Gyan Ganga: माता सीता का दुख देखकर त्रिजटा ने क्या कदम उठाया ?

By सुखी भारती | Feb 15, 2022

श्रीसीता जी ने देखा कि इस वन से भी वीरान तथा डरावनी, शमशान-सी लंका नगरी में, एक त्रिजटा ही मुझे अपनी दिखाई प्रतीत हो रही है। त्रिजटा भी श्रीसीता जी के समीप आकर, उनके विरह के ताप को कम करने का प्रयत्न करती है। लेकिन यह विरह भला त्रिजटा के चँद शब्दों से कैसे मिटने वाला था। श्रीसीता जी ने देखा, त्रिजटा कुछ और नहीं, तो मेरा एक उपकार तो कर ही सकती है। वह यह कि वह मेरे लिए अग्नि का प्रबंध कर सकती है-

मातु बिपति संगिनि तैं मोरी।।

तजौं देह करु बेगि उपाई।

दुसह बिरहु अब नहिं सहि जाई।।’

कितना आश्चर्य से भरा यह क्षण है। वे आदि शक्ति, जिन्हें समस्त जगत हाथ जोड़कर प्रणाम करता है, वे आज स्वयं, एक राक्षसी के समक्ष हाथ जोड़े खड़ी हैं। और उनका दुख इनका गहरा है, कि उनसे सहा भी नहीं जा रहा। श्रीजानकी जी त्रिजटा की मिन्नतें कर रही हैं, कि त्रिजटा उनके लिए क्यों अग्नि का प्रबंध नहीं कर देती। कारण कि वे स्वयं को अग्नि में दग्ध कर सकें। विरह का रोग तब ही तो पीड़ा देगा न, जब तक यह तन की अनिवार्यता है। यह तन ही नहीं रहेगा, तो पीड़ा कहाँ से होगी।

माता सीता जी को मात्र यह दुख होता, तो भी समझ में आता, कि भला श्रीजानकी जी स्वयं को, अग्नि में दग्ध क्यों करना चाहती हैं। कारण कि विरह तो भक्ति के लिए सबसे अनुकूल अवस्था है। गीता में श्रीकुष्ण भी कहते हैं, कि हे अर्जुन! अगर तूने मन को साधना है, तो अभ्यास के साथ-साथ, तूं वैराग्य को धारण कर- ‘अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते।।’ विरह साधक जीवन का एक ऐसा प्रबल पहलू है, कि उसका महात्म सभी महापुरुषों ने गाया है। गुरुवाणी में बाबा फरीद जी भी कहते हैं-

‘बिरहा बिरहा आखीऐ बिरहा तू सुलतानु।

फरीदा जितु तनि बिरहु न ऊपजै सो तनु जाणु मसानु।।’

अर्थात विरह तो स्वयं प्रभु के ही मानिंद है। बाबा फरीद जी तो यहाँ तक घौषणा करते हैं, कि जिस तन में विरह का उदय नहीं हुआ, वह तन तो शमसान के ही समान है। सोचिए! महापुरुषों ने विरह की कितनी महानता गाई है। यहाँ तक कहा गया है, कि विरह युद्ध में प्रयोग होने वाली ढाल के समान है। आपकी तलवार अगर शत्रु पर वार करती है। तो ढाल, आपको शत्रु के जानलेवा प्रहार से बचाती भी है। साधना क्रम में आप विषय रूपी शत्रुयों को, अगर मार भी न पायें, तो कम से कम से इन विषयों के दुष्प्रभाव से बचने का साधन तो आप के पास होना ही चाहिए। और साधना पथ पर, विरह ढाल का ही कार्य करती है। अब क्योंकि रावण ने एक माह की समय सीमा तय कर ही दी है। जिसमें श्रीसीता जी ने रावण को स्वीकार नहीं किया, तो वह श्रीसीता जी का निश्चित ही वध कर देगा। ऐसे में माता सीता जी सोच रही हैं, कि प्रभु भी कैसे बेदर्दी हैं। रावण दुष्ट होकर भी अपने आने की समयसीमा तय करने की घोषणा करके चला गया। और श्रीराम हैं, कि उन्हें प्रभु होकर भी पता नहीं, कि उन्होंने मुझ अबला को कब अंगीकार करना है। प्रभु अगर एक माह के भीतर नहीं आते, तो माह बाद रावण तो निश्चित ही यहाँ आ धमकेगा। उसके प्राणघातक वचन सुनने से तो अच्छा है, कि मैं अपने प्राण ही त्याग दूँ। इसलिए हे सयानी त्रिजटा! तूं काठ की चिता बनाकर सजा दे। फिर उसमें आग लगा दे, ओर मैं उसमें दग्ध हो जाऊँ। इससे कम से कम मेरी प्रीति की रक्षा व निर्वाह तो सत्य सिद्ध हो जायेगा। अन्यथा रावण के शूल के समान दुख देने वाली वाणी, भला अपने कानों से कौन सुनें-

