वाद की खाद खाते हैं वो... वात और वाद के रोगी (व्यंग्य)

By डॉ मुकेश असीमित | Jul 08, 2025

इस दुनिया में दो पक्के प्रकार के रोगी मिलते हैं — एक, जो ‘वात’ से पीड़ित होते हैं, और दूसरे, जो ‘वाद’ से। कई बार ये दोनों रोग एक साथ भी आ जाते हैं, और जब ऐसा होता है, तो स्थिति लगभग असाध्य हो जाती है।

वायु अगर घुटनों में जा घुसे तो आदमी लंगड़ाने लगे; पेट में हो तो अपच, बदहजमी, गैस की समस्या। और यदि वही वायु मस्तिष्क में चढ़ जाए, तो वह वात न रहकर वाद बन जाती है — और वाद का रोगी सिर्फ मानसिक रूप से नहीं, सामाजिक रूप से भी बीमार माना जाता है।

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वाद के रोगी के लक्षण स्पष्ट होते हैं —

चेहरे पर तनाव, बात-बात में अकड़, मुँह से अनर्गल गालियाँ, दूसरों को अपमानित करना, खुद को महापुरुष घोषित करना और दिनभर चक्करघिन्नी की तरह घूमते रहना।

वाद की भी कई किस्में होती हैं — प्रगतिवाद, प्रतिक्रियावाद, परंपरावाद, राष्ट्रवाद, निष्पक्षवाद, फलाँवाद, ढिकानावाद... बिल्कुल वायरस के स्ट्रेन की तरह। इनमें लक्षण भले ही मिलते-जुलते हों, लेकिन इलाज अलग-अलग होता है।

इस वाद से ग्रसित व्यक्ति, ठीक वैसे ही व्यवहार करता है जैसे कोई बीमार आदमी, जिसे अपनी बीमारी से प्रेम हो जाए — वह उसे ओढ़े-बिछाए घूमता है, हर चर्चा में अपनी बीमारी घुसेड़ देता है, और दूसरों की बीमारियों को घटिया या तुच्छ बताता है।

वह दिनभर घूमता है, दूसरों को विचारों का इंजेक्शन देता है, खुद को ‘महान पीड़ित’ और बाकी सबको ‘भ्रमित’ मानता है।

और इस सबके बीच, कोई एक सामान्य, संतुलित व्यक्ति — जिसे न वात ने घेरा है, न वाद ने — उन्हें बीमार लगने लगता है।

ऐसे में वाद-पीड़ित उस सामान्य व्यक्ति से भी बहस में उलझ जाते हैं, और अंततः उसे भी किसी न किसी वाद में घसीट ही लेते हैं।

क्योंकि इस बीमारी का नियम है —

“जो बीमार नहीं है, उसे बीमार साबित करो — यही असली वाद का प्रचार है।”

कई लोग वाद के विवाद में न पड़कर स्वयं को शील  कहलवाना पसंद करते हैं... नाम से ही सही, कम से कम शालीन  नजर आएं।

जैसे  एक हैं हमारे बब्बन चचा...

ये प्रगतिशील हैं... प्रगति में विश्वास रखते हैं — प्रगति का घूंघट ओढ़े रहते हैं।

थोड़ा ही कोई इनका घूंघट उठाने की जुर्रत करे तो शील भंग  होने का रंडी-रोना रोते नजर आते हैं।

प्रगति का नंगा नाच करते हैं ये — मन, शीर और अपने कुकर्म से कभी-कभार पूरी नंगाई पर उतर आते हैं। प्रगति की लाठी हाथ में लिए लठियाते हैं, प्रगतियाते हैं!

प्रगति के पीछे हाथ धोकर पड़े हैं... लेकिन,अब प्रगति की काली कोठरी में हाथ काले हुए बिना रहेंगे क्या.. प्रगति की कालिख अब पूरे चेहरे पर पोत ली है। लोट-लुहान हैं।

देखो तो, जुगाली करते हैं तो प्रगति की कैसी फेन सी निकल आती है मुँह से!

प्रगति की हरी घास काटने के लिए सर्वहारा की हँसिया इस्तेमाल करना इन्हें अतिप्रिय है!

जो उनके वाद का नहीं है, उस पर वाद-विवाद की तलवार चलाते हैं।

हद तो यह है कि ये संवेदनाएँ नहीं फैलाते — ये तो सनसनी फैलाते हैं।

अपने ‘वाद’ को ही अंतिम सत्य मानने वाले ये लोग खुद को ‘सर्वहारा’ घोषित कर चुके हैं —

मगर जहाँ भी किसी लेखक में वाद विहीन स्वतंत्रता दिखे, वहीं ये लपक पड़ते हैं।

वे सभी साहित्यकार इनके निशाने पर होते हैं, जो किसी भी वाद में नहीं फँसते —

उन्हें ‘प्रतिक्रियावादी’ करार दे दिया जाता है,

उन्हें जनविरोधी  घोषित कर दिया जाता है,

और साहित्य के मंचों पर तख्तियाँ टाँग दी जाती हैं —

"यहाँ बिना वाद का प्रवेश वर्जित है।"

उन्होंने मुझसे पूछा —

“आप किस वाद से पीड़ित हैं?”

मैंने निर्विवाद रूप से अपनी मंशा जताई —

“कृपया मुझे किसी वाद के कीचड़ में न घसीटें।”

बोले —

“कैसे लेखक हो तुम यार? बिना वाद की स्याही डाले तुम्हारी लेखनी लिख ही कैसे पाएगी! तुम किसी वाद से पीड़ित नहीं हो — इसका मतलब निश्चित ही तुम सत्ता के चाटुकार हो... सत्ता के दरबारी! क्योंकि वही तो छुपाए फिरते हैं अपनी फितरत!”

और जब मैं कहता हूँ —

“भाई, मुझे निर्विवाद ही रहने दो… क्यों घसीट रहे हो किसी वाद में?”

तो कहते हैं —

“बेटा! साहित्य के किले में वाद की रस्सी पकड़कर ही चढ़ा जाता है!”

कहो... अब मैं क्या करूँ? रस्सी पकड़ूँ या कलम?

– डॉ मुकेश असीमित

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