संतूर को शास्त्रीय गौरव और वैश्विक पहचान दिलाने वाली शख्सियत थे पंडित शिवकुमार शर्मा

By टीम प्रभासाक्षी | May 11, 2022

संतूर को विश्व भर में पहचान दिलाने वाले विख्यात संतूर वादक और संगीतकार पंडित शिवकुमार शर्मा ने महज पांच वर्ष की आयु में तबला वादक के तौर पर संगीत की दुनिया में कदम रखा और जल्द ही उन्होंने संतूर को साधना के रूप में अपनाया और फिर सुरों के सफर में कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। शिवकुमार शर्मा का 10 मई की सुबह दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया। वह 83 वर्ष के थे। वह भारत के जानेमाने शास्त्रीय संगीतकारों में से एक थे जिन्होंने फिल्मों में भी संगीत दिया था।

लेखिका इना पुरी द्वारा लिखी गई शर्मा की आत्मकथा जर्नी विद हंडरेड स्ट्रिंग्स: माइ लाइफ इन म्यूजिक में कहा गया, जब वह 14 वर्ष के थे, तो एक दिन उनके पिता श्रीनगर से संतूर लेकर लौटे और घोषणा की कि उन्होंने अपने बेटे का वास्तविक पेशा खोज लिया है। इस पुस्तक के सह-लेखक शिवकुमार शर्मा ने आत्मकथा में कहा, वह मेरे पिता थे जोकि हमारे घर में संगीत लेकर आये थे। उनसे पहले, मेरे दादाजी जम्मू एवं कश्मीर के महाराजा राजा प्रताप सिंह के शाही मंदिर में राजपुरोहित थे। एक युवा संगीतकार के लिए ये बेहद जोखिम भरा था कि वह तबला वादन के गुर बीच में ही छोड़कर इसकी अपेक्षा काफी कम पहचाने जाने वाले वाद्ययंत्र पर ध्यान केंद्रित करे।

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शुरुआती दौर में आलोचकों ने शास्त्रीय संगीत के लिए संतूर को उपयुक्त करार नहीं दिया, हालांकि, दृढ़ संकल्प वाले शर्मा ने अपनी प्रतिभा के बल पर संतूर को शास्त्रीय प्रस्तुतियों का एक महत्वपूर्ण घटक बना दिया। वर्ष 2013 में राज्यसभा टीवी के शो शख्सियत में साक्षात्कार के दौरान शर्मा ने पुरानी यादों को ताजा करते हुए कहा था, जब मैं सात-आठ साल का था, तब मैंने रेडियो पर बाल कार्यक्रमों के लिए तबला वादन शुरू किया। एक दिन मेरे पिता ने कहा कि मैं आपको यह वाद्ययंत्र (संतूर) सिखाना चाहता हूं। मैंना सोचा कि मुझे यह वाद्ययंत्र क्यों बजाना चाहिए? हालांकि, जब मैंने संतूर बजाना शुरू किया तो रागदारी और तबला का ज्ञान होने का लाभ मुझे मिला।

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