ट्रांसजेंडरों को भी कानून के समान संरक्षण के लिए याचिका पर SC का केंद्र को नोटिस

By प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क | Oct 12, 2020

नयी दिल्ली। उच्चतम न्यायालय ने यौन हिंसा के अपराध के मामलों में ट्रांसजेन्डर समुदाय को भी कानून का समान संरक्षण मुहैया कराने के लिये दायर जनहित याचिका पर सोमवार को केन्द्र से जवाब मांगा। याचिका में दलील दी गयी है कि ट्रांसजेन्डर समुदाय के सदस्यों को यौन हिंसा के अपराधों से संरक्षण के लिये कोई दंडात्मक प्रावधान नहीं है। प्रधान न्यायाधीश एस ए बोबडे, न्यायमूर्ति ए एस बोपन्ना और न्यायमूर्ति वी रामसुब्रमणियन की पीठ ने कहा कि यह अच्छा विषय है जिस पर सुनवाई की आवश्यकता है। पीठ ने अधिवक्ता रीपक कंसल की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता विकास सिंह से कहा कि ऐसे मामलों का विवरण दिया जाये जिनमें न्यायालय ने कानून के अभाव में स्थिति से निबटने के लिये आदेश दिये थे। 

साथ ही आरोप लगाया गया है कि इनमे से किसी भी कानून में ट्रांसजेन्डर, किन्नर और हिजड़ों के बारे में कोई जिक्र ही नहीं है। याचिका में तृतीय लैंगिक श्रेणी में आने वाले लोगों को कानून का समान संरक्षण प्रदान करने का अनुरोध किया गया है। इसमें कहा गया, ‘‘इस अदालत ने ट्रांसजेंडर लोगों को ‘लिंग की तृतीय श्रेणी’ के तहत रखने की घोषणा की है लेकिन उन्हें पुरुष, महिला या अन्य किसी ट्रांसजेंडर द्वारा यौन उत्पीड़न से सुरक्षा प्रदान करने के लिए भारतीय दंड संहिता में कोई प्रावधान या धारा नहीं है।’’ 

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याचिका में केंद्र सरकार को यौन अपराध से जुड़े आईपीसी के प्रावधानों/धाराओं में उचित बदलाव या व्याख्या करने और इसकी परिभाषाओं में ट्रांसजेंडर, ट्रांससेक्शुअल और किन्नरों को शामिल करने का निर्देश देने का अनुरोध किया गया है। याचिका में भारतीय दंड संहिता की धारा 354ए (महिला का शीलभंग करना) के कतिपय उपबंधों की संवैधानिक वैधता को चुनौती देते हुये कहा गया है कि इसकी व्याख्या में यौन हिंसा के शिकार ट्रांसजेन्डर समुदाय के सदस्यों को बाहर रखा गया है जिससे संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 21 का उल्लंघन होता है।

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