By प्रभासाक्षी न्यूज़ डेस्क | Oct 07, 2026
मुंबई, सात अक्टूबर भारतीय रिजर्व बैंक ने बुधवार को उम्मीद के मुताबिक प्रमुख नीतिगत ब्याज दर रेपो को 0.25 प्रतिशत बढ़ाकर 5.50 प्रतिशत कर दिया। करीब चार साल में यह रेपो दर में पहली बढ़ोतरी है। इसके साथ ही केंद्रीय बैंक ने महंगाई बढ़ने और रुपये की विनिमय दर में गिरावट के साथ नीतिगत रुख बदलते हुए आने वाले समय में भी दर बढ़ाने के संकेत दिए।
छह सदस्यीय मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) ने आम सहमति से रेपो दर बढ़ाने के पक्ष में फैसला किया। दिसंबर, 2024 में गवर्नर संजय मल्होत्रा के पदभार संभालने के बाद यह पहला मौका है जब नीतिगत दर बढ़ायी गयी है। यह फैसला हालांकि व्यापक रूप से अपेक्षित था, लेकिन केंद्रीय बैंक का अपने नीतिगत रुख को तटस्थ से बदलकर ‘सूझ-बूझ के साथ सख्त’ करने का निर्णय कुछ हद तक चौंकाने वाला है।
इससे निकट अवधि में दर में कटौती की संभावना लगभग समाप्त हो गई है। मल्होत्रा ने सोमवार से शुरू तीन दिन की मौद्रिक नीति समिति की बैठक में लिए गए फैसलों की घोषणा करते हुए कहा, ‘‘निकट अवधि में नीतिगत दर में कटौती का विकल्प नहीं है और आगे की नीतिगत कार्रवाई बदलती परिस्थितियों तथा आर्थिक परिदृश्य के आधार पर केवल दर बढ़ाने या यथास्थिति बनाए रखने तक सीमित रह सकती है।’’ हालांकि, उन्होंने आगाह किया कि आगे मौद्रिक सख्ती का समय और उसकी सीमा महंगाई तथा आर्थिक वृद्धि की स्थिति पर निर्भर करेगी। खासकर, कीमतों पर बुनियादी दबाव और इस बात पर ध्यान दिया जाएगा कि आपूर्ति संबंधी झटके व्यापक अर्थव्यवस्था में किस हद तक स्थायी रूप लेते हैं।
यह फरवरी, 2023 के बाद पहला मौका है जब नीतिगत दर में वृद्धि की गयी है। इससे पहले पिछले साल फरवरी से दिसंबर, 2025 तक रेपो दर में कुल 1.25 प्रतिशत की कटौती की गई थी। इस साल फरवरी, अप्रैल, जून तथा अगस्त की द्विमासिक मौद्रिक नीति समीक्षा में नीतिगत दर में कोई बदलाव नहीं किया गया था।
इस फैसले के साथ भारत उन प्रमुख केंद्रीय बैंकों की कतार में शामिल हो गया है, जिन्होंने महंगाई बढ़ने के बीच ब्याज दरों में वृद्धि की है। ईरान युद्ध के कारण कच्चे तेल की कीमतों में तेजी से महंगाई बढ़ रही है। इससे लोगों की क्रय शक्ति प्रभावित हो रही है और मुद्राओं पर दबाव बढ़ रहा है।
अल नीनो से जुड़ी कमजोर बारिश ने भी कीमतों पर दबाव बढ़ाया है। आर्थिक गतिविधियां मजबूत रहने के बावजूद महंगाई का दबाव व्यापक हुआ है। उपभोक्ता मूल्य सूचकांक आधारित मुद्रास्फीति अगस्त में बढ़कर 4.82 प्रतिशत हो गई, जो लगातार तीसरे महीने आरबीआई के चार प्रतिशत के मध्यम अवधि के लक्ष्य से ऊपर रही।
इस दौरान मुख्य (कोर) मुद्रास्फीति भी बढ़कर 4.2 प्रतिशत हो गई। केंद्रीय बैंक ने कहा कि महंगाई का जोखिम अब एक साल पहले की तुलना में अधिक बढ़ गया है। इसका कारण खाद्य और ईंधन की ऊंची कीमतों, मानसून की कमी, अल नीनो की स्थिति तथा अंतरराष्ट्रीय तेल कीमतों में फिर से बढ़ी अस्थिरता है।