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‘आनि काठ कचु चिता बनाई।

मातु अनल पुनि देहि लगाई।।

सत्य करहि मम प्रीति सयानी।

सुनै को श्रवन सूल सम बानी।।’

माता सीता का दुख देख कर, त्रिजटा ने भी मानों हाथ खड़े कर लिए। और हालात का मुख मोड़ कर, माता सीता को प्रभु का सुयश सुनाने लगी। और कहा, कि हे सुकुमारी! अभी तो बहुत रात्रि हो चुकी है। ऐसे समय में तो आग मिलेगी भी नहीं। यह कह कर त्रिजटा अपने घर चली गई। शोक में डूबी माँ सीता बाँवरी सी हुई, कभी चँद्रमा, तो तारों के समक्ष विनति करती हैं। ओर अब तो वे अशोक वृक्ष को ही प्रार्थना करने लगी, कि हे अशोक वृक्ष! तू ही मेरा शोक हर कर अपना अशोक नाम सत्य सिद्ध कर ले। श्रीसीता जी की यह परम व्याकुल अवस्था देख कर, श्रीहनुमान जी को कल्प के समान दुख हुआ-

‘देखि परम बिरहाकुल सीता।

सो छन कपिहि कलप सम बीता।।’

श्रीहनुमान जी ने हृदय में विचार किया, कि निश्चित ही श्रीसीता जी की पीड़ा अब अपना चरम छू रही है। श्रीसीता जी को कुछ तो ऐसा संबल देना ही पड़ेगा, कि वे स्वयं को सँभाल पाये। यह सोच कर श्रीहनुमान जी ने वृक्ष पर बैठे-बैठे अँगूठी, श्रीसीता जी के श्रीचरणों में डाल दी। श्रीसीता जी ने देखा कि ऊपर से कुछ गिरा है। अवश्य ही अशोक वृक्ष ने ही कोई अँगारा गिरा दिया है। कारण कि मैंने ही तो कहा था-

‘सुनहि बिनय मम बिटप असोका।

सत्य नाम करु हरु मम सोका।।

नूतन किसलय अनल समाना।

देहि अगिनि जनि करहि निदाना।।’

मैंने ही तो कहा था, कि हे अशोक वृक्ष! तेरे नए-नए कोमल पत्ते भी तो अग्नि के समान हैं। तूं ही इनके द्वारा मुझे अग्नि क्यों नहीं दे देती। ताकि मैं स्वयं को अग्नि की भेंट चढ़ा सकूं। लगता है, अशोक वृक्ष ने मेरी सुन ली है। तभी तो ऊपर से कुछ गिरा है। श्रीजानकी जी ने जैसे ही श्रीराम अँगूठी को हाथों में लिया। तो उस अँगूठी में अंकित राम नाम देख उनके आश्चर्य की सीमा न रही। उस सुंदर व मनोहर अँगूठी को पहचान कर, हर्ष और विषाद से हृदय से अकुला उठी-

‘तब देखी मुद्रिका मनोहर।

राम नाम अंकित अति सुंदर।।

चकित चितव मुदरी पहिचानी।

हरष बिषाद हृदयँ अकुलानी।।’

श्रीहनुमान जी ने देखा, कि श्रीसीता जी अँगूठी को देख अतयन्त प्रसन्न हैं। और अब श्रीहनुमान जी एक ऐसा कृत्य करते हैं, जिससे श्रीसीता जी के, विरह से तप्त हृदय में, ठंढक का वास होना आरम्भ होता है। कौन-सा वह कृत्य था, जानेंगे अगले अंक में---(क्रमशः)---जय श्रीराम।

- सुखी भारती

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