Sergio Gor के बयान से तिलमिलाये Pakistan ने Trump Administration पर उतारी भड़ास, US Diplomat Natalie Baker को तलब कर थमाया Strong Demarche

By नीरज कुमार दुबे | Aug 20, 2026

सर्जियो गोर के एक बयान ने पाकिस्तान को ऐसा झटका दिया कि इस्लामाबाद ट्रंप प्रशासन पर बुरी तरह भड़क उठा। अमेरिका के भारत में राजदूत और दक्षिण व मध्य एशिया के विशेष दूत सर्जियो गोर ने श्रीनगर पहुंचकर जम्मू-कश्मीर को भारत का “महत्वपूर्ण हिस्सा” क्या बताया, पाकिस्तान की वर्षों पुरानी कूटनीतिक पटकथा ही हिल गई। प्रतिक्रिया इतनी तीखी थी कि पाकिस्तान ने अमेरिकी चार्जे डी'अफेयर्स नताली बेकर को विदेश मंत्रालय तलब कर बाकायदा “स्ट्रॉन्ग डिमार्श” थमा दिया और गोर के बयान को “गैर-जिम्मेदाराना” करार दे डाला। सवाल यह है कि आखिर गोर के शब्दों में ऐसा क्या था जिसने पाकिस्तान को सीधे अमेरिका से भिड़ने के लिए मजबूर कर दिया?

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यही बात पाकिस्तान को सबसे ज्यादा चुभी। इस्लामाबाद ने तुरंत पुराना राग छेड़ते हुए जम्मू-कश्मीर को “अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त विवादित क्षेत्र” बताया और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्तावों तथा “कश्मीरी लोगों की आकांक्षाओं” का हवाला दिया। पाकिस्तान का आरोप था कि गोर की टिप्पणी अमेरिका की पुरानी स्थिति के विपरीत है। यानी जिस वाशिंगटन से पाकिस्तान दशकों से कश्मीर पर अंतरराष्ट्रीय दखल, मध्यस्थता और भारत पर दबाव की उम्मीद लगाए बैठा था, उसी अमेरिकी प्रशासन के एक प्रमुख प्रतिनिधि ने श्रीनगर में जाकर ऐसी भाषा बोल दी जिसने इस्लामाबाद की कूटनीतिक बेचैनी बढ़ा दी।

इस घटनाक्रम का सामरिक महत्व बेहद बड़ा है। भारत लगातार यह स्पष्ट करता रहा है कि जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है और इससे जुड़ा कोई भी लंबित मुद्दा भारत और पाकिस्तान के बीच द्विपक्षीय है। भारत ने तीसरे पक्ष की मध्यस्थता को हमेशा खारिज किया है। इसके उलट पाकिस्तान का पूरा प्रयास कश्मीर को लगातार अंतरराष्ट्रीय मंचों पर जीवित विवाद के रूप में पेश करने का रहा है। गोर का “इंपॉर्टेंट पार्ट ऑफ इंडिया” वाला बयान, यदि वाशिंगटन की व्यापक नीति में किसी बदलाव का संकेत साबित होता है, तो यह पाकिस्तान की इसी रणनीति पर सीधा प्रहार होगा।

हालांकि यहां कूटनीतिक सावधानी भी जरूरी है। पूर्व विदेश सचिव कंवल सिब्बल ने इस बयान को महत्वपूर्ण बताया है, लेकिन यह संभावना भी जताई कि गोर अपने औपचारिक निर्देशों से आगे निकल गए हों और पाकिस्तान को शांत करने के लिए अमेरिका बाद में अपना पुराना रुख दोहरा सकता है। यही कारण है कि भारत के लिए केवल एक बयान को अंतिम अमेरिकी नीति परिवर्तन मान लेना जल्दबाजी होगी। फिर भी, यह टिप्पणी उस पृष्ठभूमि में बेहद मायने रखती है जिसमें अमेरिका के पिछले रुख में अक्सर “कश्मीरी लोगों की इच्छाओं” जैसी भाषा दिखाई देती रही है और स्वयं डोनाल्ड ट्रंप कई मौकों पर कश्मीर पर मध्यस्थता की पेशकश कर चुके हैं।

लेकिन इस पूरे विवाद का एक दूसरा और शायद ज्यादा दिलचस्प रणनीतिक पहलू पाकिस्तान की गोर से सीधी भिड़ंत है। गोर दक्षिण और मध्य एशिया के विशेष दूत भी हैं और उनके दायरे में पाकिस्तान भी आता है। ऐसे में पाकिस्तान ने जिस तीखे तरीके से उन्हें निशाने पर लिया है, उससे गोर के लिए पाकिस्तान संबंधी कूटनीतिक भूमिका और मुश्किल हो सकती है। सिब्बल ने भी इसी ओर इशारा करते हुए कहा कि पाकिस्तान ने गोर पर जिस तरह हमला किया है, उससे वह नाराज हो सकते हैं और यह भारत के लिए अच्छी बात है।

