राष्ट्रवाद का चिंतन (पुस्तक समीक्षा)

By लोकेन्द्र सिंह | Nov 13, 2019

वैसे तो 'राष्ट्रवाद' सदैव ही जनसाधारण की चर्चाओं से लेकर अकादमिक विमर्श के केंद्र में रहता है। किंतु, वर्तमान समय में राष्ट्रवाद की चर्चा जोरों पर है। राष्ट्रवाद का जिक्र बार-बार आ रहा है। राष्ट्रवाद को 'उपसर्ग' की तरह भी प्रयोग में लिया जा रहा है, यथा- राष्ट्रवादी लेखक, राष्ट्रवादी संगठन, राष्ट्रवादी विचारक, राष्ट्रवादी राजनीतिक दल, राष्ट्रवादी नेता, राष्ट्रवादी मीडिया इत्यादि। ऐसे में लोगों की रुचि यह जानने-समझने में बहुत बढ़ गई है, आखिर ये राष्ट्रवाद है क्या? राष्ट्रवाद को अनेक प्रकार से परिभाषित किया गया है। राष्ट्रवाद को अलग-अलग दृष्टिकोण से देखा गया है। राष्ट्रवाद पर विभिन्न प्रकार के मत हैं। ऐसे में एक सामान्य व्यक्ति के लिए राष्ट्रवाद को समझना कठिन हो जाता है। वह भ्रमित हो जाता है, क्योंकि देश में एक वर्ग ऐसा है जो भारतीय राष्ट्रवाद पर पश्चिम के राष्ट्रवाद का रंग चढ़ा कर लोगों के मन में उसके प्रति चिढ़ पैदा करने के लिए योजनाबद्ध होकर लंबे समय से प्रयास कर रहा है। इनके प्रोपोगंडा लोगों को उलझा देते हैं।

पुस्तक के चौथे अध्याय में लेखक ने बेबाकी के साथ स्पष्ट कर दिया है कि राष्ट्रवाद की अवधारणा को समझने के लिए सबसे पहले लार्ड मैकाले एवं उसके मानसपुत्रों की सिखाई हुई असत्य तथ्यों और बातों को भूलना उचित होगा। राष्ट्रवाद को समझने में रुचि रखने वालों से लेखक का यह आग्रह उचित ही है। क्योंकि, जब तक हमारे पूर्वाग्रह होंगे, हम राष्ट्रवाद को निरपेक्ष भाव से समझ ही नहीं पाएंगे। भारत के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को समझना है, तब यह अत्यंत आवश्यक है कि हम अपने दिमाग के दरवाजे-खिड़कियां अच्छे से खोल लें। दरअसल, भारतीय दृष्टि में राष्ट्रवाद की अवधारणा संकुचित नहीं, बल्कि वृहद है। यह 'सर्वसमावेशी'। सबका साथ-सबका विकास। सब साथ आएं। इसलिए हमारे पूर्वजों ने वसुदैव कुटुम्बकम् की बात की। वहीं, यूरोप द्वारा परिभाषित और प्रस्तुत 'राष्ट्रवाद' अत्यंत संकुचित है। 'राष्ट्रवाद' का अध्ययन करने से पूर्व इस अंतर को समझने की आवश्यकता है। लेखक राजेन्द्र नाथ तिवारी की पुस्तक यह कार्य बखूबी करती है।

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पहले अध्याय में लेखक ने 'राष्ट्रवाद' के चिंतन और विकास को प्रस्तुत किया है। इस शब्द की उत्पत्ति और उसके वास्तविक अर्थ को समझाने का प्रयास किया है। भारतीय वांग्मय में यह शब्द कहाँ और किस संदर्भ में आया है, इसे भी लेखक ने बताया है। अगले तीन अध्यायों में उन्होंने विस्तार से भारतीय चिंतन में राष्ट्रवाद संबंधी विविध विचारों को प्रस्तुत किया है। वेदों, उपनिषदों और आधुनिक शास्त्रों में राष्ट्र की संकल्पना ने कैसे आकार लिया है, उसको संदर्भ सहित समझाया है। लेखक ने चिंतन की गहराई तक उतर कर कुछ महत्वपूर्ण तथ्य हम सबके सामने रखे हैं। इस पुस्तक के महत्व को रेखांकित करते हुए वरिष्ठ पत्रकार एवं चिंतक पद्मश्री राम बहादुर राय ने लिखा है कि पुस्तक की उपादेयता वर्तमान में सांस्कृतिक-राष्ट्रवाद एवं संचेतना के विकास के अध्ययन में पंडित दीनदयाल उपाध्याय सहित राष्ट्रवादीजनों, संघ के विचारकों, गीता की सार्थक उपयोगिता के लिए तो है ही, यह पुस्तक इतिहास लेखन की दृष्टि से भी गंभीर एवं नीति-रीति पर विचार करती है। वैदिक काल से आधुनिक काल के बीच की कड़ी को मिलाकर अध्ययन करने से पुस्तक इतिहासविदों एवं राष्ट्र के प्रति सचेष्ट अध्ययन के उत्सुकजनों को सीधे प्रभावित करेगी। दस अध्यायों में लेखक राजेन्द्र नाथ तिवारी ने 'राष्ट्रवाद: चिंतन एवं विकास' को एक सुव्यवस्थित आकार दिया है। नि:संदेह रूप से यह पुस्तक राष्ट्रवाद को लेकर भारतीय बोध को सुदृढ़ और मजबूत आधार देती है। लेखक के चिंतन में अध्ययन का महत्व भी यथेष्ट है। पुस्तक का व्यापक क्षेत्र सबको समाहित कर सबके लिए पठनीय एवं उपयोगी है।

पुस्तक- राष्ट्रवाद: चिंतन एवं विकास

लेखक: राजेन्द्र नाथ तिवारी

मूल्य: 230 रुपये

पृष्ठ: 160

प्रकाशक: समदर्शी प्रकाशन

मकान नंबर-1652, न्यू हाउसिंग बोर्ड, 

हुड्डा सेक्टर-1, रोहतक, हरियाणा-124001

-लोकेन्द्र सिंह

(समीक्षक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं और लंबे समय से पत्रकारिता से जुड़े हैं।)

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