वीज़ा का चक्कर (व्यंग्य)

By डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा 'उरतृप्त' | Sep 27, 2025

वह सुबह कुछ अलग थी। सूरज ने जैसे तय कर लिया था कि आज वह अमेरिका के कॉर्पोरेट टावरों पर नहीं, भारत के वीज़ा एप्लिकेशन फॉर्म पर चमकेगा। श्रीमान चिराग वर्मा, जो पिछले तीन साल से न्यू जर्सी की एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में "टेक्निकल एसेट" की तरह काम कर रहे थे, आज अपने बॉस के केबिन में बुलाए गए थे। बॉस का नाम था मिस्टर ग्रेग थॉर्न—चेहरा ऐसा जैसे नैतिकता को पेंशन पर भेज चुका हो।

चिराग ने मुस्कुराने की कोशिश की, लेकिन मुस्कान वीज़ा की शर्तों में अटक गई।

“तुमने उस ट्वीट को देखा?” ग्रेग ने पूछा।

“जी सर, देखा,” चिराग ने कहा, जैसे कोई छात्र परीक्षा में वही सवाल देखता है जो उसने नहीं पढ़ा।

“तो तुम्हें क्या लगता है?” ग्रेग बोले।

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“सर, मुझे लगता है कि पीड़िता की बात सुननी चाहिए,” चिराग ने कहा।

ग्रेग ने खिड़की की ओर देखा, जैसे नैतिकता बाहर खड़ी हो और अंदर आने की इजाज़त मांग रही हो।

“देखो चिराग, हम एक कंपनी हैं। हमें टैलेंट चाहिए, ट्रायल नहीं,” ग्रेग बोले।

“लेकिन सर, कोर्ट ने उसे दोषी माना है,” चिराग ने कहा।

“कोर्ट? कोर्ट तो कानून देखता है, हम तो प्रॉफिट,” ग्रेग ने कहा, और पानी का गिलास उठाया।

चिराग चुप रहा। उसकी चुप्पी में वीज़ा की वैधता, नैतिकता की असहमति और नौकरी की मजबूरी एक साथ बैठी थीं।

“तुम्हें समझना चाहिए, चिराग, कि हम सबको साथ लेकर चलते हैं। चाहे वह आरोपी हो या एच-1बी वीज़ा धारक,” ग्रेग ने कहा।

“सर, अगर पीड़िता मेरी बहन होती?” चिराग ने पूछा।

ग्रेग ने गिलास को होंठों से लगाया, जैसे कोई नेता सवाल सुनकर पानी पीने लगता है।

खांसी उठी। नाक से पानी निकला। मगर जवाब नहीं निकला।

“देखो चिराग, तुम इमोशनल हो रहे हो। ये कॉर्पोरेट है, यहाँ इमोशन नहीं, एक्सेल शीट चलती है,” ग्रेग बोले।

“सर, मुझे लगता है कि हम नैतिक रूप से गलत कर रहे हैं,” चिराग ने कहा।

“नैतिकता? वो तो छुट्टी पर है। और तुम भी चले जाओगे अगर ज्यादा बोले,” ग्रेग ने कहा, और मुस्कुराया।

चिराग ने सोचा, क्या यही वह देश है जहाँ सपनों को बुलाया जाता है, और फिर उन्हें कॉन्ट्रैक्ट की शर्तों में बाँध दिया जाता है?

बाहर बारिश शुरू हो गई थी। जैसे नैतिकता रो रही हो।

चिराग ने अपना लैपटॉप बंद किया, जैसे कोई उम्मीद का दरवाज़ा बंद करता है।

“सर, मैं इस्तीफा देना चाहता हूँ,” चिराग ने कहा।

ग्रेग ने चौंक कर देखा, जैसे कोई बैंक मैनेजर देखे कि ग्राहक ने लोन चुकता कर दिया।

“तुम्हें पता है, तुम्हारा वीज़ा इसी कंपनी से जुड़ा है?” ग्रेग ने कहा।

“जी सर, पता है। लेकिन अब आत्मा को भी तो कहीं जुड़ना चाहिए,” चिराग ने कहा।

ग्रेग चुप रहा। पहली बार उसकी चुप्पी में हार थी।

चिराग बाहर निकला। बारिश तेज़ हो गई थी। मगर अब वह भीगने से नहीं डर रहा था।

उसने सोचा, शायद अब कोई नया सूरज उगेगा—जो वीज़ा नहीं, विवेक देगा।

- डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’,

(हिंदी अकादमी, मुंबई से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)

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