By Ankit Jaiswal | Jul 08, 2026
मंगलवार को विदेशी मुद्रा बाजार से अच्छी खबर सामने आई। पिछले कुछ दिनों से दबाव झेल रहा भारतीय रुपया आखिरकार मजबूत वापसी करने में सफल रहा और अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 43 पैसे की बढ़त दर्ज की। मौजूद जानकारी के अनुसार, यह पिछले तीन सप्ताह के दौरान रुपये की सबसे बड़ी एकदिनी मजबूती मानी जा रही है।
बता दें कि सऊदी अरब ने एशियाई देशों के लिए अगस्त महीने में कच्चे तेल की आधिकारिक बिक्री कीमत में प्रति बैरल 11 डॉलर तक की कटौती की है। इस फैसले के बाद यह उम्मीद बढ़ी कि भारत जैसे बड़े तेल आयातक देशों का आयात खर्च कम हो सकता है। चूंकि भारत अपनी जरूरत का अधिकांश कच्चा तेल विदेशों से खरीदता है, इसलिए तेल की कीमतों में कमी का सीधा सकारात्मक असर रुपये और देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ता है।
गौरतलब है कि पश्चिम एशिया में भू-राजनीतिक तनाव कुछ कम होने के संकेत भी बाजार के लिए राहत लेकर आए। तनाव कम होने से ऊर्जा आपूर्ति को लेकर बनी अनिश्चितता घटी और निवेशकों का भरोसा मजबूत हुआ। इसी कारण वैश्विक बाजारों में जोखिम लेने की भावना बढ़ी, जिसका लाभ भारतीय मुद्रा को भी मिला है।
विदेशी निवेशकों की ओर से भी भारतीय बाजार में निवेश बढ़ा। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, विदेशी संस्थागत निवेशकों ने भारतीय शेयर बाजार में 243.03 करोड़ रुपये की शुद्ध खरीदारी की। विदेशी निवेश बढ़ने से डॉलर की मांग कुछ कम होती है, जिससे रुपये को अतिरिक्त समर्थन मिलता है।
एलकेपी सिक्योरिटीज के शोध विश्लेषक जतीन त्रिवेदी के अनुसार, सऊदी अरब द्वारा एशियाई खरीदारों के लिए कच्चे तेल की कीमतें घटाने और पश्चिम एशिया में तनाव कम होने की खबरों से रुपये को मजबूती मिली है। उन्होंने कहा कि आयात बिल कम होने की संभावना और वैश्विक निवेशकों की बेहतर धारणा ने भी भारतीय मुद्रा को सहारा दिया है।
इस बीच अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड का भाव वायदा कारोबार में करीब 72.9 डॉलर प्रति बैरल के आसपास रहा। वहीं डॉलर सूचकांक लगभग 100.96 के स्तर पर देखा गया। हालांकि डॉलर में हल्की मजबूती रही, लेकिन रुपये पर उसका अधिक असर नहीं पड़ा क्योंकि घरेलू और वैश्विक दोनों स्तरों पर सकारात्मक संकेत मौजूद रहे हैं।
अर्थशास्त्रियों का मानना है कि यदि कच्चे तेल की कीमतें नियंत्रित रहती हैं और विदेशी निवेशकों की खरीदारी जारी रहती है तो आने वाले दिनों में रुपये को और मजबूती मिल सकती है। मजबूत रुपया आयात लागत कम करने, महंगाई पर नियंत्रण रखने और देश के व्यापार संतुलन को बेहतर बनाने में भी मददगार साबित हो सकता है। हालांकि वैश्विक भू-राजनीतिक घटनाक्रम और अमेरिकी केंद्रीय बैंक की आगामी नीतियां आगे भी रुपये की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगी।