Gyan Ganga: रामचरितमानस- जानिये भाग-13 में क्या क्या हुआ

By आरएन तिवारी | Apr 04, 2025

श्री रामचन्द्राय नम:


पुण्यं पापहरं सदा शिवकरं विज्ञानभक्तिप्रदं

मायामोहमलापहं सुविमलं प्रेमाम्बुपूरं शुभम्।

श्रीमद्रामचरित्रमानसमिदं भक्त्यावगाहन्ति ये

ते संसारपतङ्गघोरकिरणैर्दह्यन्ति नो मानवाः॥

राम नाम की महिमा 

श्रद्धेय श्री तुलसीदासजी कहते हैं---- हे मानव ! यदि तू अपने भीतर और बाहर दोनों ओर उजाला चाहता है, तो मुख रूपी द्वार पर रामनाम का दीपक जला । 

नाम जीहँ जपि जागहिं जोगी। बिरति बिरंचि प्रपंच बियोगी॥

ब्रह्मसुखहि अनुभवहिं अनूपा। अकथ अनामय नाम न रूपा॥

ब्रह्मा के बनाए हुए इस प्रपंचमय जगत से छूटने के लिए वैराग्यवान्‌ मुक्त योगी इस नाम को जपते हुए जागते हैं और नाम तथा रूप से रहित अनुपम, अनिर्वचनीय, अनामय ब्रह्मसुख का अनुभव करते हैं॥

जाना चहहिं गूढ़ गति जेऊ। नाम जीहँ जपि जानहिं तेऊ॥

साधक नाम जपहिं लय लाएँ। होहिं सिद्ध अनिमादिक पाएँ॥

जो परमात्मा के गूढ़ रहस्य को जानना चाहते हैं, वे भी नाम को जीभ से जपकर उसे जान लेते हैं। साधक लौ लगाकर नाम का जप करते हैं और आठों सिद्धियों को पाकर सिद्ध हो जाते हैं॥

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जपहिं नामु जन आरत भारी। मिटहिं कुसंकट होहिं सुखारी॥

राम भगत जग चारि प्रकारा। सुकृती चारिउ अनघ उदारा॥

संकट में पड़े हुए आर्त भक्त जब नाम जप करते हैं, तो उनके बड़े भारी बुरे-बुरे संकट मिट जाते हैं और वे सुखी हो जाते हैं। इस जगत में चार प्रकार के भक्त हैं जो भगवान को भजते हैं। 

1- अर्थार्थी-धनादि की चाह से भजने वाले, 

2- आर्त संकट की निवृत्ति के लिए भजने वाले, 

3- जिज्ञासु-भगवान को जानने की इच्छा से भजने वाले, 

4- ज्ञानी-भगवान को तत्व से जानकर स्वाभाविक ही प्रेम से भजने वाले रामभक्त हैं और चारों ही पुण्यात्मा, पापरहित और उदार हैं॥

चहू चतुर कहुँ नाम अधारा। ग्यानी प्रभुहि बिसेषि पिआरा॥

चहुँ जुग चहुँ श्रुति नाम प्रभाऊ। कलि बिसेषि नहिं आन उपाऊ॥

चारों ही चतुर भक्तों को नाम का ही आधार है, इनमें ज्ञानी भक्त प्रभु को विशेष रूप से प्रिय हैं। यों तो चारों युगों में और चारों ही वेदों में नाम का प्रभाव है, परन्तु कलियुग में विशेष रूप से है। इसमें तो नाम को छोड़कर दूसरा कोई उपाय है ही नहीं॥ 

सकल कामना हीन जे राम भगति रस लीन।

नाम सुप्रेम पियूष ह्रद तिन्हहुँ किए मन मीन॥

जो सब प्रकार की कामनाओं से रहित और श्री रामभक्ति के रस में लीन हैं, उन्होंने भी नाम के सुंदर प्रेम रूपी अमृत के सरोवर में अपने मन को मछली बना रखा है अर्थात्‌ वे नाम रूपी सुधा का निरंतर आस्वादन करते रहते हैं, क्षणभर भी उससे अलग होना नहीं चाहते॥ 

अगुन सगुन दुइ ब्रह्म सरूपा। अकथ अगाध अनादि अनूपा॥

मोरें मत बड़ नामु दुहू तें। किए जेहिं जुग ‍निज बस निज बूतें॥

निर्गुण और सगुण ब्रह्म के दो स्वरूप हैं। ये दोनों ही अकथनीय, अथाह, अनादि और अनुपम हैं। मेरी समझ में नाम इन दोनों से बड़ा है, जिसने अपने बल से दोनों को अपने वश में कर रखा है॥

