संवेदनशील सरकार (व्यंग्य)

By डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ | Nov 05, 2024

हमारे देश की सरकार जितनी संवेदनशील है, उतनी तो शायद गेंडे की खाल भी न हो। आप देखिए, जहाँ आम आदमी अपनी समस्याओं से जूझ रहा है, वहाँ सरकार की संवेदनशीलता उसकी हर बात पर प्रतिक्रिया देती है– वह कभी प्रतिक्रिया न दे, ये कैसे हो सकता है? जनता ने कहा, “साहब, महंगाई बहुत बढ़ गई है, खाने के लिए कुछ सस्ता कर दीजिए।” सरकार तुरंत संवेदनशील हो गई। बोली, “अरे, चिंता मत करो, हम जल्दी ही एक कमेटी बना रहे हैं जो इस पर विचार करेगी। जब तक वो कुछ नहीं करती, तुम खुद ही सस्ते विकल्प ढूंढ लो– जैसे भूख और व्रत।”

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इस पर भी सरकार की संवेदनशीलता रुकी नहीं। एक दिन बेरोजगार युवा आए और बोले, “साहब, नौकरी नहीं मिल रही, क्या करें?” सरकार की संवेदनशीलता फिर जाग गई। बोली, “बेटा, बेरोजगारी तो तुम भी दूर कर सकते हो। देखो, सड़क पर पान की दुकान खोल लो, सब्जी बेच लो या यूट्यूब चैनल शुरू कर दो। आत्मनिर्भरता का ये स्वर्ण युग है।”

सरकार हर किसी की समस्या सुनकर संवेदनशील हो जाती है। जैसे अगर आप बैंक में पैसा डालकर सोचें कि बैंक उसका ब्याज देगा, तो सरकार कहेगी, “हमने तुम्हें सुविधा दी कि तुम बैंक में पैसा डाल सको, अब ब्याज भी चाहिए? इतनी संवेदनशील मत बनो, आत्मनिर्भर बनो।”

और आखिर में, जब आम जनता कहती है कि “साहब, हमारे घर में बिजली नहीं है, पानी नहीं आ रहा, सड़कें टूटी पड़ी हैं,” तो सरकार फिर अपनी संवेदनशीलता से जवाब देती है, “भाई, तुम्हारे पास घर है, ये क्या कम है?”

ये सरकार है, जो हर सवाल का जवाब संवेदनशीलता से देती है। जनता अगर थोड़ा और पूछे तो शायद सरकार कह दे, “तुम्हारी संवेदनाएं हैं, हमसे ज्यादा। चलो, अब तुम ही सरकार चला लो।”

- डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’,

(हिंदी अकादमी, मुंबई से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)

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