भारत को वो असली धुरंधर, जिसने हिज्बुल मुजाहिदीन की जड़ें हिला दीं | Matrubhoomi

By अभिनय आकाश | Jan 10, 2026

मार्च 2004 श्रीनगर की गहराइयों में बर्फीली पहाड़ी पर लकड़ी के घर में आतंकियों में अलग ही गहमागहमी मची हुई थी। हिजबुल मुजाहदीन का इफ्तिखार नाम का आतंकी रसोई में काहबा उबाल रहा था और दूसरे कमरे में अबू तुरारा और अबू सब्जार नाम के आतंकी आपस में कुछ फुसफुसा रहे थे। इसके बाद यह दोनों अपनी AK-47 को लोड कर लेते हैं और तभी इफ्तिखार ट्रे में काहबा के तीन कप पकड़े हुए कमरे में दाखिल होता है। इफ्तिखार को देखते ही काहबा के गिलास उठाने की जगह सब्ज़ार उस पर अपनी AK-47 तान देता है और गुस्से में कहता है इफ्तिखार मैं आखिरी बार पूछूंगा तुम कौन हो? इफ्तिखार अपने साथियों का ऐसा व्यवहार देख बड़ी सावधानी से ट्रे को नीचे रखता है और तुरंत हाथ ऊपर करके तुरारा की आंखों में देखते हुए कहता है भाईजान मैंने आपको अपनी पूरी कहानी बताई थी फिर भी आपको विश्वास नहीं हो रहा। एक काम करो आप मुझे अभी गोली मार दो, इतना सुन तुरारा और सब्जार एक दूसरे की तरफ देखने लगते हैं। तुरारा हां में सर हिलाता है जिसके बाद सब्जार अपनी बंदूक नीचे कर लेता है। इसके बाद दोनों जमीन पर रख ही ट्रे से अपना-अपना काहबा का गिलास उठाते हैं और सामने रखी चारपाई की तरफ आगे बढ़ते हैं। जैसे ही इन दोनों की पीठ इफ्तिखार की तरफ होती है, वो तुरंत अपना बड़ा सा शॉल साइड करके अपनी कमर से पिस्तौल निकाल के लोड करता है। पिस्तौल लोड होने की आवाज सुनते ही तुरारा और सब्जार गर्दन घुमाते हैं। इतने में ही इफ्तिखार एक-एक करके दो गोली इनकी छाती से आर-पार कर देता है। यह इन आतंकियों के बीच कोई आपसी मनमुटाव नहीं था बल्कि यह इफ्तिखार भारत की वन पैरा एसएफ के जांबाज कमांडो मोहित शर्मा थे जो इन दोनों खूंखार आतंकियों को पिछले दो महीनों से मारने की ताक में थे।

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रोहतक की ठंडी सुबह थी। एक छोटा बच्चा स्कूल जाने की तैयारी कर रहा था। बेटा क्या बनोगे बड़े होकर? उसका नाम मोहित शर्मा था। घर में चिंटू एनडीए में माई और भारत के लिए शैडो वॉरियर। सपनों का यूनिफार्म इंजीनियरिंग की किताबें बंद हो चुकी थी। उसे अपना जीवन, गणित और मशीनों नहीं, धरती और देश को देना था। एनडीए के गेट पर कदम रखते ही उसने महसूस किया यह मात्र प्रशिक्षण नहीं यह रूपांतरण है। 1999 में कमीशन मिला। फिर उसने चुना वह रास्ता जहां से लौट कर आने की कोई गारंटी नहीं होती। वेट पारा स्पेशल फोर्सेस जहां हर पल मौत के साथ दोस्ती करनी पड़ती है। उसने मौत से दोस्ती कर ली क्योंकि उसे जिंदगी से प्यार था और देश से भी। 2004 का साल कश्मीर दहशत से भरा हुआ था। दुश्मनों में घुसने का प्लान बना। एक कमांडो ने अपनी पहचान उतार को बदला और नया नाम लिया इफ्तिखार भट्ट। उसने कहा मेरा भाई सेना ने मार दिया। मैं बदला लेना चाहता हूं। आतंकियों ने उसका चेहरा देखा। उसकी आंखें परखी। उसकी नब्ज़ जांची। उसे शक हुआ पिस्तौल उसके सिर पर लगा दी गई। कमरे में सन्नाटा था। धड़कनें जैसे रोक दी गई। लेकिन उसने मुस्कुराते हुए कहा। अगर भरोसा नहीं तो गोली मार दो। उसी क्षण उसनेबिजली की रफ्तार से 9 एमएम निकालकर दो बड़े आतंकियों को वहीं खत्म कर दिया और पल भर में वह दुश्मनों का साझेदार नहीं उनका अंत बन चुका था। इस मिशन की रिपोर्ट आज भी पूरी दुनिया नहीं जानती।

