By अभिनय आकाश | Jan 15, 2026
ईरान की सड़क पर जब एक महिला एक हाथ में सिगरेट लेकर ईरान के सर्वोच्च नेता के पोस्टर को आग लगाती है तो यह तस्वीर 21वीं सदी के इतिहास से किताबों में दर्ज होने वाली तस्वीर बन जाती है। यह तस्वीर है जो बता रही है कि पोस्टर सिर्फ खामनोई का नहीं जल रहा। और जो सिगरेट से धुआं निकल रहा है वो ईरान को जलाने वाला है। जी हां, नेपाल, बांग्लादेश, श्रीलंका और पाकिस्तान के बाद अब क्रांति की आग एक और देश में भड़क उठी है। लोग सड़कों पर उतर आए हैं और विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। उनका सब्र टूट चुका है और वे तानाशाही को और बर्दाश्त नहीं करना चाहते। उन्होंने इसके खिलाफ आवाज उठाना शुरू कर दिया है। उन्होंने अपनी मांगें रखी हैं। इजराइल अमेरिका नजर गड़ाए बैठे हैं कि बस मौका मिले और खामोनी के साथ वही कर दें जो वेनेजुला में मादरों के साथ किया था। ईरान पर क्या अमेरिका हमला करने की तैयारी कर चुका है? क्या इजराइल के भीतर सेना तैयार है? और मिडिल ईस्ट के भीतर कतर में जहां पर अल उबद एयरबेस अमेरिका का है वहां पर बड़ी तादाद में F35 दिखाई दे रहे हैं। इन सबके बीच अमेरिकी टैंकर बमबर सब तैयार है लेकिन कोई हमला अभी होना नहीं चाहिए। मिलिट्री अटैक होल्ड पर है। उसके पीछे की वजह क्या है? क्या इस दौर में ईरान के भीतर की स्थितियां खामनई के अनुकूल है? खामनई के साथ चीन और रूस जिस तर्ज पर खड़े हैं, क्या उसमें अमेरिका सीधे हमला करने से कतरा रहा है? या फिर ईरान के विदेश मंत्री जब खुले तौर पर यह कहने से चूक नहीं रहे हैं कि हम तो बातचीत के लिए भी तैयार हैं और जंग के लिए भी तैयार हैं।
रूस रूस और चीन ईरान के मित्र देश हैं। अमेरिकी हमले की सिचुएशन में इन दोनों देशों की भूमिका अहम होगी। लेकिन एक्स्पर्ट का मानना है कि रूस यूक्रेन युद्ध से कमजोर स्थिति में है। और चीन ने बहुत सालों से कोई युद्ध नहीं लड़ा है। ऐसे में अमेरिका को लग रहा है कि ईरान की सरकार आर्थिक संकट में है। सुप्रीम लीडर खामेनेई बूढ़े हो चुके हैं। पिछले साल इस्राइल से युद्ध में ईरान को नुकसान हुआ और मिडिल ईस्ट में ईरान की ताकत कमजोर हुई है। सीएनएन की रिपोर्ट के मुताबिक अमेरिका के कुछ पूर्व अधिकारियों का मानना है कि अगर ट्रंप कुछ नहीं करते, तो उनकी विश्वसनीयता कमजोर हो सकती है। दूसरी तरफ मानवाधिकार के नजरिये से भी कार्रवाई की मांग बढ़ रही है, क्योंकि मरने वालों की संख्या बहुत ज्यादा है। ईरान में वास्तविक बदलाव बाहर से सैन्य बल के जरिए नहीं लाया जा सकता।
