सऊदी की वो भूल जो करा रही फजीहत, अंसारुल्लाह कैसे चढ़ बैठे, ट्रंप की धकधकी क्यों बढ़ी?

By अभिनय आकाश | Oct 15, 2026

यमन से जिस तरह से प्रतिकार अंसारुल्लाह हूती कर रहे हैं वो सऊदी अरब के लिए गले की फांस बनता चला जा रहा है। मिडिल ईस्ट में सऊदी अरब की हालत ऐसी हो गई है जैसे किसी शख्स ने अपनी सारी एनर्जी और वक्त घर के लिए बेहतर ताले और अलार्म बनाने, बाहर से बुलाने और लगाने में खर्च कर डाले। लेकिन अब जब वक्त आया तो ताले टूट गए हैं। ताले काम नहीं आ रहे हैं। अलार्म बज नहीं रहे हैं। जब घर तक धावा बोल दिया गया तो अब इस्लामाबाद, अंकारा, वाशिंगटन और लंदन में ताला बनाने वालों से पूछ रहा है सऊदी कि क्या उनके पास कुछ बेहतर है। मिडिल ईस्ट की सऊदी हूती जंग पर नजर रख रहे एक्सपर्ट तो यही कहते हैं। सोशल मीडिया पर लोग चर्चा कर रहे हैं कि आखिर 3 महीनों में सऊदी अरब हूतियों या अंसारुल्लाह से पार क्यों नहीं पा सका? रॉयल सऊदी एयरफोर्स एक ऐसी ताकत है जिसे जीता जाना बेहद मुश्किल है। बरसों से अमेरिका सऊदी अरब को वो फाइटर जेट और डिफेंस सिस्टम देता रहा है जिसके लिए दुनिया भर की एयरफोर्स तरसती है। सऊदी के पास F-15 एस एफ-15 ईगल का एडवांस वेरिएंट है। इतनी तादाद में कि दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा F1-15 बेड़ा वह बन जाता है जो सिर्फ अमेरिकी एयरफोर्स के बाद दुनिया में दूसरा है। इतना ही नहीं एफ-15 ऐसे में एपीजी 63 एक्टिव इलेक्ट्रॉनिकली स्कैन रडार कंप्यूटर आर्किटेक्चर डिजिटल फ्लाई बाय वायर फ्लाइट कंट्रोल जैसी सुविधाएं सऊदी के पास हैं। 

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जानकार कहते हैं कि इसके लिए हमें यमन में अंडरग्राउंड ढांचे के इतिहास को समझना होगा। जिसमें अंसारुल्लाह ने बरसों से मेहनत की है और इसे डेवलप किया हुआ है। टूटे-फूटे इलाके, चट्टानें और घाटियां उन्हें कुदरती सेफ जोोन या गलियारे देती हैं। सऊदी वायुसेना सुरंग के प्रवेश द्वारों यानी एंट्री पॉइंट पर बमबारी कर रही है। यहूतियों के लिए कुछ घंटों का खेल है। उनके इंजीनियर्स और एक्सपर्ट कुछ ही घंटों में उस नुकसान की भरपाई कर लेते हैं। उसे दुरुस्त कर देते हैं। मीडिया रिपोर्ट बताती है कि जब अंसारुल्ला तहरीक ने यमन में साल 2014-15 में सरकार बनाई और सना को राजधानी बनाया और उस पर कंट्रोल हासिल किया तो उन्होंने सबसे पहले अपने डिफेंस के बुनियादी ढांचे को विरासत में लिया जिसमें सैन्य अड्डे, गोला बारूद, डिपो, कमांड सेंटर और तकनीकी सुविधाएं शामिल हैं, जो 1970 की दहाई से बन रहे थे। क्योंकि पहले भी यमन में लंबी जंगे चली हैं और यमनी आर्म फोर्स ने जमीन के अंदर सुरंगों पर काफी मेहनत कर रखी थी। उनमें से कई तो सोवियत और चीनी मदद से मिडिल ईस्ट में पकड़ बनाए रखने के लिए कोल्ड वॉर के वक्त में बनाई गई थी। इसके उलट सऊदी एयरफोर्स ने खुद को लंबे टारगेट के लिए तैयार किया था।

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