By कमलेश पांडे | Apr 28, 2026
बिहार में नए मुख्यमंत्री पद पर सम्राट चौधरी के चयन ने भाजपा को एक “नया चेहरा और नया नारा” दिया है, जिसे पार्टी पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनावों में केंद्र में लेकर चल रही है। इसी वजह से बिहार के नए प्रमुख चेहरे के इस चयन से बंगाल में भी भाजपा की “लहर की बात” तेज़ी से चलने लगी है। चूंकि बिहार में सम्राट चौधरी का महत्व निर्द्वन्द है, इसलिए पश्चिम बंगाल के लोगों में भाजपा के प्रति विश्वास और गहरा हुआ। उल्लेखनीय है कि बिहार में नीतीश कुमार के बाद भाजपा ने पहली बार अपने प्रत्यक्ष नेता को मुख्यमंत्री बनाकर संकेत दिया है कि पार्टी अब “एनडीए के नेतृत्व” को भी भाजपा के नाम से बेचेगी।
सम्राट चौधरी अपने उपमुख्यमंत्री पद के बाद पश्चिम बंगाल में भी भाजपा के प्रमुख प्रचारक के रूप में सक्रिय हुए हैं; उन्होंने बंगाल के चुनावी दौर में बार बार दावा किया है कि बंगाल में लोग “बदलाव” के लिए तैयार हैं और भाजपा की सरकार बनेगी। चौधरी ने बर्बरता, घुसपैठ, रोज़गार और “सोनार बंगाल” की वापसी जैसे मुद्दे उठाकर बिहार मॉडल के नाम पर एक नयी राजनीतिक कहानी बंगाल में बेचनी शुरू की है; इससे भाजपा को एक नया नारा और एक नया चेहरा मिल गया है, जिसे मीडिया व जनता ने “लहर” की तरह पेश किया है।
बिहार में ओबीसी केंद्रित और सवर्ण, दलित, अल्पसंख्यक समर्थित मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के उभार के बाद भाजपा तर्क दे रही है कि अब यह गैर संस्कृतिक (संयुक्त तरह के राष्ट्रवादी ओबीसी) चेहरा बंगाल में भी विपक्षी भावनाओं को एकजुट कर सकता है। दोनों राज्यों में भाजपा एक ही नारा बेच रही है: “पुरानी सत्ता संरचना का अंत और नई नेतृत्व पीढ़ी की शुरुआत”; इसी जोड़ को देखते हुए बिहार में सम्राट के चयन को पश्चिम बंगाल में भाजपा की “लहर” का तर्क प्रतीक माना जा रहा है।
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 में सम्राट चौधरी भाजपा के एक प्रमुख स्टार प्रचारक और “मिशन बंगाल” के आगे बढ़े चेहरे के रूप में उभर रहे हैं। उनकी भूमिका मुख्यतः तीन तरह की है: नारा निर्माता, बिहारी बंगाल जुड़ाव बनाने वाला चेहरा, और ममता सरकार की आलोचना के लिए उग्र आवाज़। उन्हें स्टार प्रचारक के रूप में जिम्मेदारी मिली, क्योंकि भाजपा ने पश्चिम बंगाल के लिए 40 स्टार प्रचारकों की सूची जारी की है, जिसमें बिहार से सम्राट चौधरी को विशेष प्राथमिकता दी गई है; वे बिहार के उन चुनिंदा नेताओं में हैं जिन्हें बंगाल में बड़ा चुनावी जिम्मा सौंपा गया है। उन्हें बंगाल के कई चरणों में रैलियों और चुनावी सभाओं के लिए तैयार किया गया है, खासकर 23 व 29 अप्रैल के चरणों में जहां भाजपा जीत सुनिश्चित करने की तैयारी कर रही है।
बिहार के उपमुख्यमंत्री होने के नाते चौधरी बिहार मूल के मतदाताओं (खासकर हावड़ा और आसपास के क्षेत्रों में रहने वाले मजदूर, व्यापारी, कामगार) को निशाना बना रहे हैं, जहां बिहारी समुदाय की संख्या अधिक मानी जाती है। वे बिहार में “नौकरी वाला मॉडल” (लगभग 50 लाख लोगों को नौकरी/रोज़गार के अवसर) का उदाहरण देकर यह वादा कर रहे हैं कि बंगाल में भी वही तरह का रोज़गार आधारित विकास “सोनार बंगाल” के नाम से लाया जाएगा।
सम्राट चौधरी ने घुसपैठ, NRC, बंगाली अस्मिता और “हिंदू उत्पीड़न” जैसे मुद्दों पर खुले आरोप लगाए हैं और कहा है कि भाजपा सत्ता में आकर घुसपैठियों को बाहर करेगी और बंगाली पहचान को फिर से स्थापित करेगी। वे ममता बनर्जी सरकार को “अराजक, हिन्दू विरोधी और घुसपैठियों की हिमायती” कहकर जनता में बदलाव की भावना जगाने की कोशिश कर रहे हैं, और बार बार दावा कर रहे हैं कि इस बार बंगाल में भाजपा की ही सरकार बनेगी। संक्षेप में "कहें तो, सम्राट चौधरी पश्चिम बंगाल में भाजपा के लिए “बिहार मॉडल व बदलाव की आवाज़” बनकर आगे बढ़ रहे हैं, जिससे पार्टी को गैर बंगाली (खासकर बिहारी) मतदाताओं से जुड़ने और राष्ट्रवाद घुसपैठ रोज़गार के मुद्दे पर एकीकृत नारा बेचने में मदद मिल रही है।
- कमलेश पांडेय
वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक