वातावरण में Carbon Dioxide बढ़ने से बदल सकती है गेहूं में Protein की संरचना

By प्रभासाक्षी न्यूज़ डेस्क | Oct 19, 2026

वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड का स्तर बढ़ने से गेहूं में प्रोटीन की संरचना में महत्वपूर्ण बदलाव हो सकते हैं। इससे न केवल आटे से बनी चीजों की गुणवत्ता, बल्कि गेहूं से बने खाद्य पदार्थों को पचाने की क्षमता भी प्रभावित हो सकती है। एक नए अध्ययन में यह बात सामने आई है।

वर्ष 2050 तक इसका स्तर 600 पीपीएम तक पहुंच सकता है। शोधकर्ताओं ने सर्दियों में उगाई जाने वाली गेहूं की 10 उन्नत किस्मों को खेती और पर्यावरण की वास्तविक परिस्थितियों में उगाया। इनमें से कुछ पौधों को सीओटू की बढ़ी हुई सांद्रता (546 पीपीएम) में रखा गया, जबकि अन्य को मौजूदा स्तर पर उगाया गया।

फसल की कटाई के बाद शोधकर्ताओं ने अपने विकसित किए गए उच्च-रिजॉल्यूशन वाले ‘मास स्पेक्ट्रोमेट्रिक’ तरीके से गेहूं के विभिन्न नमूनों में प्रोटीन की संरचना का विश्लेषण किया। उन्होंने एमाइलेज/ट्रिप्सिन इन्हिबिटर, प्यूरोइंडोलिन, ग्लूटेन प्रोटीन और सीलिएक रोग को सक्रिय करने वाले पेप्टाइड पर विशेष ध्यान दिया। अध्ययन में पाया गया कि सीओटू की बढ़ी हुई सांद्रता में एमाइलेज/ट्रिप्सिन इन्हिबिटर की मात्रा बढ़ गई, जबकि प्यूरोइंडोलिन, ग्लूटेन प्रोटीन और सीलिएक रोग को सक्रिय करने वाले कुछ पेप्टाइड की मात्रा घट गई।

ये पेप्टाइड पाचन के दौरान ग्लूटेन प्रोटीन से बन सकते हैं। शोधकर्ताओं के अनुसार, एमाइलेज/ट्रिप्सिन इन्हिबिटर (एटीआई) की बढ़ी हुई मात्रा मानव स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकती है। लाइबनिज इंस्टीट्यूट की प्रमुख शोधकर्ता सबरीना गाइस्लिट्ज ने कहा, ‘‘हालांकि, इन बदलावों की सीमा काफी हद तक गेहूं की संबंधित किस्म पर निर्भर करती है।’’ उन्होंने कहा, ‘‘हमारे नतीजों से यह भी पता चला कि ग्लूटेन प्रोटीन की कम सांद्रता का संबंध भोजन पकाने की खराब गुणवत्ता से था।’’ संस्थान में खाद्य बायोपॉलिमर रसायन शोध समूह की प्रमुख और टीयूएम स्कूल ऑफ लाइफ साइंसेज में खाद्य बायोपॉलिमर प्रणाली की प्रोफेसर कैथरीना शेर्फ ने कहा कि एमाइलेज/ट्रिप्सिन इन्हिबिटर और सीलिएक रोग को सक्रिय करने वाले कुछ पेप्टाइड में आए बदलाव लंबे समय में गेहूं से संबंधित बीमारियों के लिहाज से भी महत्वपूर्ण हो सकते हैं।

हालांकि, इन अंतरों के वास्तविक जैविक और प्रतिरक्षा संबंधी महत्व को स्पष्ट करने के लिए और अध्ययन की जरूरत है। शोधकर्ताओं ने कहा कि अध्ययन के नतीजे ऐसी गेहूं की किस्मों की पहचान करने और उन्हें विकसित करने के महत्व को रेखांकित करते हैं, जो सीओटू की बढ़ती सांद्रता के बावजूद खाना पकाले की अच्छी गुणवत्ता बनाए रखें और उनमें ऐसे प्रोटीन कम से कम हों जिन्हें शरीर सहन नहीं कर पाता। अध्ययन के लेखकों ने कहा, ‘‘वातावरण में सीओटू की बढ़ती सांद्रता गेहूं में प्रोटीन की संरचना को बदल सकती है और इस तरह अनाज की गुणवत्ता को प्रभावित कर सकती है।’’ उन्होंने कहा कि इन निष्कर्षों से ऐसी गेहूं की किस्मों की पहचान करने का महत्व सामने आता है, जिनमें एटीआई और सीलिएक रोग को सक्रिय करने वाले पेप्टाइड की मात्रा कम हो तथा सीओटू का स्तर बढ़ने के बावजूद बेकिंग की गुणवत्ता अच्छी बनी रहे।

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