों से बंधा होता है। रक्षाबंधन कोई साधारण पर्व नहीं, यह आदर्शों का हिमालय है, संकल्पों का सोपान है। यह पर्व सिर्फ भाई-बहन के प्रेम की रस्म नहीं, बल्कि पुरुष समाज द्वारा नारी को आश्वस्त करने, उसका मान-सम्मान बनाए रखने की शपथ का दिन है। यह दिन हमें याद दिलाता है कि नारी केवल स्नेह की पात्र नहीं, वह शक्ति, श्रद्धा और समाज की दिशा तय करने वाली एक सशक्त प्रेरणा भी है।


आज जब महिलाएं समाज के हर क्षेत्र में बुलंदियों को छू रही हैं, सेना से लेकर विज्ञान, शिक्षा से लेकर खेल तक तब रक्षाबंधन उन्हें केवल भावनात्मक सुरक्षा नहीं, सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक सम्मान दिलाने का भी माध्यम बनता है। रक्षाबंधन की महत्ता को समझने के लिए उसके ऐतिहासिक संदर्भों को जानना आवश्यक है। भविष्य पुराण में उल्लिखित कथा के अनुसार जब देव-दानव युद्ध में दानव भारी पड़ने लगे, तब इंद्राणी ने अपने पति इन्द्र की रक्षा हेतु रेशम का धागा मंत्रों के साथ उनके हाथ पर बांधा, जिससे इंद्र विजयी हुए।

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मुगल काल में रानी कर्मवती ने जब चितौड़ पर संकट देखा, तो बादशाह हुमायूं को राखी भेजकर रक्षा की याचना की। हुमायूं ने धर्म, संप्रदाय और सत्ता से ऊपर उठकर उस धागे की लाज रखी और चितौड़ की रक्षा में अपनी ताकत झोंक दी। महाभारत में जब भगवान श्रीकृष्ण की उंगली से रक्त बहा, द्रौपदी ने अपनी साड़ी का पल्लू फाड़कर पट्टी बांध दी। श्रीकृष्ण ने उस प्रेम को जीवन भर निभाया और चीरहरण के समय द्रोपदी की रक्षा की। यह केवल ऋण चुकता नहीं था, यह आदर्शों की प्रतिज्ञा थी। इसी तरह सिकंदर और पुरू की कथा इस बात को दर्शाती है कि राखी का एक धागा युद्ध भूमि में भी जीवनदान का कारण बन सकता है। ये प्रसंग हमें बताते हैं कि राखी केवल प्रेम का प्रतीक नहीं, बल्कि रक्षा, आदर्श और सम्मान की जीवंत प्रतिमा है।


रक्षाबंधन आज सिर्फ पारंपरिक पर्व नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक आंदोलन जैसा है। लेकिन दुख इस बात का है कि इस पर्व की आत्मा धीरे-धीरे खोती जा रही है। आज बहनों के लिए यह पर्व सजने-संवरने और उपहार पाने का माध्यम बनता जा रहा है, जबकि भाइयों के लिए यह केवल एक औपचारिकता बनकर रह गया है। राखी के धागों की वह पवित्रता, भावनाओं की वह गहराई, अब कम होती जा रही है। यह पर्व अब बाज़ारवाद और दिखावे के जाल में उलझता नजर आ रहा है। इस बदलती सोच को थामना और मूल भावनाओं को पुनः प्रतिष्ठित करना आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है। इस पर्व का मूल उद्देश्य नारी के प्रति श्रद्धा, सुरक्षा और कर्तव्य का निर्वहन है, न कि केवल उपहार और दिखावे का आदान-प्रदान। भाइयों को चाहिए कि वे बहन की रक्षा की शपथ केवल शब्दों में नहीं, जीवन के प्रत्येक व्यवहार में निभाएं। बहनें भी राखी को केवल संबंध या औपचारिकता न समझें, बल्कि इस पर्व को नारी स्वाभिमान और सामाजिक बदलाव के एक माध्यम के रूप में लें।


