फटे हुए बयान और संस्कारों का मौसम (व्यंग्य)

By संतोष उत्सुक | Apr 22, 2021

यह आज की बात नहीं है, इतिहास गवाह है कि महाजन फटा हुआ बयान भी बांटना शुरू कर दें तो अड़ोस पड़ोस में काफी फर्क पड़ने लगता है। कितनी ही ऐसी चीज़ों की बिक्री और बाज़ार भाव बढ़ जाते हैं जो बरसों से अबिकाऊ रही । फटेहाली भी हाथों हाथ खूब बिकनी शुरू हो जाती है। प्रतिस्पर्धा बढाने के लिए कितने ही दूसरे बयान बाज़ार में आकर कहने लगते हैं, ‘इस तरह का ब्यान उस तरह की ज़बान से शोभा नहीं देता’, लेकिन जब बाज़ार शिक्षक हो सकता है तो शिक्षक बाज़ार का हिस्सा क्यूं नहीं हो सकता। वैसे भी हमारे यहां तो सिर्फ ब्यान ही ज़बान को विशेषज्ञ बना देता है। कुछ ब्यान शौकिया तौर पर टशन के लिए भी तो दिए जा सकते हैं। अब ज़बान है तो हिलना ज़रूरी है और दूसरी ज़बानों को हिलने की प्रेरणा देना भी । ज़बान में उगे संस्कारों की बात कर ली जाए तो संस्कार तो कपड़ों में भी प्रवेश कर जाते हैं और वहां कुछ दिन टिक भी सकते हैं । अच्छे सुगन्धित कपड़ों से, उनकी सौम्य धुलाई में प्रयोग किए जाने वाले वाशिंग पाउडर का नाम जान लिया जाए तो बंदा राजनीति में भी सफल हो सकता है। ऐसे प्रभावशाली वस्त्र पहनने वाले को अविलम्ब संस्कारी मान लेना चाहिए क्यूंकि वो संस्कारी हो सकता है। अलबत्ता यह ज़रूरी नहीं कि सस्ते, फटे, बिना प्रेस किए कपड़े पहनने वाला संस्कारी भी हो । 

- संतोष उत्सुक 

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