Prabhasakshi NewsRoom: Riyadh पर लगातार हो रहे Missile Attacks को रोकने में विफल रहा Mecca Pact, अब Trump ने Houthis के खिलाफ जंग में उतरने के दिए संकेत!

By नीरज कुमार दुबे | Oct 12, 2026

सऊदी अरब की राजधानी रियाद में लगातार हो रहे मिसाइल हमलों ने पूरे मध्य पूर्व को एक ऐसे खतरनाक मोड़ पर ला खड़ा किया है, जहां एक क्षेत्रीय संघर्ष के कई देशों के बीच व्यापक युद्ध में बदलने की आशंका बढ़ रही है। दस अक्टूबर को रियाद के किंग खालिद अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर हुए भीषण हमले में तेरह लोगों की मौत हुई और तीन सौ से अधिक लोग घायल हुए। मृतकों में एक भारतीय नागरिक भी शामिल है। इसके ठीक अगले दिन, ग्यारह अक्टूबर को, हवाई अड्डे पर फिर हमला हुआ, जिसमें एक व्यक्ति की मौत और ग्यारह लोगों के घायल होने की खबर सामने आई। इस बीच, यमन के हूती विद्रोहियों ने सऊदी अरब के हवाई अड्डों और हवाई क्षेत्र को लेकर दोबारा चेतावनी जारी कर दी है।

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हम आपको बता दें कि रियाद में दस अक्टूबर को हुए हमले के दृश्य सामने आने के बाद दुनिया भर में चिंता बढ़ गई है। हवाई अड्डे के भीतर यात्री मौजूद थे और कुछ लोग धार्मिक यात्रा के लिए रवाना होने की तैयारी कर रहे थे, तभी मिसाइल हमले से अफरा-तफरी मच गई। शुरुआती आधिकारिक आंकड़ों में बारह लोगों की मौत बताई गई थी, लेकिन बाद में एक भारतीय नागरिक की मृत्यु के बाद यह संख्या तेरह हो गई। तीन सौ से अधिक लोग घायल हुए। इसके बाद रविवार को हवाई अड्डे के चौथे यात्री टर्मिनल पर एक अज्ञात प्रक्षेपास्त्र गिरने से आग लग गई। इस दूसरे हमले में एक व्यक्ति की मौत और ग्यारह लोगों के घायल होने की सूचना दी गई।

यानी दो दिनों में रियाद के हवाई अड्डे पर हमलों से जुड़ी मृतकों की संख्या कम से कम चौदह तक पहुंच गई है। हालांकि, पूरे सप्ताह के दौरान हवाई अड्डे पर हुए हमलों में मरने वालों की संख्या अठारह बताई गई है। इन आंकड़ों को अलग-अलग घटनाओं के संदर्भ में समझना जरूरी है।

देखा जाये तो खतरा केवल रियाद तक सीमित नहीं रहा। सऊदी अरब के पूर्वी क्षेत्र में स्थित दम्माम के किंग फहद अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे को भी निशाना बनाए जाने की खबर आई। सऊदी अधिकारियों ने वहां नुकसान का आकलन और सुरक्षा जांच शुरू की है। सऊदी नेतृत्व वाले गठबंधन के अनुसार, रियाद के आसपास एक क्रूज मिसाइल को रोक लिया गया, पूर्वी प्रांत में एक मानवरहित विमान को नष्ट किया गया और खमीस मुशैत की ओर दागी गई बैलिस्टिक मिसाइल को भी रोक लिया गया। इससे साफ है कि सऊदी अरब के लिए खतरा एक अकेले हमले से कहीं अधिक व्यापक हो चुका है।

हम आपको बता दें कि यमन के हूती विद्रोहियों ने सऊदी अरब के हवाई अड्डों और हवाई क्षेत्र से दूर रहने की चेतावनी दोहराई है। संगठन ने दावा किया कि उसने रियाद के अलावा दम्माम के हवाई अड्डे और सऊदी तेल कंपनी अरामको की दो सुविधाओं को भी निशाना बनाया है। हूती नेतृत्व ने यह भी चेताया कि यदि यमन में सऊदी अरब की सैन्य कार्रवाई जारी रही, तो आने वाले दिनों में हालात और गंभीर हो सकते हैं।

दूसरी तरफ, सऊदी अरब ने यमन में हूतियों के विरुद्ध हवाई हमले तेज किए हैं और हूतियों से लड़ रही यमन की सरकार समर्थक सेनाओं को समर्थन दिया है। हूती नेतृत्व का दावा है कि सऊदी अरब ने चौबीस घंटे में यमन पर एक सौ चौबीस हवाई हमले किए। देखा जाये तो दोनों पक्षों की बढ़ती सैन्य कार्रवाई यह संकेत दे रही है कि संघर्ष अब केवल बयानबाजी तक सीमित नहीं है।

खास बात यह भी है कि हूतियों को केवल यमन के भीतर सक्रिय एक विद्रोही संगठन समझना अब पर्याप्त नहीं होगा। उनके पास मिसाइलों, मानवरहित विमानों और अन्य हथियारों का ऐसा भंडार है, जिसके सहारे वे अपने नियंत्रण वाले क्षेत्रों से दूर स्थित ठिकानों को भी निशाना बनाने का दावा करते रहे हैं। लाल सागर के आसपास उनकी रणनीतिक स्थिति और समुद्री मार्गों को बाधित करने की क्षमता भी उन्हें क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए गंभीर चुनौती बनाती है।

