By अभिनय आकाश | Oct 03, 2026
दिस नॉनसेंस हैज़ टू स्टॉप। अगर यह नॉनसेंस बंद नहीं हुआ तो यह सारे केस सीबीआई को दिए जाएंगे। यह बातें सुप्रीम कोर्ट ने यूपी पुलिस से कही है। कह सकते हैं कि फटकार लगाई है। देश की सर्वोच्च अदालत यूपी पुलिस के किस रवय से नाराज है, समझते हैं। 30 सितंबर को जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस संजीव सचदेवा की बेंच एक बाइक सवार से जुड़े मामले की सुनवाई कर रही थी। मामला यह है कि एक याचिकाकर्ता ने मौके पर मोटरसाइकिल सवार को पकड़कर पुलिस के हवाले किया था। लेकिन पुलिस ने एफआईआर में आरोपी को अननोन यानी कि अज्ञात बता दिया था। जिस पर जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस संजीव सचदेवा की बेंच ने जांच के तरीकों पर सवाल उठाते हुए कहा हर चीज में आपका कोई ना कोई एजेंडा होता है। अगर आप मामलों को इस तरह से संभालेंगे तो लोग आप पर कैसे भरोसा करेंगे। बेहतर होगा कि हम यूपी पुलिस की सभी जांच सीबीआई को सौंप दें। हम यूपी पुलिस को भंग भी कर सकते हैं। यह नॉनसेंस कहीं ना कहीं रुकनी चाहिए। रिपोर्ट के मुताबिक याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया कि उसने पहले हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। हाई कोर्ट के दखल के बाद पुलिस ने चार्जशीट में आरोपी का नाम शामिल किया। बाद में उसे क्लीन चिट दे दी। याचिकाकर्ता ने यह भी बताया कि पहले बाइक पर कोई नंबर प्लेट नहीं था। लेकिन बाद में उसे अचानक एक रजिस्ट्रेशन नंबर दे दिया गया। यह सभी आरोप सुनने के बाद बेंच ने यूपी पुलिस का पक्ष रख रहे वकील से सवाल पूछा। क्या अज्ञात लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई? जब व्यक्ति को मौके पर ही पकड़ लिया गया था तो आपने अनजान क्यों लिखा? अगर मोटरसाइकिल सवार को मौके पर ही पकड़ लिया गया था तो आपने अज्ञात बाइक सवार के खिलाफ एफआईआर क्यों दर्ज की? लोग पुलिस पर कैसे भरोसा करेंगे? आगे कोर्ट ने यह भी पूछा, आप आरोपी को मौके पर ही पकड़ लेते हैं। लेकिन एफआईआर में उसका नाम नहीं लिखना चाहते। शायद अगर सब कुछ ठीक रहा तो आप नाम बदल सकते हैं। किसी और का नाम डाल सकते हैं। आपको अलग-अलग एफआईआर में आरोपियों की लिस्ट रखनी चाहिए। जिस पर कम एफआईआर हो उसका नाम शामिल कर सकते हैं। क्या वहां ऐसा ही होता है?
पहुंच वाले व्यक्ति को बचाने के लिए पुलिस की कमजोर जांच के कई मामलों की पोल पहले भी अदालतों में खुली है। बुलंदशहर छेड़छाड़ मामले में आरोपी रंगे हाथों पकड़ा गया, लेकिन पुलिस ने हलफनामे में उसे 'अज्ञात' बता दिया। पुलिस आरोपी को बचाना चाहती थी। इसलिए उसने बाइक और शिकायत के समय को लेकर अलग-अलग बातें दर्ज की। ऐसे मामलों से पुलिस पर जनता का भरोसा और कम होता है। सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी इसी ओर इशारा है।