इसका सीधा लाभ यह हो सकता है कि अमेरिका-पाकिस्तान समीकरण में पैदा होने वाली खटास वाशिंगटन को दक्षिण एशिया में अपनी प्राथमिकताओं पर नए सिरे से विचार करने के लिए प्रेरित करे। पाकिस्तान लंबे समय से अमेरिकी मध्यस्थता की उम्मीद पर कश्मीर नैरेटिव को अंतरराष्ट्रीय बनाने की कोशिश करता रहा है। लेकिन अगर ट्रंप प्रशासन के प्रभावशाली चेहरे के साथ ही उसका टकराव गहराता है, तो इस्लामाबाद की वाशिंगटन लॉबिंग कमजोर पड़ सकती है और भारत के लिए अमेरिका के साथ रणनीतिक संवाद को मजबूत करने की गुंजाइश बढ़ सकती है।

हम आपको यह भी बता दें कि दक्षिण एशिया विशेषज्ञ माइकल कुगेलमैन ने भी गोर की टिप्पणी को भारत-अमेरिका संबंधों को सुधारने की दिशा में मददगार बताया है। उन्होंने कहा है कि दिल्ली आने के बाद गोर भारत के साथ रिश्तों को सुधारने के लक्ष्य पर काम कर रहे हैं और यह बयान उस प्रयास को निश्चित रूप से मजबूती दे सकता है। हालांकि उन्होंने यह चेतावनी भी दी कि यदि यह वास्तव में अमेरिकी नीति का संकेत है, तो यह वर्षों पुराने अमेरिकी रुख से अलग होगा और पाकिस्तान के साथ दोबारा मजबूत हो रहे संबंधों को प्रभावित कर सकता है।

साथ ही गोर के दौरे का आर्थिक और सुरक्षा संबंधी संदेश भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। अमेरिका फिलहाल जम्मू-कश्मीर के लिए “लेवल-4: डू नॉट ट्रैवल” एडवाइजरी बनाए हुए है, जो अंतरराष्ट्रीय पर्यटन के लिए बड़ी बाधा रही है। पिछले वर्ष पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद सुरक्षा चिंताएं और बढ़ी थीं। अब गोर का यह कहना कि अमेरिकी प्रशासन ट्रैवल चेतावनी को कम करने की संभावना पर विचार करेगा, जम्मू-कश्मीर के लिए बड़ा अवसर बन सकता है। यदि एडवाइजरी में ढील मिलती है तो इसका संदेश केवल पर्यटकों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि यह क्षेत्र की सुरक्षा स्थिति पर अमेरिकी भरोसे का अंतरराष्ट्रीय संकेत होगा।

मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने भी गोर के साथ पर्यटन, बागवानी और नई अर्थव्यवस्था जैसे क्षेत्रों में जम्मू-कश्मीर और अमेरिका के बीच संबंधों को व्यापक और गहरा करने पर चर्चा की। ऐसे समय में जब पर्यटन से हजारों परिवारों की रोजी-रोटी जुड़ी है और पीडीपी प्रमुख महबूबा मुफ्ती भी अमेरिकी ट्रैवल एडवाइजरी की समीक्षा की मांग कर चुकी हैं, किसी संभावित बदलाव का आर्थिक असर व्यापक हो सकता है।

कुल मिलाकर, श्रीनगर में सर्जियो गोर का दौरा पाकिस्तान के लिए सिर्फ एक कूटनीतिक झटका नहीं, बल्कि उसके वर्षों पुराने कश्मीर नैरेटिव पर सीधा प्रहार है। पाकिस्तान ने अमेरिकी अधिकारी को तलब कर अपनी नाराजगी तो दर्ज करा दी, लेकिन इस आक्रामक प्रतिक्रिया ने यह भी साफ कर दिया कि गोर के शब्द इस्लामाबाद को कितनी गहराई तक चुभे हैं। अब नजर इस बात पर रहेगी कि क्या ट्रंप प्रशासन गोर की टिप्पणी को आगे की नीति में बदलता है या पाकिस्तान को शांत करने के लिए पुराने अमेरिकी रुख की ओर लौटता है। लेकिन फिलहाल इतना तय है कि श्रीनगर से निकला यह संदेश भारत के लिए रणनीतिक, कूटनीतिक और आर्थिक, तीनों मोर्चों पर संभावित लाभ का दरवाजा खोलता है, जबकि पाकिस्तान के सामने सवाल यह खड़ा कर देता है कि अमेरिका से भिड़कर उसने अपनी ही कूटनीतिक जमीन तो और कमजोर नहीं कर ली है।

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