आरबीआई ने वित्त वर्ष 2026-27 में खुदरा महंगाई के औसतन 5.2 प्रतिशत रहने का अनुमान जताया है। तीसरी तिमाही में इसके छह प्रतिशत और चौथी तिमाही में 5.7 प्रतिशत रहने का अनुमान है। मल्होत्रा ने कहा, ‘‘महंगाई के व्यापक होने के शुरुआती संकेत भी मिले हैं।’’ उन्होंने मुख्य महंगाई (ईंधन और खाद्य पदार्थों की महंगाई को हटाकर) में वृद्धि और उपभोक्ता मूल्य सूचकांक में शामिल अपेक्षाकृत अधिक वस्तुओं की कीमतों में बढ़ोतरी का उल्लेख किया।
पश्चिम एशिया में संघर्ष बढ़ने के बाद कच्चे तेल की कीमत एक प्रमुख जोखिम बनकर उभरी है। आरबीआई के अनुसार, भारतीय कच्चे तेल की औसत कीमत सितंबर में बढ़कर 116.1 डॉलर प्रति बैरल हो गई, जो जुलाई में 82 डॉलर थी। खाद्य कीमतों का दबाव भी व्यापक हुआ है।
केंद्रीय बैंक ने चीनी और प्याज की कीमतों में तेज वृद्धि का उल्लेख करते हुए महंगाई के और व्यापक होने के शुरुआती संकेतों को लेकर आगाह किया। इन सबके बीच, आरबीआई ने वित्त वर्ष 2026-27 के लिए आर्थिक वृद्धि दर का अनुमान 0.40 प्रतिशत बढ़ाकर 7.1 प्रतिशत कर दिया है। पहली तिमाही में अर्थव्यवस्था 7.8 प्रतिशत की दर से बढ़ी थी।
केंद्रीय बैंक ने कहा कि दूसरी तिमाही में आर्थिक गतिविधियां मजबूत बनी रहीं। हालांकि, वृद्धि की गति कुछ धीमी हुई है। विनिर्माण और सेवा क्षेत्र में विस्तार जारी रहा, जबकि पूंजीगत वस्तुओं का उत्पादन, कर्ज वृद्धि और उपभोक्ता खर्च आर्थिक गतिविधियों को समर्थन दे रहे हैं।
मल्होत्रा ने कहा, ‘‘भारतीय अर्थव्यवस्था मजबूत है और आर्थिक गतिविधियों में व्यापक आधार पर तेजी बनी हुई है।’’ वैश्विक चुनौतियों के बावजूद अर्थव्यवस्था के मजबूत बने रहने की उम्मीद है। हालांकि, आरबीआई ने आगाह किया कि कमजोर मानसून, वैश्विक तनाव, ऊंची जिंस कीमतों, व्यापार तनाव और वैश्विक वित्तीय परिस्थितियों का सख्त होना आर्थिक वृद्धि के लिए जोखिम है। मल्होत्रा ने कहा, ‘‘महंगाई बढ़ने की आशंका और उसके व्यापक होने के कुछ प्रमाण हैं, लेकिन आपूर्ति संबंधी दबावों के कंपनियों के कीमत तय करने के व्यवहार में स्थायी रूप लेने के सीमित संकेत हैं।’’ आरबीआई का नीतिगत रुख में बदलाव बढ़ते महंगाई दबाव को नियंत्रित करने और मजबूत घरेलू वृद्धि को बनाए रखने के बीच संतुलन बनाने की कोशिश को दर्शाता है।
केंद्रीय बैंक ने कहा कि नीतिगत दर बढ़ाने की अवधि और सीमा वास्तविक वृद्धि और महंगाई के परिणामों पर निर्भर करेगी। केंद्रीय बैंक के अनुसार, वैश्विक जोखिम भी बढ़े हैं। पश्चिम एशिया में संघर्ष, बॉण्ड पर प्रतिफल में वृद्धि, व्यापार संबंधी अनिश्चितता और कृत्रिम मेधा से जुड़ी कंपनियों के शेयरों के मूल्यांकन में तेज गिरावट के जोखिम आर्थिक परिदृश्य के लिए खतरा हैं।
मल्होत्रा ने कहा, ‘‘हम कीमतों और वित्तीय स्थिरता बनाए रखने का प्रयास करेंगे, क्योंकि दीर्घकालिक टिकाऊ वृद्धि के लिए दोनों जरूरी हैं।’’ नीतिगत दर पर फैसला ऐसे समय हुआ है जब बैंकों में नकदी की उपलब्धता पर्याप्त बनी हुई है और कर्ज वृद्धि तेज हुई है। पिछली मौद्रिक नीति बैठक के बाद से आरबीआई की नकदी समायोजन व्यवस्था के तहत औसत दैनिक अतिरिक्त नकदी 5.9 लाख करोड़ रुपये रही है। वहीं, 15 सितंबर तक बैंक कर्ज वृद्धि बढ़कर 18.1 प्रतिशत हो गई जो एक साल पहले इस दौरान 10.4 प्रतिशत थी।
मौद्रिक नीति समिति की अगली बैठक दो से चार दिसंबर को होगी।