उपलब्धियों से भरा रहा आईआईएमसी में संजय द्विवेदी का कार्यकाल

By प्रो.कृपाशंकर चौबे | Jul 12, 2023

भारतीय जन संचार संस्थान (आईआईएमसी), नई दिल्ली को देश का सर्वश्रेष्ठ मीडिया संस्थान बनाए रखने की दृष्टि से उसके महानिदेशक प्रो. संजय द्विवेदी का कार्यकाल याद रखा जाएगा। वे तीन वर्ष तक संस्थान के महानिदेशक रहे। आईआईएमसी हर सर्वेक्षण में नंबर वन घोषित किया जाता रहा है। बीते तीन वर्षों से ‘इंडिया टुडे’ लगातार आईआईएमसी को शीर्ष मीडिया प्रशिक्षण संस्थान का दर्जा प्रदान कर रहा है। प्लेसमेंट की दृष्टि से भी आईआईएमसी देश का शीर्ष संस्थान है। 2020-21 में 79 प्रतिशत और 2021-22 में 88 प्रतिशत विद्यार्थियों का प्लेसमेंट हुआ है। इसका बहुत कुछ श्रेय प्रो. द्विवेदी के कुशल प्रशासक और योजक व्यक्तित्व को दिया जाना चाहिए। 

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भारतीय जन संचार संस्थान का लोगो 1966 में डिजाइन किया गया था, परंतु इसमें कोई टैगलाइन नहीं थी। प्रो. संजय द्विवेदी ने उसमें संशोधन कर 'आ नो भद्रा: क्रतवो यन्तु विश्वत:' (हमें सब ओर से कल्याणकारी विचार प्राप्त हों) टैगलाइन को जोड़ दिया। पुस्तकालय कक्ष का नाम संजय जी ने हिंदी के आदि संपादक युगल किशोर शुक्ल के नाम पर किया। प्रो. द्विवेदी के आईआईएमसी में आने से पूर्व एक बहुत बड़ी राशि प्रवेश संबंधी विज्ञापनों पर खर्च होती थी। परंतु प्रो. द्विवेदी ने सोशल मीडिया के माध्यम से आईआईएमसी की पहचान को इतना विस्तार दिया कि अब एक भी रुपया विज्ञापन पर खर्च करने की आवश्यकता नहीं रहती। उन्होंने प्रवेश प्रक्रिया को पूरी तरह ऑनलाइन कर दिया है, जिसके कारण पूरी प्रक्रिया और अधिक पारदर्शी हुई है। उन्होंने पिछले तीन वर्षों से एनटीए के माध्यम से प्रवेश परीक्षा कराकर गुणवत्ता में सुधार किया। संजय जी ने नए पाठ्यक्रम शुरू किए। हिंदी पत्रकारिता का पाठ्यक्रम जम्मू और अमरावती केंद्रों पर प्रारंभ हुआ तो डिजिटल मीडिया का पाठ्यक्रम तीन केंद्रों जम्मू, अमरावती और दिल्ली में आरंभ हुआ। प्रो. द्विवेदी ने अपने कार्यकाल में सभी स्वीकृत 16 शैक्षणिक पदों पर नियमित नियुक्ति की। राजभाषा अधिकारी के पद पर भी नियमित नियुक्ति की। ये सभी पद 2016 से खाली थे। आइजोल परिसर महामहिम राष्ट्रपति द्वारा 3 नवंबर 2022 को लोकार्पित हुआ। जम्मू परिसर बनकर तैयार हुआ। वहां कक्षाएं प्रारंभ हुईं। कुल मिलाकर प्रो. द्विवेदी का कार्यकाल उपलब्धियों से परिपूर्ण और विवाद विहीन रहा।

आईआईएमसी के महानिदेशक की जिम्मेदारी संभालते हुए भी संजय जी की सृजन सक्रियता बनी रही। उनकी पुस्तकें 'अमृत काल में भारत', 'भारतबोध का नया समय', 'न हन्यते' इसी दौरान आईं। प्रसंगवश संजय द्विवेदी की अन्य प्रकाशित मौलिक पुस्तकें हैं-'सुर्खियां', 'मत पूछ हुआ क्या-क्या', 'इस सूचना समर में', 'सर्वेश्वर दयाल सक्सेना और उनकी पत्रकारिता', 'शावक', 'मीडियाः नया दौर, नई चुनौतियाँ', 'कुछ भी उल्लेखनीय नहीं', 'मोदी लाइव', 'मोदी युग'। इसके अलावा उन्होंने बीसेक पुस्तकों का संपादन किया है जिनमें शामिल हैं-'यादें- सुरेंद्र प्रताप सिंह', 'प्रभाष स्मृति', 'मीडिया शिक्षाः मुद्दे और अपेक्षाएँ', 'उर्दू पत्रकारिता का भविष्य', 'सोशल नेटवर्किंगः नए समय का संवाद', 'कर्मपथ', 'भूमंडलीकरण: मीडिया और समाज', 'अजातशत्रु अच्युतानंद', 'हिंदी मीडिया के हीरो', 'भारतीयता के संचारकः पं. दीनदयाल उपाध्याय', 'लक्ष्यनिष्ठ लखीराम', 'रजत पथ', 'रजत प्रसंग', 'मीडिया की ओर देखती स्त्री', 'राष्ट्रवाद', 'भारतीयता और पत्रकारिता', 'ध्येय पथः राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नौ दशक', 'मीडिया और भारतीय चुनाव प्रक्रिया', 'नए समय में अपराध पत्रकारिता', 'शब्द पुरुष माणिक चंद्र वाजपेयी', 'बचपन और मीडिया' और 'शुक्रवार संवाद 2021-22'। इसके अलावा ‘मीडिया विमर्श’ के अंक संजयजी ने नियमित निकाले। उसका नया अंक उन्होंने मीडिया के इंदौर स्कूल पर निकाला है।

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आईआईएमसी में आने के पहले संजय जी माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल के कुलसचिव और प्रभारी कुलपति थे। वहां वे दस वर्षों तक जनसंचार विभाग के अध्यक्ष भी रहे। संजय द्विवेदी के व्यक्तित्व के कई रूप हैं। वे पत्रकार हैं, संपादक हैं, लेखक हैं, अकादमिक प्रबंधक हैं, मीडिया प्राध्यापक हैं। मीडिया प्राध्यापक बनने के पहले उन्होंने रायपुर, बिलासपुर, मुंबई और भोपाल में सक्रिय पत्रकारिता की और दैनिक भास्कर, नवभारत, हरिभूमि, स्वदेश, इंफो इंडिया डॉटकाम और छत्तीसगढ़ के पहले सेटलाइट चैनल जी चौबीस घंटे छत्तीसगढ़ जैसे मीडिया संगठनों में संपादक, समाचार सम्पादक, कार्यकारी संपादक, इनपुट हेड और एंकर जैसी महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभालीं। माखनलाल राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में लौट रहे द्विवेदी की सृजन सक्रियता वहां भी बनी रहेगी, यह उम्मीद लाजिमी है।

(लेखक महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा में प्रोफेसर हैं।) 

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