By डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ | May 17, 2023
स्वतंत्रता से पहले राजा-रजवाड़ों का शासन था। स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात एक-एक कर इन्हें मिला लिया गया। यह राजाओं को रास नहीं आया। लेकिन वे मजबूर थे। धीरे-धीरे परिस्थितियाँ सामान्य होने लगीं। राजाओं को भी लगा जो हुआ अच्छा हुआ। बहुत हुआ अपना शासन। अब देखते हैं जनता का शासन कैसा होता है।
राजा उसके पास गया। उसने पूछा– यह कागज़ के टुकड़े क्या हैं? इन्हें इस तरह से क्यों बिछाकर रखा है? इससे अच्छा कोई दूसरा धंधा क्यों नहीं कर लेते?
इस पर बंदे ने कहा– घोड़े और मुकुट से तो आप राजा लगते हैं। आपके जमाने में पढ़ाई नहीं थी। इसीलिए आप अनपढ़ रह गए। इन कागज़ों का महत्व आप क्या समझेंगे?
राजा ने कहा– बात तो तुम्हारी एकदम ठीक है। लेकिन हम कर भी क्या सकते हैं? भाग्य में जो लिखा था वही मुझे प्राप्त हुआ। भाग्य का लिखा कौन बदल सकता है?
बंदे ने कहा– कौन कहता है नहीं बदल सकते? इन कागज़ के टुकड़ों से भाग्य बदल सकते हैं।
राजा ने कहा– इन कागज़ के टुकड़ों से? वह कैसे?
बंदे ने कहा– ये कागज़ के टुकड़े नहीं हैं। ये डिग्री हैं डिग्री। इसे जो प्राप्त कर लेता है समाज उसका खूब सम्मान करता है। उसे पढ़ा-लिखा मानकर उसकी खातिरदारी करता है।
राजा ने कहा– वाह। यह तो बहुत बढ़िया बात है। मेरे लायक कोई डिग्री हो तो मोल-भाव करके दे दो।
बंदे ने कहा– क्यों नहीं राजा जी। आपके लिए एमए की डिग्री सबसे अच्छी रहेगी। आपका चेहरा, शरीर का आकार इस डिग्री पर एकदम फिट बैठता है। आगे से आप किसी को मिलें तो खुद को एम.ए. पास कहें। फिर देखिए किस तरह लोग आपकी प्रशंसा करने लगेंगे।
राजा ने अपने गले से एक सोना जड़ित हार निकालकर बंदे को दे दिया। बदले में डिग्री लेकर खुशी-खुशी अपने घोड़े पर सवार घर की ओर निकल पड़े। रास्ते में राजा को क्या सूझा कि अचानक से वे रुक गए। उन्हें लगा मैं तो डिग्री पास हो गया किंतु मेरा घोड़ा तो अनपढ़-गंवार ही रह गया। क्यों न मेरे घोड़े के लिए भी एक डिग्री ले लूँ। पढ़ा-लिखा घोड़ा होगा तो मेरा सम्मान और बढ़ जाएगा। यही सोचकर डिग्री बेचने वाले बंदे के पास आनन-फानन में पहुँच गया।
वहाँ जाकर राजा ने अपनी व्यथा बताई। यह सुनकर बंदा पहले तो खूब हँसा। फिर उसने कहा– साहब यह डिग्री गधों के लिए है घोड़ों के लिए नहीं।
- डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’
प्रसिद्ध नवयुवा व्यंग्यकार