Jan Gan Man: स्वेच्छा से देह व्यापर करने वाली महिलाओं के लिए बड़ी राहत है Prostitution और Sex Workers Rights पर आया Supreme Court का फैसला

By नीरज कुमार दुबे | Jun 02, 2026

उच्चतम न्यायालय ने देह व्यापार, मानव तस्करी और वयस्क यौनकर्मियों के अधिकारों को लेकर एक ऐतिहासिक और दूरगामी फैसला सुनाते हुए स्पष्ट कर दिया है कि हर मामले को एक ही नजरिये से नहीं देखा जा सकता। अदालत ने अनैतिक देह व्यापार निवारण अधिनियम के तहत चल रही कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाते हुए कहा कि स्वेच्छा से देह व्यापार करने वाली वयस्क महिलाओं, तस्करी का शिकार महिलाओं और दबाव या हिंसा के कारण इस दलदल में धकेली गई महिलाओं को एक ही श्रेणी में रखकर देखना अन्यायपूर्ण है। न्यायालय ने यह भी कहा कि किसी महिला को केवल इसलिए अपराधी नहीं माना जा सकता क्योंकि वह देह व्यापार से जुड़ी हुई है।

करीब तीन सौ पृष्ठों के इस फैसले में अदालत ने माना कि वर्तमान कानून में सबसे बड़ी समस्या यह है कि वह तस्करी और स्वेच्छा से किए जा रहे देह व्यापार के बीच स्पष्ट भेद नहीं करता। न्यायालय ने कहा कि कानून की इसी कमजोरी के कारण तस्करी की शिकार महिलाएं, बाद में स्वेच्छा से इस पेशे में बनी रहने वाली महिलाएं और अपनी इच्छा से यह काम चुनने वाली महिलाएं, सभी को एक जैसी कानूनी प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। इससे न केवल भ्रम पैदा होता है बल्कि स्वेच्छा से काम कर रही महिलाओं को भी सामाजिक अपमान, पुलिस उत्पीड़न और कानूनी असुरक्षा झेलनी पड़ती है।

अदालत ने मजिस्ट्रेटों के लिए भी स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी किए हैं। अब यदि किसी यौनकर्मी को अदालत के सामने पेश किया जाता है तो सबसे पहले यह जांच करनी होगी कि वह महिला स्वेच्छा से यह काम कर रही है या किसी दबाव, धमकी अथवा तस्करी का शिकार है। यदि कोई वयस्क महिला साफ तौर पर कहती है कि वह अपनी इच्छा से देह व्यापार कर रही है और उसे किसी सुरक्षित गृह में बंद नहीं किया जाना चाहिए, तो मजिस्ट्रेट को उसकी बात गंभीरता से सुननी होगी। हालांकि अदालत ने यह भी माना कि कई बार तस्कर मानसिक दबाव, भय और हिंसा के जरिए पीड़ितों को नियंत्रित करते हैं, इसलिए जांच की प्रक्रिया आवश्यक रहेगी।

फैसले में पुलिस की भूमिका पर भी गंभीर टिप्पणियां की गई हैं। अदालत ने माना कि कई मामलों में पुलिसकर्मियों की मिलीभगत, उत्पीड़न और हिरासत में यौन शोषण की शिकायतें सामने आती रही हैं। इसलिए न्यायालय ने सरकार से आग्रह किया है कि ऐसा विशेष प्रावधान बनाया जाए जिसमें हिरासत में किसी पीड़िता के साथ यौन शोषण करने वाले पुलिसकर्मियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई हो सके। अदालत ने यह भी कहा कि यदि कोई पुलिस अधिकारी बचाई गई महिला को समय पर मजिस्ट्रेट के सामने पेश नहीं करता तो उसके खिलाफ गलत तरीके से हिरासत में रखने की धारणा मानी जानी चाहिए।

