By संतोष उत्सुक | Apr 19, 2021
यह एक कानूनी सत्य है कि सही मुजरिम पकड़ना हमेशा बाएं हाथ का खेल नहीं होता। पुलिस के हाथ बहुत लम्बे बताए जाते रहे हैं लेकिन देसी घी जैसी पहलवानी बात यह भी है कि मुजरिमों के हाथ भी कम चौड़े नहीं होते जिनका किसी को भी अता पता नहीं होता। पुलिस ने चोर, शातिर और मुजरिम ढूंढने, पकड़ने और सज़ा दिलाने के लिए पुराने नए तरीकों का घोल बना रखा है । इस घोल का असर कई बार गलत व्यक्ति को पकड़वा देता है और सालों जेल में रहने का मौक़ा देता है। सबकी तो व्यक्तिगत, सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक या राजनीतिक पहुंच नहीं होती तभी आम आदमी से ज़्यादा खास को सुरक्षा प्रदान करने वालों की बहुत से मामलों में ज़बर्दस्त तारीफ़ होती है।
इस घटना से स्पष्ट प्रेरणा मिलती है कि क़ानून से इंसान चाहे बच जाए लोहा नहीं बच सकता। इंसानों के मुक्कदमे मशीनों, वृक्षों या इमारतों पर दायर कर सकते हैं। इतिहास में जो कुछ हुआ उससे सम्बंधित पिस्तौल, सड़क, कार या ट्रक को आज भी सख्त सज़ा दे सकते हैं। ऐसा ही वर्तमान व भविष्य में भी किया जा सकता है। इससे बहुत बेहतर तरीके से पहुंच वाले माननीयों और मानवाधिकारों की रक्षा भी हो जाएगी। ‘चेतन’ को मुजरिम न बनाकर, ‘जड़’ को मुजरिम बनाकर इंसानों के खिलाफ हुए अपराधों की जांच व सुनवाई में संवेदनशील रवैया अपनाने से बच जाएंगे। समय और पैसा भी बचेगा और अदालतों में मुक्क्दमों का जंगल भी नहीं उगेगा। कोई मरे या कटे, प्रशासन द्वारा अपने नजरिए से लोकतांत्रिक मूल्य बचाना बहुत लाजमी है। तमाम किस्म के जुर्म चलाने वाले इंसानी इंजन, खुले आम घूमते रहते हैं और मुक्कदमे जंग लगा लोहा होते रहते हैं। बढ़िया है, जब भी कोई झगड़ा या क्राइम हो, यहां तक कि खून हो जाए, किसी भी निर्जीव ठोस चीज़ को अपराधी मानकर उस पर मामला दायर कर देना सबसे सुरक्षित उपाय है। यह परिस्थिति प्रेरित प्राकृतिक न्याय की शुरुआत मानी जा सकती है।
- संतोष उत्सुक