By नीरज कुमार दुबे | Jul 04, 2026
जम्मू-कश्मीर की सरकारी शिक्षा व्यवस्था एक बार फिर गंभीर सवालों के घेरे में है। इस बार विवाद किसी प्रशासनिक लापरवाही या अव्यवस्था को लेकर नहीं, बल्कि सीधे तौर पर देश विरोधी सोच को बच्चों तक पहुंचाने के आरोपों को लेकर भड़क उठा है। हम आपको बता दें कि जम्मू-कश्मीर पीपुल्स फोरम ने सनसनीखेज आरोप लगाया है कि समग्र शिक्षा योजना के तहत सरकारी और सरकारी सहायता प्राप्त विद्यालयों की पुस्तकालयों में ऐसी किताब पहुंचाई गई है, जिसमें अलगाववादी नेताओं और आतंक से जुड़े चेहरों को जम्मू-कश्मीर की महान हस्तियों और दिग्गजों के रूप में पेश किया गया है। इस खुलासे के बाद पूरे मामले ने राजनीतिक और सामाजिक तूफान खड़ा कर दिया है।
जम्मू-कश्मीर पीपुल्स फोरम के अनुसार इस किताब में मकबूल भट, सैयद अली शाह गिलानी, शब्बीर अहमद शाह, मसरत आलम भट, मीरवाइज उमर फारूक और मौलवी मोहम्मद फारूक जैसे विवादित और अलगाववादी चेहरों को "महान व्यक्तित्व" बताकर पेश किया गया है। संगठन का आरोप है कि यह सिर्फ इतिहास लेखन नहीं, बल्कि सुनियोजित वैचारिक जहर फैलाने की कोशिश है, जिसका सीधा असर बच्चों और युवाओं के दिमाग पर पड़ सकता है।
मीडिया से बातचीत करते हुए अधिवक्ता रघु मेहता ने इस पूरे प्रकरण को देश विरोधी मानसिकता का खतरनाक उदाहरण बताया है। उन्होंने आरोप लगाया है कि किताब में मकबूल भट को "शहीद मकबूल भट", "शहीद ए आजम" और यहां तक कि "राष्ट्रपिता" तक कहा गया है। इतना ही नहीं, किताब में उसके गुरिल्ला नेटवर्क खड़े करने की गतिविधियों को महिमामंडित किया गया है। सबसे चौंकाने वाली बात यह बताई गई कि जम्मू-कश्मीर को "भारतीय कब्जे वाला कश्मीर" जैसे शब्दों से संबोधित किया गया है, जो सीधे तौर पर भारत की संवैधानिक और राष्ट्रीय स्थिति के खिलाफ माना जा रहा है।
रघु मेहता ने यह भी आरोप लगाया कि किताब में मसरत आलम को बचपन से पत्थरबाज बताया गया है और भारतीय सेना तथा सुरक्षा बलों को "कब्जा करने वाली सेनाएं" कहा गया है। यहां सवाल यह उठ रहा है कि आखिर सरकारी तंत्र के भीतर कौन लोग हैं जिन्होंने ऐसी सामग्री को मंजूरी दी और उसे विद्यालयों तक पहुंचाने की अनुमति दी। क्या यह केवल लापरवाही है या फिर व्यवस्था के भीतर बैठी किसी खतरनाक सोच का परिणाम?
पीपुल्स फोरम ने साफ शब्दों में कहा है कि जिन लोगों ने जिंदगी भर भारत विरोधी एजेंडा चलाया, पाकिस्तान समर्थित अलगाववाद को हवा दी और देश की संप्रभुता को चुनौती दी, उन्हें बच्चों के आदर्श के रूप में पेश करना समाज और राष्ट्र दोनों के खिलाफ अपराध है। संगठन ने पूछा है कि समग्र शिक्षा योजना की विशेषज्ञ समिति आखिर किस आधार पर इस पुस्तक को स्वीकृति दे बैठी। क्या किसी ने किताब की सामग्री की जांच तक नहीं की या फिर जानबूझकर आंखें मूंद ली गईं?
उधर, इस मामले ने अब प्रशासन की भूमिका पर भी गंभीर प्रश्नचिह्न लगा दिए हैं। पीपुल्स फोरम ने मांग की है कि इस किताब की सभी प्रतियां तत्काल विद्यालयों से जब्त की जाएं, पूरी खरीद प्रक्रिया की उच्च स्तरीय जांच कराई जाए और जिन अधिकारियों व समिति सदस्यों ने इसे मंजूरी दी उनके खिलाफ कडी कार्रवाई की जाए। संगठन ने जम्मू-कश्मीर के उपराज्यपाल से भी हस्तक्षेप की मांग करते हुए दोषियों के खिलाफ आपराधिक मुकदमा चलाने की अपील की है।
सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि इतने गंभीर आरोपों के बावजूद जम्मू-कश्मीर प्रशासन की ओर से अब तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। यह चुप्पी सवालों को और गहरा कर रही है। सवाल उठता है कि आखिर बच्चों की शिक्षा के नाम पर सरकारी तंत्र में ऐसा जहर कैसे पहुंच गया? क्या अब स्कूलों की लाइब्रेरी भी वैचारिक युद्ध का मैदान बना दी गई हैं? देखा जाये तो यह विवाद केवल एक किताब का नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों की सोच और देश की एकता से जुड़ा बेहद संवेदनशील मामला बन चुका है।