By प्रभासाक्षी न्यूज़ डेस्क | Oct 07, 2026
नयी दिल्ली, सात अक्टूबर भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) द्वारा अपने मौद्रिक नीति रुख को तटस्थ से बदलकर सूझ-बूझ के साथ सख्त करने के बाद विशेषज्ञों ने बुधवार को कहा कि केंद्रीय बैंक आगामी दिसंबर की नीतिगत समीक्षा में रेपो दर में 0.50 प्रतिशत तक की एक और बढ़ोतरी कर सकता है। अगली द्विमासिक मौद्रिक नीति समीक्षा चार दिसंबर को होनी है। इससे पहले भारतीय रिजर्व बैंक ने अपनी प्रमुख नीतिगत दर रेपो को 0.25 प्रतिशत बढ़ाकर 5.50 प्रतिशत कर दिया है।
अधिक आक्रामक दर वृद्धि का जोखिम इस बात पर निर्भर करेगा कि क्या पश्चिम एशिया का मौजूदा संघर्ष और कच्चे तेल की कीमतों में उछाल लंबे समय तक जारी रहता है। इक्रा की मुख्य अर्थशास्त्री अदिति नायर ने कहा कि कमजोर मानसून, बढ़ती जिंस कीमतों और प्रतिकूल आधार प्रभाव जैसे कारकों के चलते आने वाले समय में मुद्रास्फीति के आंकड़े और बढ़ने की आशंका है, जिससे फिलहाल दिसंबर में एक और दर वृद्धि की जमीन तैयार हो गई है। उन्होंने कहा कि खाद्य और ईंधन, दोनों मोर्चों पर मौजूदा मुद्रास्फीति के रुझानों ने आरबीआई पर भारी दबाव डाला है, जिसके चलते उसे रेपो दर बढ़ानी पड़ी है।
रिसर्जेंट इंडिया के प्रबंध निदेशक ज्योति प्रकाश गडिया ने कहा कि अगली कम से कम दो तिमाहियों में दरों में और वृद्धि हो सकती है, जिससे मुद्रास्फीति पर प्रभावी अंकुश लगाने और स्थिरता सुनिश्चित करने में मदद मिल सकती है। इसी तरह का विचार व्यक्त करते हुए यस बैंक के मुख्य अर्थशास्त्री इंद्रनील पान ने कहा, ‘‘दिसंबर में 0.25 प्रतिशत की बढ़ोतरी अब तय मानी जा रही है। आरबीआई आंकड़ों पर निर्भर रहेगा और दरों में कुल बढ़ोतरी तय करने के लिए आने वाले महीनों में मुद्रास्फीति को ध्यान में रखेगा।’’ क्रिसिल की प्रधान अर्थशास्त्री दीप्ति देशपांडे ने कहा कि हाल के महीनों में खुदरा मुद्रास्फीति बढ़ी है, जबकि कच्चे तेल, जिंसों और खाद्य कीमतों से जुड़े जोखिम अधिक स्पष्ट हो गए हैं।
उन्होंने कहा कि सूझ-बूझ के साथ सख्त रुख से केंद्रीय बैंक को मुद्रास्फीति की ताजा स्थिति के आधार पर दरों में बढ़ोतरी करने या उन्हें यथावत रखने का विकल्प मिलता है। पीडब्ल्यूसी इंडिया के भागीदार और आर्थिक सलाहकार सेवा प्रमुख रानेन बनर्जी ने भी कहा कि मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) द्वारा रेपो दर में बढ़ोतरी की व्यापक उम्मीद थी। भविष्य के कदम अब अमेरिकी फेडरल रिजर्व के रुख, वैश्विक बॉण्ड प्रतिफल की चाल, खाद्य मुद्रास्फीति की दिशा और कच्चे तेल की कीमतों पर निर्भर करेंगे।