दाढ़ी और मूँछ (व्यंग्य)

By डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ | Dec 19, 2023

व्याकरण दाढ़ी-मूँछों का लिंग बता देता है और राजनीति उनका धर्म। दाढ़ी और मूँछ के बालों ने न जाने कब अपनी पार्टी बना ली हमें खबर ही नहीं हुई। उगते तो ये चेहरे पर ही हैं लेकिन इनका धर्म आँखों के रास्ते से होते हुए कब वोट बटोरने का बहाना बन जाते हैं, इसका पता किसी राज्य में किसी की सरकार बनने और गिरने से चलता है। इन बालों में बड़ा दम है। बुरे को अच्छा और अच्छे को बुरा बताने की ताकत रखते हैं। थोबड़े में इनके उगने भर की खुराक हो तो कहने ही क्या। किसी को महान और किसी को शैतान बनाने का माद्दा रखते हैं।  

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दाढ़ी-मूँछ से मेरी एक छोटी सी गुजारिश है। मुझे वे इतना भर बता दें कि तुम कैसे किसी के चेहरे पर उगकर रवींद्रनाथ टैगोर बन जाते हो और किसी के चेहरे पर उगकर सद्दाम हुसैन। जबकि रवींद्रनाथ टैगोर सा लगने वाला कविता का ‘क’ भी नहीं जानता और सद्दाम हुसैन सा लगने वाला तुम्हारे बिना पप्पु बनकर रह जाने वाला कैसे आतंकवादी बन जाता है। चोर की दाढ़ी में अब तिनके नहीं पड़ते। अब तो इन दाढ़ियों के रखरखाव के लिए इतना खर्च होता है कि उतने में सौ-पचास गरीबों का घर चल सके। काश तुम व्याकरण में लिंग तक ही सीमित रह जाते। अब मुझे तुम्हारे भीतर धर्म का जंजाल दिखायी देता है। हो सके तो उगने से पहले बता दो कि तुम किस धर्म के हो।

- डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’,

(हिंदी अकादमी, मुंबई से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)

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