ज़रूरत की बरसाती मरम्मत (व्यंग्य)

By संतोष उत्सुक | Aug 11, 2020

विकासजी के राज्य में यूं तो पूरा साल योजनाएं बनती रहती हैं लेकिन बरसात का मौसम विकास का खालिस मौसम होता है। इसमें कम हींग और कम फटकरी में रंग चोखा चढ़ जाता है। नए ठेकेदार बने छुटभैये नेता पूरे उत्साह से टेंडर भरते है और प्रशासन संग गलबहियां डालकर विकासजी का स्वागत करते हैं। उनके कार्यकर्ता सड़कों पर पड़े गड्ढों को ढूंढते हैं, उन्हें खींच कर लम्बा चौड़ा और गहरा करते हैं ताकि शहर की सडकों की मरम्मत अच्छी तरह से की जाए।

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उन्होंने सरकार से कहा कि ठेकेदार को, सड़क को उखाड़कर फिर से सही ढंग से बनाने के आदेश दिए जाएं। कमेटी के कार्यकारी अधिकारी ने कहा आप चिंता न करें आपका ज्ञापन मिल गया है। हमें पता नहीं था कि यह ठेकेदार भी ऐसा निकलेगा, उससे  बात कर सड़क दरुस्त करवा दी जाएगी। प्रतिनिधि मंडल और कुछ कर भी नहीं सकता था उनको तो पानी पीने के लिए भी नहीं पूछा गया, बाहर आकर पड़ोस की दुकान में चाय पीने लगा ।  

इस दौरान एस्टीमेट पकाने की स्पीड बढ़ जाती है, इस काम में वार्ड के मेहनती पार्षद बहुत मेहनत करते हैं और ध्यान रखते हैं कि किस किस वोटर ने घर का कौन कौन सा कोना या नाली ठीक करवाने को कह रखा है। कमेटी के अफसर फटाफट साइट का दौरा करते हैं, जनता की सेवा उनका परम धर्म हो जाता है। उन्होंने एक बार फिर से गली ठीक करवानी शुरू कर दी लेकिन बरसात के मौसम के कारण अगले दिन तेज़ बारिश में मरम्मत पूरी तरह बह गई। कनिष्ठ इंजीनियर ने मौके का फिर सघन दौरा किया, नए ठेकेदार से एस्टीमेट लिया गया और बरसात में बह गई सड़क का दोष प्राकृतिक आपदा के नाम मढ़कर फिर से बढ़िया मरम्मत करवाने की ख़बरें सभी अखबारों में छपवा दी गई।

- संतोष उत्सुक

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