भारत में बैलेस्टिक मिसाइलों का ताबड़तोड़ प्रोडक्शन, कुछ बड़ा होगा?

By अभिनय आकाश | May 13, 2026

भारत ने अपनी मिसाइल ताकत को लगातार मजबूत किया है। फिर चाहे ड्रोस जैसी सुपरसोनिक मिसाइलें हो या फिर अग्नि सीरीज की बैलेस्टिक मिसाइलें। भारत आज दुनिया की बड़ी सैन्य ताकतों में अपनी मजबूत मौजूदगी दर्ज करा चुका है और सबसे बड़ी बात इन अत्याधुनिक मिसाइलों के पीछे डीआरडीओ की बड़ी भूमिका रही है। रक्षा क्षेत्र में एक बड़ा बदलाव होने जा रहा है क्योंकि भारत सरकार प्राइवेट कंपनियों को भी इस सेक्टर में एंट्री देने की तैयारी में है। दरअसल दिल्ली में आयोजित कॉन्फेडरेशन ऑफ इंडियन इंडस्ट्री के वार्षिक बिजनेस समिट 2026 में रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह ने खुद इस बात की जानकारी दी। उन्होंने खुद यह बात कही कि निजी क्षेत्र के साथ और ज्यादा काम करने के अन्य पहलुओं पर चर्चा चल रही है। उनका मानना है कि मिसाइल उत्पादन वो क्षेत्र है जहां अब तक एरोस्पेस के हिस्से के रूप में अधिकांश ऑर्डर लगभग पूरी तरह एक ही सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी को दिए जाते रहे। यह बात हम सब जानते हैं कि मिसाइल टेक्नोलॉजी में अगर भारत में किसी का दबदबा है तो वह डीआरडीओ है। डीआरडीओ ने आज कई घातक मिसाइलें बनाई हैं। 

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आज जिस देश के पास घातक मिसाइलें हैं वो अपनी सीमा की सुरक्षा कर सकता है। ऐसे में भारत बड़े स्तर पर मिसाइल प्रोडक्शन करना चाहता है। और रूस यूक्रेन युद्ध से लेकर पश्चिमी एशिया में बढ़ते तनाव तक दुनिया ने देखा कि आज मिसाइलें सिर्फ़ शक्ति प्रदर्शन का साधन नहीं बल्कि युद्ध जीतने का निर्णायक हथियार बन चुकी हैं। ऐसे में भारत को भी अपनी रक्षा उत्पादन क्षमता को बड़े स्तर पर बढ़ाने की जरूरत है। रक्षा सचिव ने कहा कि अब तक मिसाइल निर्माण के अधिकांश ऑर्डर सरकारी कंपनियों को दिए जाते रहे हैं। लेकिन सरकार अब इस क्षेत्र में निजी कंपनियों को भी अवसर देने पर गंभीरता से विचार कर रही है। उन्होंने कहा कि विभिन्न प्रकार की बैलेस्टिक मिसाइलों की टेक्नोलॉजी प्राइवेट सेक्टर को ट्रांसफर करने की इच्छा बढ़ रही है और उनके अनुसार अब वो समय आ चुका है जब इस दिशा में ठोस कदम उठाए जाने चाहिए। देखिए सरकार का यह कदम इसलिए भी बड़ा माना जा रहा है क्योंकि अभी भारत में कुछ ही कंपनियां हैं जो घातक मिसाइलें बना रही हैं। ज्यादातर ऑर्डर डीआरडीओ के पास हैं। तो ऐसे में डीआरडीओ के ऊपर भी एक बड़ा बोझ है। डीआरडीओ कई तरह की मिसाइलों पर काम कर रहा है। तो अगर ऐसे में प्राइवेट कंपनियों का साथ मिलता है या फिर प्राइवेट कंपनियां इस क्षेत्र में घुसती हैं तो एक तरह से एक बोझ भी कम होगा और बड़े स्तर पर बड़े स्केल पर मिसाइल का प्रोडक्शन होगा।

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