बचाव अभियानों के दौरान पुलिस के व्यवहार को लेकर भी अदालत ने कड़े निर्देश दिए हैं। अदालत ने कहा कि किसी भी महिला के साथ अपमानजनक भाषा, मारपीट या अनावश्यक बल प्रयोग नहीं होना चाहिए। बचाव अभियान के दौरान यह समझने की कोशिश की जानी चाहिए कि कौन महिला तस्करी की शिकार है और कौन स्वेच्छा से काम कर रही है। साथ ही यह भी सुनिश्चित किया जाए कि तस्वीरें या चल चित्र बनाते समय पीड़ित महिलाओं की पहचान उजागर न हो।

उच्चतम न्यायालय ने केंद्र सरकार से यह भी कहा है कि मानव तस्करी से निपटने के लिए एक व्यापक और अलग कानून बनाया जाए, जो केवल देह व्यापार तक सीमित न होकर हर प्रकार के शोषण को शामिल करे। अदालत का मानना है कि मौजूदा कानूनी ढांचा बिखरा हुआ है और उसमें स्पष्टता की कमी है।

देखा जाये तो उच्चतम न्यायालय का यह फैसला भारतीय समाज और कानून दोनों के लिए एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हो सकता है। लंबे समय से देह व्यापार के प्रश्न को नैतिकता, शर्म और सामाजिक पूर्वाग्रह के चश्मे से देखा जाता रहा है। कानून भी उसी मानसिकता का विस्तार बन गया था, जहां हर यौनकर्मी को पीड़िता, अपराधी या नैतिक पतन का प्रतीक मान लिया जाता था। इस फैसले ने पहली बार यह स्वीकार किया है कि हर महिला की अपनी इच्छा, गरिमा और निर्णय लेने की क्षमता होती है। यही इस फैसले की सबसे बड़ी ताकत है।

दरअसल, समस्या केवल कानून की नहीं थी बल्कि उस सोच की थी जिसमें राज्य और समाज यह तय करना चाहते थे कि किसी महिला के लिए क्या सही है। अदालत ने इस पितृसत्तात्मक दृष्टिकोण को चुनौती दी है। उसने पूछा है कि यदि कोई वयस्क महिला अपनी इच्छा से देह व्यापार कर रही है तो उसे जबरन “बचाने” की जरूरत क्यों है। यह सवाल बेहद महत्वपूर्ण है क्योंकि इसी के नाम पर वर्षों से पुलिस छापे, हिरासत, उत्पीड़न और सामाजिक अपमान का सिलसिला चलता रहा है।

यह फैसला इस मायने में भी प्रगतिशील है कि उसने कानून और नैतिकता के बीच की दूरी को समझने की कोशिश की है। अदालत ने साफ कहा कि देह व्यापार अपने आप में अवैध नहीं है, जबकि ग्राहकों को बुलाने जैसी गतिविधियां कानून के दायरे में आती हैं। इसके बावजूद व्यवहार में पुलिस और प्रशासन अक्सर हर यौनकर्मी को अपराधी की तरह देखते रहे हैं। अब न्यायालय ने स्पष्ट कर दिया है कि स्वेच्छा से काम कर रही वयस्क महिलाओं की इच्छा और पसंद को सम्मान देना होगा।

हालांकि इस फैसले की वास्तविक सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि सरकार और प्रशासन इसे कितनी गंभीरता से लागू करते हैं। यदि पुलिस की मानसिकता नहीं बदली, यदि सुरक्षित गृह सुधारगृहों की तरह चलते रहे और यदि समाज यौनकर्मियों को अपमान की नजर से देखता रहा, तो केवल न्यायिक टिप्पणियों से हालात नहीं बदलेंगे। फिर भी यह फैसला एक नई शुरुआत है। इसने कम से कम इतना तो स्पष्ट कर दिया है कि हर महिला को अपनी जिंदगी पर निर्णय लेने का अधिकार है और राज्य का काम उसकी गरिमा की रक्षा करना है, न कि उसे नैतिकता के नाम पर नियंत्रित करना।

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