RBI ने Repo Rate नहीं बदला, पर Iran संकट से Indian Economy पर मंडराया खतरा

By Ankit Jaiswal | Apr 08, 2026

देश के केंद्रीय बैंक ने ब्याज दरों में कोई बदलाव नहीं करते हुए उन्हें 5.25 प्रतिशत पर बरकरार रखा है, लेकिन साथ ही ईरान से जुड़े तनाव को लेकर महंगाई और वृद्धि पर जोखिम की चेतावनी भी दी है।

बता दें कि केंद्रीय बैंक ने चालू वित्त वर्ष की पहली दो तिमाहियों के लिए विकास दर के अनुमान में मामूली कटौती की है। अप्रैल से जून तिमाही के लिए वृद्धि अनुमान 6.9 प्रतिशत से घटाकर 6.8 प्रतिशत किया गया है, जबकि जुलाई से सितंबर तिमाही के लिए इसे 7.0 प्रतिशत से घटाकर 6.7 प्रतिशत कर दिया गया है।

गौरतलब है कि हाल के महीनों में कच्चे तेल और अन्य वस्तुओं की कीमतों में बढ़ोतरी देखी गई है, जिसका एक बड़ा कारण पश्चिम एशिया में तनाव और होरमुज जलमार्ग में आपूर्ति बाधित होना है। इस मार्ग से दुनिया का बड़ा हिस्सा तेल और गैस गुजरता है, जिससे आपूर्ति प्रभावित होने पर भारत जैसे आयातक देशों पर सीधा असर पड़ता है।

मौजूद जानकारी के अनुसार उपभोक्ता महंगाई दर भी लगातार चौथे महीने बढ़कर 3.21 प्रतिशत तक पहुंच गई है। हालांकि खाद्य कीमतों को लेकर स्थिति फिलहाल नियंत्रित बताई जा रही है, लेकिन ऊर्जा कीमतों में बढ़ोतरी आगे चलकर महंगाई को बढ़ा सकती है।

बता दें कि भारत ने हाल के समय में मजबूत आर्थिक वृद्धि दर्ज की है और यह दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है। दिसंबर तिमाही में देश की वृद्धि दर 7.8 प्रतिशत रही थी, जो अनुमान से बेहतर थी। लेकिन विशेषज्ञ मानते हैं कि वैश्विक हालात इस रफ्तार को प्रभावित कर सकते हैं।

गौरतलब है कि मुख्य आर्थिक सलाहकार वी. अनंत नागेश्वरन ने भी पहले चेतावनी दी थी कि अगले वित्त वर्ष के लिए 7 से 7.4 प्रतिशत की वृद्धि दर पर नीचे की ओर दबाव बन सकता है। उनके अनुसार तेल, गैस और उर्वरक जैसी जरूरी वस्तुओं की आपूर्ति में बाधा और लागत में बढ़ोतरी से अर्थव्यवस्था पर असर पड़ेगा।

मौजूद जानकारी के अनुसार हालिया सर्वेक्षणों में भी निजी क्षेत्र की गतिविधियों में सुस्ती के संकेत मिले हैं, जिसमें कंपनियों ने वैश्विक अस्थिरता, महंगाई और युद्ध के असर को प्रमुख कारण बताया है।

हालांकि कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि महंगाई फिलहाल नियंत्रण में रह सकती है और 6 प्रतिशत से ऊपर जाने की संभावना कम है, लेकिन आर्थिक वृद्धि पर जोखिम ज्यादा बड़ा दिखाई दे रहा है। साथ ही अगर वैश्विक स्तर पर अन्य देश ब्याज दरें बढ़ाते हैं और रुपये पर दबाव आता है, तो भविष्य में नीतिगत कदम उठाए जा सकते हैं।

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