असली प्रदूषण और नकली बुद्धि (व्यंग्य)

By संतोष उत्सुक | Mar 18, 2026

असली चीजों और भावनाओं के आराम के दिन आ गए हैं। ऐसे अच्छे दिन पहले आ गए होते तो कई तरह की बचत हो जाती। चलो कोई बात नहीं, देर आए दरुस्त आए। यह तो दिल और दिमाग से महसूस किए जाने वाले सम्मान की बात है कि पुराना जिद्दी प्रदूषण कम करने के लिए नई बुद्धि, नए रास्ते खोज रही है। कृत्रिम बुद्धि का भावार्थ ही नई बुद्धि लिया जा रहा है। 

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अधिकांश बुद्धिजीवियों, अबुद्धिजीवियों, समाज सेवियों, असमाज सेवियों, राजनीतिक नेताओं, राजनीतिक अभिनेताओं, पर्यावरण विद्वानों और पर्यावरण चर्चा और खर्चा से सामाजिक महत्त्व प्राप्त करने वाले महानुभावों को स्पष्ट रूप से पता है कि इंसानी दिमाग में पकाए तौर तरीके, सरकारी उपाय, सख्त अनुशासन, ईमानदार और पारदर्शी प्रयास वगैरा सब बुरी तरह थककर, आराम घर में घुस गए हैं। असली बुद्धि असफल हो जाए तो ज़ाहिर है नकली बुद्धि का ही सहारा लेना पड़ेगा। अब उसके परिणामों और फायदों का मज़ा लेने का मौसम आया है। असली बुद्धि की नदी से निकले जानदार, ताक़तवर, शानदार और समझदार उपायों के चमकीले पत्थर तो कब से प्रयोग हो रहे हैं।   

ज़िंदगी में तो कब से दर्जनों नकली चीज़ों की बहार है। इसलिए भी मान सकते हैं कि नकली बुद्धि, असली से बेहतर काम करेगी। प्रदूषण का रियल टाइम डाटा उपलब्ध कराएगी। स्रोतों की सटीक पहचान करेगी जिससे उन जगहों की सूक्ष्म स्तर पर पहचान हो पाए। फिर उसके प्रभाव का वैज्ञानिक आकलन आसान हो सकेगा और लक्ष्य आधारित और समयबद्ध कार्रवाई सुझाई जा सकेगी। वास्तविक और व्यावहारिक कार्रवाई तो इंसानजी ही करेंगे या करवाएंगे जिसमें वह पूरी तरह माहिर हैं।  

इतिहास झूठ बोलता है कि सरकारी एजेंसियां कभी समन्वय आधारित कार्रवाई नहीं कर पाती। यह तो हमारी स्थापित लोकतान्त्रिक, चारित्रिक और सांस्कृतिक परम्परा है कि नए प्रयोगों को आत्मसात किया जाए। अब उसी योजना के तहत नकली बुद्धि आधारित मॉडल से पूछेंगे  कि नगर निगम, जिला प्रशासन, प्रवर्तन एजेंसियां, तकनीकी संस्थान और इंसान ने नैसर्गिक बुद्धि का प्रयोग कर, उचित  प्लेटफार्म पर काम का अभिनय और वास्तविक अमल कितना किया। दिलचस्प है कृत्रिम बुद्धि सभी संस्थाओं की ज़िम्मेदारी तय करेगी और सदियों से इंसानी दिमाग में रह रही अक्ल उसे आदेश मानकर संभवत कार्रवाई भी करेगी। यह कुछ अमानवीय सा कार्य होगा।  

‘संभव’ शब्द ज़िंदगी में आ ही जाता है। जब महाभारत में अनेक किंतु, परन्तु और कदाचित वगैरा आ सकते हैं तो भारत में भी आ ही सकते हैं। अलग अलग मोर्चों पर कार्रवाई करना वास्तव में मुश्किल होता है, शक्ति विभाजित हो जाती है। इसलिए अब एक साथ, बहुत ज़्यादा असली, प्रभाव पैदा करने वाली सख्त, कृत्रिम कार्रवाई की जा रही है। प्रदूषण फैलाने वाले, असली, चालाक और स्वार्थी बुद्धि वालों की नींद उड़ गई है। ऐसा अभी माना जा रहा है लेकिन सिर्फ माने जाने से क्या होता है जी । अभी तो असली बुद्धि और भावनाओं के आराम के दिन शुरू हुए हैं। 

- संतोष उत्सुक

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