अक्टूबर 2008 फिर कश्मीर का बुलावा आया। मार्च 2009 में कश्मीर में बर्फ पिघल रही थी। 20 मार्च की दोपहर कुपवाड़ा बेस खबर आई कि हफूदा जंगल में आतंकी घुसे हैं। मेजर मोहित को 25 कमांडोस के साथ आर्डर मिला। रात 2:30 बजे निकले। सुबह 4:00 बजे जगह पर थे। चारों तरफ घना जंगल कोई सुराग नहीं। सुबह 8:00 बजे तीन टीमों बंटे। मोहित खुद एक टीम के साथ। बर्फ में पैरों के निशान मिले। एक के ऊपर मतलब आतंकी हाईली ट्रेंड थे। पीछा किया। तभी दूसरी टीम का मैसेज आया दो आतंकी दिखे हैं। अगले ही पल जंगल में गोलियों की बौछार होने लगी। रेडियो पर आर्डर आया कि राकेश चोटी पर चढ़ो। ऊपर से बरसाओ। हवलदार राकेश चढ़े। गोली जांघ पर लगी। लेकिन फिर भी लड़खड़ाते हुए एक हाथ से फायरिंग जारी रखी। इसके बाद मोहित ने जवानों को पीछे भेजा और खुद कवर फायर किया। उनके साथी कहने लगे कि सर मोहित बोले नहीं आप जाओ मैं आता हूं। बात खत्म होते-होते गोली बाहों पर लगी। खून बहा लेकिन फिर भी फायरिंग जारी थी। ज्यादातर जवान कवर में पहुंचे तो फिर एक और आर्डर आया। तब तक गोली फिर लगी थी कोहनी पर, जिसे देख आतंकी खुश थे। लेकिन इसके बाद मोहित ने खुद एमजेल उठाया और एक दो तीन नहीं बल्कि छह ग्रेनेड से चार आतंकवादियों को ढेर कर दिया। फायरिंग रुकी मोहित कवर की तरफ दौड़े। तभी एक सन्नाटा चीरती गोली साइड से आ गई। गोली आरपार गई। मोहित लड़खड़ाए गिर पड़े। हालांकि मोहित ने अपने साथियों से कहा कि मैं ठीक हूं। आज इनमें से एक भी आतंकवादी बचकर जाना नहीं चाहिए। खून से लथपथ पेड़ से टेक लगाकर खड़े रहे। शाम 4:00 बजे तक निकाले गए। काफी खून बह चुका था। श्रीनगर बेस हॉस्पिटल रहे। पूरी रात ऑपरेशन चला लेकिन सुबह 31 साल की उम्र में वो शेर अमर हो गया था। पांच दिन में जंगल साफ हो गया था। सभी आतंकवादी मार दिए गए थे। बाद में पता चला कि एक के पास हाई ज़ूम स्नाइपर थी। इसलिए कवर से हटते ही गोली लग रही थी। मेजर मोहित समेत सात जवान शहीद हुए थे।

मेजर मोहित की वीरता के लिए देश का सबसे बड़ा शांति काल अवार्ड अशोक चक्र उन्हें मरणोपरांत मिला। मेजर मोहित की पत्नी, लेफ्टिनेंट कर्नल (तब मेजर) रिशिमा शर्मा, भी भारतीय सेना में एक ऑफिसर हैं। वह 2001 में आर्मी सर्विस कोर में सेना में शामिल हुईं, जो उनके पिता का भी कोर है। उनके भाई भारतीय सेना में कर्नल हैं, जो आर्टिलरी रेजिमेंट में सेवारत हैं। यह बताना जरूरी है कि रिशमा सरीन पहली महिला ऑफिसर थीं जो 2023 में अग्निवीर रिक्रूटर बनीं। गाजियाबाद मेट्रो स्टेशन से लेकर सड़कें स्टेडियम उनके नाम है। मगर सबसे बड़ा स्मारक तो हर हिंदुस्तानी का दिल है जहां पर आज भी वो जिंदा है। वो गरजते हैं, लड़ते हैं। और जब कोई पूछता है कि सच्चा हीरो कौन है? तो एक नाम निकलता है मेजर मोहित शर्मा। वो नाम जिसने साबित किया कि एक फौजी की सांस में पूरा हिंदुस्तान बसता है।

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