Yes Milord: संजीव भट्ट को 20 साल जेल, समाचार प्रकाशन के खिलाफ प्री-ट्रायल पर SC की अहम टिप्पणी, जानें कोर्ट में इस हफ्ते क्या हुआ

By अभिनय आकाश | Mar 30, 2024

सुप्रीम कोर्ट से लेकर लोअर कोर्ट तक के वीकली राउंड अप में इस सप्ताह कानूनी खबरों के लिहाज से काफी उथल-पुथल वाला रहा है। वकील को फंसाने के मामले में पूर्व आईपीएस अधिकारी संजीव भट्ट को 20 साल की जेल हो गई। अरविंद केजरीवाल की एक अप्रैल तक ईडी रिमांड बढ़ा दी गई है। सुप्रीम कोर्ट ने समाचार प्रकाशन को लेकर निचली अदालत का आदेश पलटा। हिरासत में मौत के मामलों को लेकर सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी। इस सप्ताह यानी 25 मार्च से 30 मार्च 2024 तक क्या कुछ हुआ? कोर्ट के कुछ खास ऑर्डर/जजमेंट और टिप्पणियों का विकली राउंड अप आपके सामने लेकर आए हैं। कुल मिलाकर कहें तो आपको इस सप्ताह होने वाले भारत के विभिन्न न्यायालयों की मुख्य खबरों के बारे में बताएंगे। 

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पूर्व आईपीएस संजीव भट्ट को 20 साल जेल की सजा

जरात के बनासकांठा जिले के पालनपुर की सेशन कोर्ट ने पूर्व आईपीएस अधिकारी संजीव भट्ट को 20 साल कारावास की सजा सुनाई है। कोर्ट ने यह फैसला 1996 में वकील सुमेर सिंह राजपुरोहित को झूठे ड्रग्स मामले में फंसाने के मामले में सुनाया। उन्हें बुधवार को दोषी ठहराया गया था। भट्ट हिरासत में मौत के मामले में पहले से ही जेल में हैं। उन्हें 2015 में पुलिस सेवा से बर्खास्त कर दिया गया था। उस समय वह बनासकांठा जिले के एसपी थे। अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश जेएन ठक्कर ने भट्ट को बुधवार को नारकोटिक्स ड्रग्स एंड साइकोट्रोपिक सब्सटेंस स एंड साइकोट्रोपि (एनडीपीएस) अधिनियम और भारतीय दंड संहिता की की संबंधित धाराओं के तहत दोषी ठहराया था।

1 अप्रैल तक ED की रिमांड में रहेंगे केजरीवाल

शराब नीति घोटाले में घिरे दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल एक अप्रैल तक प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) को हिरासत में रहेंगे। केजरीवाल और ईडी के वकीलों की दलीलें सुनने के बाद राउज एवेन्यू कोर्ट में विशेष जज कावेरी बावेजा ने यह फैसला सुनाया। इससे पहले कोर्ट में केजरीवाल ने वकील की मौजूदगी में केस की पैरवी खुद की। उन्होंने गिरफ्तारी को राजनीतिक षड्यंत्र बताते हुए ईडी पर कई गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने कहा कि क्या सिर्फ 4 बयानों के आधार पर किसी मुख्यमंत्री को गिरफ्तार किया जा सकता है? इसके जवाब में ईडी की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (एएसजी) एसवी राजू ने कहा कि कोई भी मुख्यमंत्री कानून से ऊपर नहीं है। उन्होंने दो बजह बताकर कोर्ट से रिमांड बढ़ाने की मांग की। पहली केजरीवाल की गिरफ्तारी के पहले एक फोन (सीएम की पत्नी का) से डेटा निकाला गया है। इसका एनालिसिस बाकी है। दूसरी 21 मार्च को केजरीवाल के घर से 4 डिजिटल उपकरण जब्त हुए थे। जब इनके पासवर्ड मांगे गए तो केजरीवाल ने बिना वकील की सलाह के पासवर्ड देने से मना कर दिया। इसलिए अब तक उन उपकरणों से डेटा निकाला नहीं जा सका है। कोर्ट ने इंडी की दलीलों को उचित मानते हुए रिमांड अवधि बढ़ा दी।

