सामाजिक मुक्ति का संदेश देते हैं संत रविदास

By प्रज्ञा पाण्डेय | Feb 16, 2022

आज रविदास जयंती है, सतगुरु रविदास भारत के उन महान संतों में से एक हैं जिन्होंने अपनी रचनाओं के माध्यम से सारे संसार को एकता, भाईचारा का संदेश दिया। साथ ही उन्होंने जीवन भर समाज में फैली कुरीतियों को समाप्त करने का प्रयास किया।


रविदास जयंती प्रमुख त्योहार है। इस साल गुरु रविदास जयंती 16 फरवरी को है। माघ पूर्णिमा के दिन हर साल गुरु रविदास जी की जयंती मनायी जाती है। संत शिरोमणि रविदास का जीवन ऐसे अद्भुत प्रसंगों से भरा है, जो दया, प्रेम, क्षमा, धैर्य, सौहार्द, समानता, सत्यशीलता और विश्व-बंधुत्व जैसे गुणों की प्रेरणा देते हैं। 14वीं सदी के भक्ति युग में माघी पूर्णिमा के दिन रविवार को काशी के मंडुआडीह गांव में रघु व करमाबाई के पुत्र रूप में इन्होंने जन्म लिया। इन्होंने अपनी रचनाओं के माध्यम से आदर्श समाज की स्थापना का प्रयास किया। रविदास जी के सेवक इनको " सतगुरु", "जगतगुरू" आदि नामों से भी पुकारते हैं।

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संत रविदास अपने समकालीन चिंतकों से पृथक थे उन्होंने अपनी रचनाओं के माध्यम से विभिन्न सामाजिक कुरीतियों को दूर करने का प्रयास किया। वह जन्म तथा जाति आधारित वर्ण व्यवस्था के भी विरूद्ध थे।

 

संत रविदास के बारे में जानें रोचक कहानी 

संत रविदास एक महान संत थे। उनके बारे में एक रोचक कथा भी प्रचलित है। इस कथा के अनुसार एक बार एक पंडित जी गंगा स्नान के लिए उनके पास जूते खरीदने आए। पंडित जी ने गंगा पूजन की बात रविदास को बतायी। उन्होंने पंडित महोदय को बिना पैसे लिए ही जूते दे दिए और निवेदन किया कि उनकी एक सुपारी गंगा मैया को भेंट कर दें। संत की निष्ठा इतनी गहरी थी कि पंडित जी ने सुपारी गंगा को भेंट की तो गंगा ने खुद उसे ग्रहण किया। संत रविदास के जीवन का एक प्रेरक प्रसंग यह है कि एक साधु ने उनकी सेवा से प्रसन्न होकर, चलते समय उन्हें पारस पत्थर दिया और बोले कि इसका प्रयोग कर अपनी दरिद्रता मिटा लेना। कुछ महीनों बाद वह वापस आए, तो संत रविदास को उसी अवस्था में पाकर हैरान हुए। साधु ने पारस पत्थर के बारे में पूछा, तो संत ने कहा कि वह उसी जगह रखा है, जहां आप रखकर गए थे। 


सामाजिक एकता पर बल देते थे संत रविदास 

संत रविदास बहुत प्रतिभाशाली थे तथा उन्होंने विभिन्न प्रकार के दोहों तथा पदों की रचना की। उनकी रचनाओं की विशेषता यह थी कि उनकी रचनाओं में समाज हेतु संदेश होता था। उन्होंने अपनी रचनाओं के द्वारा जातिगत भेदभाव को मिटा कर सामाजिक एकता को बढ़ाने पर बल दिया। उन्होंने मानवतावादी मूल्यों की स्थापना कर ऐसे समाज की स्थापना पर बल दिया जिसमें किसी प्रकार का भेदभाव, लोभ-लालच तथा दरिद्रता न हो। 


कई नामों से जाने जाते थे संत रविदास 

संत रविदास पूरे भारत में बहुत लोकप्रिय थे। उन्हें पंजाब में रविदास कहा जाता था। उत्तर प्रदेश, राजस्थान तथा मध्य प्रदेश में उन्हें रैदास के नाम से भी जाना जाता था। बंगाल में उन्हे रूईदास के नाम से जाना जाता है। साथ ही गुजरात तथा महाराष्ट्र के लोग उन्हें रोहिदास के नाम से भी जानते थे। 


बहुत दयालु प्रवृत्ति के थे संत रविदास 

संत रविदास बहुत दयालु प्रवृत्ति के थे । वह बहुत से लोगों को बिना पैसे लिए जूते दे दिया करते थे। वह दूसरों की सहायता करने में कभी पीछे नहीं हटते थे। साथ ही उन्हें संतों की सेवा करने में भी बहुत आनंद आता था। 