अमेरिका की सैन्य कार्रवाई से हालात और बिगड़ सकते हैं। प्रदर्शनकारियों को फायदा होने की कोई गारंटी नहीं है, क्योंकि ईरान में कोई मज़बूत विपक्षी नेतृत्व नहीं दिख रहा है। ऐसे में शासन गिरा तो देश में अराजकता फैल सकती है। शरणार्थी संकट और क्षेत्रीय अस्थिरता बढ़ सकती है। वहीं ईरान पहले ही बोल चुका है कि अगर अमेरिका ने हमला किया तो वह इस्राइल और अरब के दूसरे देशों में मौजूद अमेरिकी ठिकानों को निशाना बनाएगा। दूसरी तरफ इतिहास बताता है कि अमेरिका के कई सैन्य हस्तक्षेप (जैसे इराक, अफगानिस्तान, लीबिया) बाद में उलझन भरे साबित हुए। तेल की कीमतों में इजाफा हो सकता है।
कई मीडिया के जानकार दावा करने लगे कि डोनाल्ड ट्रंप की फौज अयातुल्लाह अली खामिनाई को भी उसी तरह ले जाएगी जिस तरह मादुरों को ले गई थी। लेकिन क्या ये सच में मुमकिन है? सिक्योरिटी की पहली लेयर इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर आईआरजीसी ईरान की पैरामिलिट्री फोर्स जिसकी वफादारी सिर्फ और सिर्फ सुप्रीम लीडर के प्रति है। इस्लामिक शासन के प्रति है। 1990 हजार लड़ाकों का संगठन संगठन जिसकी अपनी पैरामिलिट्री विंग है। बासेज रेजिस्टेंस फोर्स आईआरजीसी के पास अपने पारंपरिक हथियार अपना खुद का टैंक बख्तरबंद गाड़ियां रडार फाइटर जेट्स नौसेना के जहाज और पनडुब्बियां हैं। सेकंड लेयर ऑफ सिक्योरिटी सिपाह वली-ए अमीर आईआरजीसी के सबसे खतरनाक और ट्रेंड सैनिकों की एक अलग टुकड़ी 10,000 से ज्यादा जवान इस स्पेशल प्रोटेक्शन टीम का हिस्सा हैं जो 24ों घंटे खामिनई के इर्द-गिर्द रहते हैं। कतई किलर मशीन इनके ऑपरेट करने का तरीका इस बात से जानिए कि लंबे समय तक तो दुनिया की तमाम एजेंसियों को यह पता तक नहीं था कि वली-ए अमीर नाम की कोई टुकड़ी एकिस्ट भी करती है। थर्ड लेयर ऑफ सिक्योरिटी, बैलस्टिक मिसाइलें, शाहब वन, शाहब टू, शाहब थ्री, गदर वन, सजिल टू और फतेह 110 जैसी तमाम छोटी और मध्यम दूरी की मिसाइलें। जिनमें से ज्यादातर का बट आईआरजीसी के ही हाथ में है। अगर किसी देश ने सुप्रीम लीडर तक हमला करने की कोशिश की तो धड़ाधड़ मिसाइल दागी जा सकती है। ये ही मिसाइलें हैं जिन्होंने इजराइल के आयरन डोम को कागज के गत्ते की तरह भेद दिया था।
ईरान पहले भी कई बड़े विरोध देख चुका है। इनमें 2009, 2017-18, 2019 और 2022 में फैली अशांतियां प्रमुख हैं। हर बार बाहरी लोगों ने शासन के पतन की अटकलें लगाई और हर बार वही व्यवस्था कायम रही। इसकी वजह उन फैक्टर्स की गैरमौजूदगी है, जो सत्ता में बदलाव का दम रखते हैं। वहां ऐसा कोई एकीकृत राष्ट्रीय नेतृत्व नहीं है, जो विरोधों को दिशा दे सके। विपक्ष के नेता अकसर बाहर ही रहे हैं। ईरानी समाज में उनकी विश्वसनीयता नहीं है। ऐसे में विरोध-प्रदर्शन अचानक भड़कते तो हैं, लेकिन मजबूत नहीं हो पाते। ईरान की सुरक्षा में कोई दरार भी नहीं है।