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‘हिरासत में मौत’ मामले में पुलिस अधिकारी की जमानत पर सख्त रुख अपनाने की जरूरत

सुप्रीम कोर्ट ने हिरासत में मौत के एक मामले में एक पुलिस कांस्टेबल को दी गई जमानत को रद्द करते हुए कहा है कि एक सामान्य व्यक्ति की तुलना में एक पुलिस अधिकारी अधिक प्रभाव डाल सकता है। न्यायमूर्ति अनिरुद्ध बोस और न्यायमूर्ति संजय कुमार की पीठ ने कहा कि हिरासत में मौत के मामले में आरोपी पुलिस अधिकारी की जमानत के सवाल पर निर्णय लेते वक्त कठोर दृष्टिकोण की आवश्यकता है। शीर्ष अदालत ने कहा कि इस तरह के मामलों में, हिरासत में मौत से संबंधित मामले के संबंध में पुलिस बल के एक सदस्य के समग्र प्रभाव को ध्यान में रखते हुए जमानत देने के सवाल पर सख्त रुख अपनाया जाना चाहिए। न्यायालय ने कहा कि सामान्य परिस्थितियों में, उसने किसी आरोपी को जमानत देने के आदेश को अमान्य करने के लिए संविधान के अनुच्छेद 136 के तहत अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल नहीं किया होगा।

केजरीवाल को सीएम पद से हटाने की मांग वाली याचिका खारिज

दिल्ली हाई कोर्ट ने आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल को आबकारी नीति से जुड़े धनशोधन मामले में गिरफ्तार किए जाने के बाद मुख्यमंत्री पद से हटाने के अनुरोध वाली जनहित याचिका बृहस्पतिवार को खारिज कर दी। कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश मनमोहन की अध्यक्षता वाली पीठ ने मुद्दे के गुण-दोषों पर टिप्पणी करने से इनकार करते हुए कहा कि यह न्यायिक हस्तक्षेप के दायरे से बाहर है। पीठ में न्यायमूर्ति मनमीत पीएस अरोड़ा भी शामिल रहे। पीठ ने कहा, ‘‘इसका अध्ययन सरकार की अन्य इकाइयों को कानून के अनुसार करना है।

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समाचार प्रकाशन के खिलाफ प्री-ट्रायल निषेधाज्ञा गलत

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि अदालतों को अपवाद वाले मामलों को छोड़कर किसी समाचार के प्रकाशन के खिलाफ एक पक्षीय निषेधाज्ञा जारी नहीं करनी चाहिए क्योंकि इसका अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और जानकारी प्राप्त करने के लोगों के अधिकार पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है। अंतरराष्ट्रीय मीडिया समूह ‘ब्लूमबर्ग’ को ‘जी एन्टरटेनमेंट’ के खिलाफ कथित अपमानजनक समाचार हटाने का निर्देश देने संबंधी निचली अदालत के आदेश को निरस्त करते हुए शीर्ष अदालत ने कहा कि सामग्री के प्रकाशन के खिलाफ निषेधाज्ञा पूर्ण सुनवाई के बाद ही जारी की जानी चाहिए। प्रधान न्यायाधीश डी वाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली तीन न्यायाधीशों की पीठ ने कहा, ‘‘समाचार के खिलाफ सुनवाई पूर्व निषेधाज्ञा प्रदान करने से इसे लिखने वाले की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और जानकारी प्राप्त करने के लोगों के अधिकार पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है।’’ पीठ में न्यायमूर्ति जे बी पारदीवाला और न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा भी शामिल हैं। 

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