By Ankit Jaiswal | Oct 21, 2026
आज के दौर में बैंकिंग सेवाएं तेजी से डिजिटल हो रही हैं। कर्ज देने से लेकर ग्राहकों की पहचान और लेनदेन तक, कई काम अब तकनीक की मदद से कम समय में पूरे किए जा रहे हैं। हालांकि, भारतीय रिजर्व बैंक के डिप्टी गवर्नर स्वामीनाथन जे ने चेतावनी दी है कि इस तेजी में बैंकों को अपनी सुरक्षा व्यवस्था, अंदरूनी जांच और ग्राहकों के भरोसे से समझौता नहीं करना चाहिए।
उन्होंने कहा कि किसी प्रक्रिया को स्वचालित करने या उसमें जांच के कुछ चरण हटाने से पहले यह समझना चाहिए कि वे किस तरह के जोखिम को रोकते थे। यदि किसी कर्मचारी की जांच की जगह कंप्यूटर प्रणाली ले लेती है या कर्ज देने का फैसला तुरंत होने लगता है, तो इससे जुड़ा जोखिम अपने आप खत्म नहीं हो जाता। ऐसे में सुरक्षा के तरीकों को भी नई व्यवस्था के अनुसार बदलना होगा।
स्वामीनाथन के मुताबिक, स्वतंत्र जांच, दो कर्मचारियों से काम की पुष्टि और लेनदेन के बीच कुछ समय का अंतर जैसी व्यवस्थाएं प्रक्रिया को धीमा कर सकती हैं, लेकिन इनसे गलतियों, धोखाधड़ी और गलत लोगों को कर्ज देने की आशंका कम होती है। केवल तेजी और सुविधा के नाम पर ऐसी व्यवस्थाएं हटाना बैंकों के लिए नुकसानदेह हो सकता है।
उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि बैंक किसी तीसरी कंपनी की मदद से काम करें, तब भी उसकी जिम्मेदारी खत्म नहीं होती। चाहे किसी वित्तीय तकनीक कंपनी के जरिए कर्ज के ग्राहक जुटाए जाएं, बाहरी मंच से उत्पाद बेचे जाएं या किसी दूसरी कंपनी की प्रणाली से फैसला लिया जाए, जिम्मेदारी संबंधित बैंक की ही रहती है।
ग्राहकों के भरोसे पर बात करते हुए डिप्टी गवर्नर ने कहा कि वित्तीय संस्थानों को इसे लगातार बनाए रखने के लिए काम करना चाहिए। यदि उत्पाद बेचने का दबाव ग्राहकों की जरूरत समझने से ज्यादा हो जाए, तो कारोबार बढ़ने के बावजूद भरोसा कमजोर हो सकता है। इसका असर ग्राहकों के दूर होने, मुकदमों, नियामकीय जुर्माने और संस्थान की छवि पर पड़ सकता है।
उन्होंने ग्राहकों के आंकड़ों के इस्तेमाल पर भी सावधानी बरतने को कहा। केवल सहमति लेना काफी नहीं है, बल्कि यह भी देखना चाहिए कि आंकड़ों का उपयोग ग्राहक की उचित अपेक्षाओं के मुताबिक हो रहा है या नहीं।
स्वामीनाथन ने कहा कि ग्राहकों की शिकायतों को केवल निपटाकर बंद नहीं करना चाहिए। उनसे उत्पादों की कमियों, गलत प्रोत्साहन और डिजिटल सेवाओं में मौजूद समस्याओं का पता लगाया जा सकता है। धोखाधड़ी के मामलों में भी ग्राहक अक्सर यह अंतर नहीं कर पाते कि गड़बड़ी किस बैंक में शुरू हुई, पैसा कहां से गुजरा और किस खाते में पहुंचा। ऐसे में पूरे वित्तीय तंत्र पर भरोसा प्रभावित होता है।
गौरतलब है कि बैंकिंग व्यवस्था की संपत्ति गुणवत्ता में सुधार हुआ है और बैंकों के पास पर्याप्त पूंजी है। स्वामीनाथन ने कहा कि आगे बढ़ते समय इन मजबूती को बनाए रखना जरूरी है। बैंकों की सफलता केवल तेजी से बढ़ने में नहीं, बल्कि सुरक्षित कामकाज, निष्पक्ष व्यवहार और ग्राहकों का भरोसा कायम रखने में भी है।