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वाराणसी में है संत रविदास का मंदिर 

उत्तर प्रदेश के बनासर शहर में संत रविदास का भव्य मंदिर है तथा वहां सभी धर्मों के लोग दर्शन करने आते हैं। 


संत रविदास ने देखा था मानव मुक्ति का सपना

संत गुरु रविदास बिना किसी आदर्शवादी में न पड़ते हुए व्यावहारिक जीवन की वस्तु स्थिति को स्वीकारते हुए अपनी बात कही है। उनकी चेतना में उनकी जातीय-अस्मिता इस प्रकार व्याप्त है कि उसी मानदण्ड से वह अपने जीवन-व्यवहार एवं कार्य-व्यापार की हर गतिविधि का अवलोकन एवं मूल्यांकन करते हैं। उनका आत्मनिवेदन उनकी जातिगत विडम्बनाओं की उपस्थिति के स्वीकार के साथ व्यक्त हुआ है। संत गुरु रविदास का यह वैशिष्ट्य संकेत करता है कि उनकी अभिव्यक्ति में सिर्फ आध्यात्मिक क्षेत्र की मुक्ति का स्वप्न नहीं बल्कि सामाजिक मुक्ति का स्वप्न भी विद्यमान है।


सामाजिक मुक्ति की यात्रा मानसिक मुक्ति के पहले कदम से प्रारम्भ होती है। सबसे पहले व्यक्ति को स्वयं की मानसिक विडम्बनाओं से मुक्त होना होता है। उसे अपने में आश्वस्त होना पड़ता है कि वह मुक्त है, वह मनुष्य है और उसके भी मानवीय अधिकार हैं जिसे प्राप्त करना उसकी प्राथमिकता है। अपने असहाय दीन-हीन, निर्बल और दलित होने का निरन्तर सोच उसके आत्म-विश्वास को निर्बल करता है। 


संत रविदास का दर्शन

संत गुरु रविदास ने समाज में पहले से व्याप्त जन्मना श्रेष्ठता की अवधारणा के विपरित कर्मणा-श्रेष्ठता की अवधारणा स्थापित की हैं। संत गुरु रविदास किसी को जन्म की जाति के आधार पर श्रेष्ठ मानने के बजाय उसके कर्मों को उसकी श्रेष्ठता का आधार मानते हैं। वह जाति के आधार पर नहीं बल्कि सर्वश्रेष्ठ गुणों से सम्पन्न व्यक्ति को सम्मानित करने के का समर्थन करते हैं। इस प्रकार हमें विश्वास है कि यदि हम बौद्धिकता, वैज्ञानिकता एवं तार्किकता को अपनी सोच का आधार बनाते हैं तो निसन्देह धार्मिक-अंधविश्वास, पाखण्ड, जातिवाद, साम्प्रदायिकता, आतंकवाद जैसे ज्वंलत राष्ट्रीय समस्याओं से मुक्ति पा सकेंगे।


बाबा साहेब भी करते थे संत रविदास का सम्मान

संत गुरु रविदास में यथार्थ बोध होने के साथ ही वह निरन्तर ऊर्जावान, गतिमान बने रहते थे। मीराबाई उनके बारे में कहती हैं  ‘गुरु मिलिआ संत गुरु रविदास जी, दीन्ही ज्ञान की गुटकी.’ ‘मीरा सत गुरु देव की करै वंदा आस। मीराबाई का संत रविदास को गुरु मानना संत रविदास की महानता एवं संवादधर्मिता का तो परिचायक है। यही नहीं यह उनके जात्याभिमान, अस्मिता-बोध एवं यथार्थ-बोध का भी परिचायक है। क्षत्राणि एवं राज परिवार की सदस्या मीराबाई का अछूत समाज में जन्मे संत रविदास को अपना गुरु मानना किसी ऐतिहासिक परिघटना से कम नहीं है।


बहरहाल मीराबाई के संत गुरु रविदास को गुरु मानने से यहीं ध्वनित होता है कि यथार्थ बोध एवं अस्मिता बोध से सम्पन्न दलित, वंचित समाज को, समाज के अन्य वर्गों का भी समर्थन एवं सहयोग मिलता है। डॉ. अम्बेडकर ने भी इसी सत्य को स्वीकार किया था तथा महात्मा गांधी जैसे विचारक भी उनका सम्मान करते थे।


- प्रज्ञा पाण्डेय

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