प्रौढ़ि सुजन जनि जानहिं जन की। कहउँ प्रतीति प्रीति रुचि मन की॥

एकु दारुगत देखिअ एकू। पावक सम जुग ब्रह्म बिबेकू॥

उभय अगम जुग सुगम नाम तें। कहेउँ नामु बड़ ब्रह्म राम तें॥

ब्यापकु एकु ब्रह्म अबिनासी। सत चेतन घन आनँद रासी॥

गोस्वामी जी कहते हैं---

सज्जन लोग मेरी इस बात को ढिठाई या केवल काव्योक्ति न समझें। मैं पूरे विश्वास से कहता हूँ। निर्गुण और सगुण दोनों प्रकार के ब्रह्म का ज्ञान अग्नि के समान है। निर्गुण ब्रह्म उस अप्रकट अग्नि के समान है, जो काठ के अंदर है, परन्तु दिखता नहीं और सगुण उस प्रकट अग्नि के समान है, जो प्रत्यक्ष दिखता है। निर्गुण और सगुण तत्त्वतः एक ही हैं। किन्तु दोनों ही जानने में बड़े कठिन हैं, परन्तु नाम के जाप से दोनों सुगम हो जाते हैं।

अस प्रभु हृदयँ अछत अबिकारी। सकल जीव जग दीन दुखारी॥

नाम निरूपन नाम जतन तें। सोउ प्रगटत जिमि मोल रतन तें॥

ऐसे विकाररहित प्रभु के हृदय में रहते भी जगत के सब जीव दीन और दुःखी हैं। नाम का निरूपण करने से श्रद्धापूर्वक नाम जप रूपी साधन करने से वही ब्रह्म ऐसे प्रकट हो जाता है, जैसे रत्न के जानने से उसका मूल्य॥

निरगुन तें एहि भाँति बड़ नाम प्रभाउ अपार।

कहउँ नामु बड़ राम तें निज बिचार अनुसार॥

इस प्रकार निर्गुण से नाम का प्रभाव अत्यंत बड़ा है। अब अपने विचार के अनुसार कहता हूँ, कि नाम सगुण राम से भी बड़ा है॥

राम भगत हित नर तनु धारी। सहि संकट किए साधु सुखारी॥

नामु सप्रेम जपत अनयासा। भगत होहिं मुद मंगल बासा॥

श्री रामचन्द्रजी ने भक्तों के हित के लिए मनुष्य शरीर धारण करके स्वयं कष्ट सहकर साधुओं को सुखी किया, परन्तु भक्तगण प्रेम के साथ नाम का जप करते हुए सहज में ही आनन्द और कल्याण के घर हो जाते हैं॥

राम एक तापस तिय तारी। नाम कोटि खल कुमति सुधारी॥

रिषि हित राम सुकेतुसुता की। सहित सेन सुत कीन्हि बिबाकी

सहित दोष दुख दास दुरासा। दलइ नामु जिमि रबि निसि नासा॥

भंजेउ राम आपु भव चापू। भव भय भंजन नाम प्रतापू॥

श्री रामजी ने एक तपस्वी की स्त्री अहिल्या को ही तारा, परन्तु नाम ने करोड़ों दुष्टों की बिगड़ी बुद्धि को सुधार दिया। श्री रामजी ने ऋषि विश्वामिश्र के हित के लिए एक सुकेतु यक्ष की कन्या ताड़का की सेना समाप्ति की, परन्तु नाम अपने भक्तों के दोष, दुःख और दुराशाओं का इस तरह नाश कर देता है जैसे सूर्य रात्रि का। श्री रामजी ने तो स्वयं शिवजी के धनुष को तोड़ा, परन्तु नाम का प्रताप ही संसार के सब भयों का नाश करने वाला है॥

दंडक बन प्रभु कीन्ह सुहावन। जन मन अमित नाम किए पावन॥

निसिचर निकर दले रघुनंदन। नामु सकल कलि कलुष निकंदन॥

प्रभु श्री रामजी ने दण्डक वन को सुहावना बनाया, परन्तु नाम ने असंख्य मनुष्यों के मनों को पवित्र कर दिया। श्री रघुनाथजी ने राक्षसों के समूह को मारा, परन्तु नाम तो कलियुग के सारे पापों की जड़ उखाड़ने वाला है॥

सबरी गीध सुसेवकनि सुगति दीन्हि रघुनाथ।

नाम उधारे अमित खल बेद बिदित गुन गाथ॥

श्री रघुनाथजी ने तो शबरी, जटायु आदि उत्तम सेवकों को ही मुक्ति दी, परन्तु नाम ने अगनित दुष्टों का उद्धार किया। नाम के गुणों की कथा वेदों में भी प्रसिद्ध है॥

शेष अगले प्रसंग में ------

राम रामेति रामेति, रमे रामे मनोरमे ।

सहस्रनाम तत्तुल्यं, रामनाम वरानने ॥

- आरएन तिवारी

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