उधर, सऊदी अरब के पास आधुनिक लड़ाकू विमान और वायु रक्षा प्रणालियां हैं, लेकिन लगातार होने वाले हमले यह सवाल खड़ा कर रहे हैं कि क्या हर मिसाइल और मानवरहित विमान को रोक पाना संभव है। किसी हमले का लक्ष्य भेद देना और किसी देश की सैन्य ताकत को पूरी तरह पराजित कर देना दो अलग बातें हैं। हूतियों की ताकत का आकलन इसी अंतर को ध्यान में रखकर करना होगा। मौजूदा घटनाक्रम यह जरूर दिखाता है कि वे सऊदी अरब पर सुरक्षा और आर्थिक दबाव बनाने की क्षमता रखते हैं।

यहाँ सवाल उठता है कि क्या अमेरिका भी सऊदी अरब के साथ युद्ध में उतरेगा? देखा जाये तो यह इस पूरे घटनाक्रम का सबसे अहम सवाल है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने शनिवार को कहा कि अमेरिका हूतियों के विरुद्ध सऊदी अरब के हमलों में शामिल होने पर विचार कर रहा है। इसका अर्थ यह है कि अमेरिकी सैन्य भागीदारी की संभावना पर चर्चा हो रही है, लेकिन इसे सीधे युद्ध में उतरने का अंतिम फैसला नहीं माना जा सकता।

यदि अमेरिका सीधे हमलों में शामिल होता है, तो हूतियों के विरुद्ध सैन्य दबाव बढ़ सकता है। लेकिन इससे ईरान और अमेरिका के बीच पहले से जारी व्यापक संघर्ष के और फैलने का जोखिम भी पैदा होगा। हूतियों को ईरान का समर्थन प्राप्त है।

फिलहाल सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अमेरिकी भागीदारी की संभावना सामने आई है, पर उसके स्वरूप, समय और सीमा को लेकर कोई अंतिम निर्णय सार्वजनिक रूप से स्पष्ट नहीं है। इसलिए अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि अमेरिका ने सऊदी अरब के साथ मिलकर हूतियों पर हमले शुरू करने का फैसला कर लिया है।

दूसरी ओर, सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्किये के बीच सात अगस्त को मक्का में संयुक्त रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर हुए थे। इसकी प्रमुख व्यवस्था यह है कि तीन देशों में से किसी एक पर सशस्त्र हमला अन्य देशों के विरुद्ध हमला माना जाएगा। इसका उद्देश्य साझा सुरक्षा और सामूहिक प्रतिरोध को मजबूत करना है।

इस समझौते का महत्व अब बढ़ गया है, क्योंकि सऊदी अरब पर लगातार हमले हो रहे हैं। पाकिस्तान और तुर्किये की सैन्य, खुफिया, तकनीकी अथवा अन्य रक्षा सहायता सऊदी अरब की स्थिति मजबूत कर सकती है। लेकिन समझौते का होना अपने आप में इस बात का प्रमाण नहीं है कि दोनों देश हूतियों के विरुद्ध सीधे युद्ध में सैनिक भेज चुके हैं। तुर्किये की संभावित सैन्य तैनाती को लेकर संसदीय अनुमोदन जैसे सवाल भी सामने हैं और वास्तविक सैन्य भूमिका पर स्थिति पूरी तरह स्पष्ट नहीं है। वहीं पाकिस्तान भी गोलमोल बातें कर सऊदी अरब की धड़कन बढ़ा रहा है। इसलिए मक्का समझौते का असर फिलहाल सामरिक सहयोग और सामूहिक प्रतिरोध की दिशा में दिखाई देता है। अभी तत्काल संयुक्त सैन्य अभियान की घोषणा नहीं की गई है।

एक सवाल यह भी है कि क्या दुनिया एक नए महायुद्ध की ओर बढ़ रही है? देखा जाये तो रियाद और दम्माम पर हमलों, यमन में तेज होती जवाबी कार्रवाई, अमेरिकी भागीदारी की संभावना और मक्का रक्षा समझौते के सक्रिय होने की चर्चा ने हालात को बेहद संवेदनशील बना दिया है। रियाद का हवाई अड्डा बंद रहा और राजधानी के विद्यालयों में कुछ दिनों के लिए ऑनलाइन पढ़ाई की व्यवस्था की गई। विमानन सुरक्षा को लेकर विदेशी अधिकारियों ने भी सावधानी बरतने की सलाह दी। इन घटनाओं का असर नागरिकों की आवाजाही, हवाई यातायात और क्षेत्रीय कारोबार पर पड़ रहा है। अभी वास्तविक खतरा यह है कि यदि सऊदी अरब की जवाबी कार्रवाई तेज होती है, अमेरिका सीधे युद्ध में उतरता है और ईरान भी अधिक सक्रिय भूमिका निभाता है, तो संघर्ष कई देशों तक फैल सकता है।

बहरहाल, फिलहाल मध्य पूर्व एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा है। रियाद पर लगातार हमले सऊदी अरब की सुरक्षा व्यवस्था के लिए गंभीर चुनौती हैं, जबकि मक्का समझौता क्षेत्रीय शक्ति संतुलन को प्रभावित कर सकता है। आने वाले दिनों में अमेरिका का अंतिम फैसला, पाकिस्तान और तुर्किये की वास्तविक सैन्य भूमिका, तथा हूतियों और सऊदी अरब के बीच हमलों का अगला दौर सबसे महत्वपूर्ण संकेत होंगे।  युद्ध का दायरा कितना बढ़ेगा, इसका फैसला केवल मिसाइलों से नहीं, बल्कि इन देशों के अगले राजनीतिक और सैन्य कदमों से होगा।

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