आज जब समाज में महिलाओं के साथ अपराध बढ़ रहे हैं, जब बच्चियों से लेकर वृद्धाओं तक को भय और असुरक्षा का सामना करना पड़ रहा है, तब रक्षाबंधन एक ऐसा अवसर है जब हम केवल बहन नहीं, संपूर्ण नारी समाज की रक्षा का संकल्प लें। एक ऐसा संकल्प जो केवल राखी तक सीमित न हो, बल्कि जीवन भर के आचरण में झलके। यह पर्व हमें यह संदेश देता है कि नारी केवल स्नेह की नहीं, सम्मान की अधिकारिणी है। रक्षाबंधन भारत के विभिन्न अंचलों में अलग-अलग नामों से मनाया जाता है। उत्तर भारत में यह भाई-बहन के रिश्ते का पर्व है, वहीं महाराष्ट्र में नारली पूर्णिमा के रूप में समुद्र देवता को नारियल अर्पण कर मछुआरे समुद्र से अपने रिश्ते की रक्षा की प्रार्थना करते हैं। दक्षिण भारत में ‘अवनी अविट्टम’ के रूप में यह ब्राह्मणों का यज्ञोपवीत संकल्प का पर्व है। वहीं स्कन्द पुराण और श्रीमद्भागवत में उल्लिखित वामन अवतार की कथा में रक्षाबंधन को ‘बलेव’ के रूप में जाना जाता है, जब भगवान विष्णु ने तीन पग भूमि मांगकर राजा बलि का अभिमान तोड़ा था। इन सब कथाओं में एक ही संदेश है - अहंकार के स्थान पर समर्पण, दंभ के स्थान पर रक्षा, और स्वार्थ के स्थान पर सेवा।


आज रक्षाबंधन जैसे भावनात्मक और सांस्कृतिक पर्व भी कृत्रिम बुद्धिमता एवं संचार-क्रांति की आंधी में अपनी मूल आत्मा और संवेदना खोते जा रहे हैं। उपहारों की होड़, ब्रांडेड राखियों का प्रदर्शन, सोशल मीडिया पर दिखावे की होड़ ने इस पर्व को एक उपभोक्तावादी उत्सव में बदल दिया है। जहाँ पहले राखी एक भावनात्मक संबंध का प्रतीक थी, वहीं आज यह अधिकतर लेन-देन और औपचारिकता का माध्यम बनती जा रही है। इस प्रवृत्ति से पर्व की आत्मा, जिसमें बहन के प्रेम और भाई की जिम्मेदारी का गहन बोध निहित था, वह पीछे छूटता जा रहा है। इसलिए आवश्यक है कि हम रक्षाबंधन की प्रासंगिकता को केवल उपहारों और खर्च की दृष्टि से नहीं, बल्कि नारी सम्मान, आत्मीय रिश्तों और सामाजिक जिम्मेदारियों के दृष्टिकोण से समझें और मनाएं।


राखी का पर्व हमें मानवीय रिश्तों की फिर से व्याख्या करने का अवसर देता है। यह पर्व हमें याद दिलाता है कि हर स्त्री हमारी बहन है, समाज की, संस्कृति की, मानवता की। उसकी रक्षा केवल सामाजिक कर्तव्य नहीं, बल्कि मानवीय धर्म है। जब हर पुरुष स्त्री के प्रति अपने कर्तव्य को राखी की तरह पवित्र समझेगा, जब हर बहन अपने भाई में केवल उपहार देने वाला नहीं, बल्कि एक मूल्य-धारी रक्षक देखेगी, तब रक्षाबंधन केवल एक पर्व नहीं, एक क्रांति का आरंभ बनेगा। रक्षाबंधन कोई मंच या मंचन नहीं है। यह प्रदर्शन का नहीं, आत्मचिंतन का पर्व है। हमें इस पर्व को बाजारवाद और औपचारिकता से निकालकर पुनः उसकी असली पहचान देना होगा। यह प्रेम और कर्तव्य के बीच की एक खूबसूरत कड़ी है। इस बार राखी के धागों को केवल कलाई तक न सीमित रखें, इन्हें हृदय से बाँधें, ताकि यह पर्व भाई-बहन के रिश्तों से आगे बढ़कर पूरे समाज में एक सशक्त और सुरक्षित वातावरण का निर्माण कर सके। तभी राखी के ये धागे सच्चे अर्थों में आदर्श बनेंगे और संकल्पों का सोपान।


- ललित गर्ग

लेखक, पत्रकार, स्तंभकार

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