उल्टा-पुल्टा (व्यंग्य)

By डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा | Dec 16, 2023

खरगोश शेर के पास पहुँचा। उसने देखा वनराज शेर महाराज भूख के मारे आग बबूला हुए जा रहे हैं। खरगोश को लगा यही मौका है चलो शेर को मजा चखाते हैं। उसने शेर से झूठ कह दिया कि उसे रास्ते में एक और शेर मिल गया। वह उसे खाना चाहता था। लेकिन उसने पहले शेर का हवाला देकर जैसे-तैसे अपनी जान बचाई।

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यह सब देख खरगोश का माथा ठनका। उसे लगा कि पंचतंत्र की घटना तो तंत्रपंच की घटना बन गयी। उसने शेर के सामने गिड़गिड़ाते हुए कहा – माई-बाप मैंने कुएँ वाले शेर के बारे में आपसे झूठ कहा था। वह तो आपकी परछाई मात्र थी। आपको इतने बड़े-बड़े वादे नहीं करना चाहिए था।

शेर ने कहा – जानता हूँ। हाँ, जहाँ तक बात वादों की है, तो वे वादे नहीं जुमले हैं। आज दुनिया जुमले सुनने की आदी हो चुकी है। इसलिए जब काम जुमलों से हो जाता हो तो वादे पूरा करने का क्या फायदा। 

इतना कहते हुए शेर ने खरगोश पर एक बड़ा सा पंजा मारा। जीएसटी की भांति एक ही हमले में सारा हिसाब बराबर। खरगोश पेट में और डकार बाहर। पंचतंत्र के तंत्रपंच से यही शिक्षा मिलती है कि मैंने जिस शेर के बारे में आपको बताया है, वह आपके आस-पास ही घूम रहा है। हो सके तो खुद को खरगोश बनने से बचा लें।

- डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’,

(हिंदी अकादमी, मुंबई से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)

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