समाजवादी पार्टी ने सामाजिक शिष्टाचार निभाने की बजाय तुष्टिकरण की राजनीति को तवज्जो दी

By संजय सक्सेना | Aug 27, 2021

अपने देश-प्रदेश में अक्सर ही तमाम मंचों, बैठकों और बुद्धिजीवियों के बीच राजनीति के गिरते स्तर को लेकर चर्चा सुनने को मिल जाती है। आमजन हो या फिर खास वर्ग सभी इस बात से दुखी दिखाई देते हैं कि देश में सियासत का लगातार गिरता जा रहा है। पहले के नेताओं के बीच मतभेद तो देखने को मिलता था, लेकिन मनभेद कभी सामने नहीं आता था। अलग-अलग पार्टियों और विचारधारा के बाद भी सभी नेता एक साथ उठते-बैठते, एक-दूसरे के सुख-दुख में शामिल होते थे। बड़े हों या फिर छोटे नेता, सभी परस्पर विरोधी विचारधारा और पार्टी के नेताओं के यहां होने वाले पारिवारिक समारोह में भी शामिल होने से गुरेज नहीं करते थे, यदि कभी कोई सवाल खड़ा करता तो यही नेता बड़ी सादगी से कह दिया करते थे कि हमारे विचार अलग-अलग हो सकते हैं, लेकिन हम दुश्मन नहीं हैं। परस्पर विरोधी दलों के पुराने नेता यह कहते ही नहीं करके भी दिखाते थे, इसीलिए किसी भी विरोधी दल के नेता के जन्मदिन पर बधाई देने वाले अन्य दलों के नेता पार्टी से ऊपर उठ कर इस स्वस्थ परम्परा का निर्वहन करते थे।

खैर, इसी प्रकार से कांग्रेस के दिग्गज नेता और पूर्व मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी, वीर बहादुर सिंह, कांग्रेस सांसद प्रमोद तिवारी, जगदम्बिका पाल भी पार्टी लाइन से ऊपर उठकर सामाजिक शिष्टाचार निभाते रहे। सामाजिक शिष्टाचार निभाने के मामले में यदि कुछ नेता कंजूसी करते थे तो उसमें प्रमुख नाम पूर्व प्रधानमंत्री वीपी सिंह और बसपा सुप्रीमो मायावती का नाम आता था। वीपी सिंह को अपने राजा होने का दंभ था तो मायावती ने अपने पूरे सियासी जीवन में इस तरह के शिष्टाचार को कभी महत्व नहीं दिया। इसीलिए जब मायावती भाजपा नेता और पूर्व मुख्यमंत्री दिवंगत कल्याण सिंह को श्रद्धांजलि देने उनके आवास पहुंचीं तो सब आश्चर्यचकित हो गए, लेकिन मायावती के कल्याण सिंह को श्रद्धांजलि देने से अधिक चौंकाने वाली खबर यह बनी कि लखनऊ में रहते हुए भी अखिलेश यादव ने पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह को उनके आवास जाकर श्रद्धांजलि देना उचित नहीं समझा। इसी तरह से पूर्व सपा प्रमुख मुलायम ने भी कल्याण सिंह की मौत पर शोक संवेदना व्यक्त करना तक उचित नहीं समझा। इस पर सोशल मीडिया पर वह काफी ट्रोल भी हुए। लोगों ने यहां तक कहा कि तुष्टिकरण की सियासत के चलते सपा प्रमुख आम शिष्टाचार भी भूल गए। अखिलेश ने सिर्फ ट्विट करके शोक संवेदना व्यक्त की थी।

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बहरहाल, अब यह मामला सियासी रूप से तूल पकड़ता जा रहा है। भाजपा के नेता और यूपी के डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य ने कहा कि कल्याण सिंह किसी की श्रद्धांजलि के मोहताज नहीं हैं लेकिन भगवान राम उन्हें सद्बुद्धि दें जो दिवंगत आत्माओं में भी तुष्टिकरण देखते हैं। कन्नौज से सांसद सुब्रत पाठक ने कल्याण सिंह को श्रद्धांजलि न देने के लिए मुलायम सिंह यादव और अखिलेश यादव, दोनों को आड़े हाथों लिया और ट्वीट कर कहा कि हिंदू हृदय सम्राट कल्याण सिंह जैसे जनप्रिय नेता को अगर मुलायम सिंह और अखिलेश यादव श्रद्धांजलि और सम्मान नहीं देंगे तो इससे उनके (कल्याण सिंह) कद पर कोई असर नहीं पड़ेगा। उन्होंने आगे ये भी कहा कि अगर लखनऊ में ये दोनों कल्याण सिंह के आखिरी दर्शन कर लेते तो इससे कार सेवकों पर गोली चलवाने वाली समाजवादी पार्टी को अपने पाप धोने का आखिरी मौका जरूर मिल जाता, लेकिन विनाशकाले विपरीत बुद्धि होती है और यही इनकी तालिबानी मानसिकता को दर्शाता है। योगी सरकार में कैबिनेट मंत्री स्वामी प्रसाद मौर्या ने इस पर दुख व्यक्त करते हुए कहा कि मुलायम सिंह और अखिलेश यादव पिछड़ों के वोट तो लेते हैं, लेकिन पिछड़ों के सबसे बड़े नेता कल्याण सिंह जी की लोकप्रियता को वो बर्दाश्त नहीं पाए। उन्होंने कहा कि सपा और कांग्रेस का कोई भी नेता बाबूजी की अंतिम यात्रा में शोक संवेदना व्यक्त करने नहीं पहुंचा।

गौरतलब है कि मुलायम सिंह यादव ने श्रद्धांजलि के शब्द नहीं बोले जबकि अखिलेश यादव ने ट्वीट कर शोक व्यक्त किया था, जबकि कल्याण सिंह, मुलायम सिंह यादव के साथ जनता पार्टी की सरकार में 1977 में मंत्रिमंडल में रहे थे। कल्याण सिंह जब भाजपा से नाराज हुए तो मुलायम सिंह के करीब गए। कल्याण सिंह ने अपनी पार्टी बनाई और समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन कर चुनाव भी लड़ा था। बता दें कि मायावती के कल्याण सिंह से रिश्ते कभी मधुर नहीं रहे। बावजूद इसके बसपा सुप्रीमो कल्याण सिंह के पार्थिव शरीर पर श्रद्धांजलि अर्पित करने लखनऊ में उनके घर पहुंची थीं और न सिर्फ श्रद्धा सुमन अर्पित किए बल्कि परिजनों से बात कर उन्हें ढाढ़स भी बंधाया था।

-संजय सक्सेना 

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