लोकतंत्र पर भीड़तंत्र के हावी होने का संकेत है शाहीन बाग और ज्ञानवापी प्रकरण

By नीरज कुमार दुबे | May 10, 2022

क्या शाहीन बाग देश का हिस्सा नहीं है? क्या शाहीन बाग में देश का कानून लागू नहीं होता? क्या शाहीन बाग का भीड़तंत्र देश के कानून को खुली चुनौती नहीं दे रहा? यह सब सवाल उठाये हैं दक्षिणी दिल्ली नगर निगम के मेयर मुकेश सूर्यान ने। जिस तरह नगर निगम के दस्ते को अतिक्रमण हटाये बगैर शाहीन बाग से लौटना पड़ा वह दर्शाता है कि इस इलाके के भीड़तंत्र ने यह ठान लिया है कि इस इलाके में वही होगा जो वह चाहेंगे। सोशल मीडिया पर ऐसे वीडियो की भरमार है जिसमें यहां के लोग अतिक्रमण विरोधी कार्रवाई करने की हिम्मत दिखाने के लिए सरकार और प्रशासन को खुली चुनौती देते हुए देखे जा सकते हैं। ऐसे में सोमवार को जो कुछ भी हुआ उस पर ज्यादा आश्चर्य नहीं होना चाहिए। टीवी पर पूरे देश ने देखा कि कैसे सुरक्षा बलों की बड़ी संख्या में तैनाती के बावजूद प्रशासन कोई कार्रवाई नहीं कर पाया।

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सबको समझना होगा कि नगर निगम की कार्रवाई किसी धर्म विशेष के खिलाफ नहीं की जा रही है। यदि अतिक्रमण नहीं हटाये जायेंगे तो ट्रैफिक जाम से कैसे निजात मिलेगी? यदि अतिक्रमण नहीं हटाये जायेंगे तो जरूरत पड़ने पर एंबुलेंस या फायर टेंडर कैसे गलियों में घुस पायेंगे? यदि घुसपैठियों की पहचान नहीं की जायेगी तो कल को वह आपके लिए भी समस्या पैदा कर सकते हैं या उनके गलत कार्यों के चलते आप कानूनी पचड़े में फंस सकते हैं? यदि घुसपैठिये यहां बसते जाएंगे तो आपके हिस्से के संसाधनों पर धीरे-धीरे अपना हक जताने लग जाएंगे? अभी जिनको यह सब कार्रवाई किसी धर्म विशेष विरोधी लग रही है उन्हें जब यह समझ आयेगा कि उन्होंने अपने क्षेत्र के विकास और अपने बच्चों के भविष्य की राह में रोड़े अटकाये हैं तब तक बहुत देर हो चुकी होगी।

लेकिन सवाल यही है कि शाहीन बाग के लोगों को समझाये कौन? आपको ध्यान होगा कि संशोधित नागरिकता कानून के खिलाफ शाहीन बाग में चले आंदोलन के दौरान यहां के लोगों ने ना तो सरकार की सुनी थी और ना ही सुप्रीम कोर्ट की। सुप्रीम कोर्ट की मध्यस्थता कमेटी शाहीन बाग के आंदोलनकारियों को समझाने में नाकाम रही थी। देखा जाये तो शाहीन बाग जैसे कई इलाके अब राजधानी दिल्ली में ही हो गये हैं जहां आबादी अनुपात बुरी तरह बिगड़ा हुआ है। माना जाता है कि ऐसे इलाकों में हो रहे गलत कार्यों पर कार्रवाई करने से पहले पुलिस को भी सोचना पड़ता है। हाल ही में जहांगीरपुरी में सबने देखा कि कैसे छतों पर से पत्थर बरसाये जा रहे थे। यदि आबादी के बिगड़े अनुपात वाले इलाकों में एक सर्च ऑपरेशन चला लिया जाये तो घरों या छतों से ऐसी ही सामग्री बरामद होगी।

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यही नहीं ज्ञानवापी मामला देखिये। यहां अदालत ने ज्ञानवापी मस्जिद परिसर में जो सर्वे करने का आदेश दिया था उस कार्य में बाधा डाली गयी। यह जानते हुए कि सर्वे टीम आ रही है, बड़ी संख्या में वहां लोग एकत्रित हो गये। अदालत द्वारा नियुक्त कमिश्नर हिंदू और मुस्लिम पक्षों के वकीलों के साथ ज्ञानवापी-श्रृंगार गौरी मंदिर परिसर के अंदर गए, लेकिन करीब दो घंटे अंदर बिताने के बाद सर्वे टीम बिना काम किए ही बाहर आ गयी क्योंकि कथित रूप से मुसलमानों ने टीम को अदालत के आदेश के अनुसार वीडियोग्राफी और सर्वे कार्य करने के लिए मस्जिद क्षेत्र में जाने की अनुमति ही नहीं दी। यहां जिस तरह अदालती आदेश की राह में भीड़तंत्र आया वह साबित करता है कि ऐसे संवेदनशील मामलों में कार्रवाई के समय सरकारों को और सतर्कता बरते जाने की जरूरत है।

बहरहाल, लोकतंत्र पर भीड़तंत्र के हावी होने के कई उदाहरण हैं। अभी पिछले साल ही मोदी सरकार ने तीन कृषि सुधार कानूनों को भीड़तंत्र की वजह से ही वापस लिया था। तीन कृषि सुधार कानून किसानों के हित में थे इस बात की पुष्टि उच्चतम न्यायालय द्वारा नियुक्त विशेषज्ञ समिति ने भी की थी। लेकिन उसके बावजूद भीड़तंत्र ने जिस तरह देश का माहौल बिगाड़ा उसको देखते हुए सरकार ने देशहित में उन कानूनों को ही वापस लेने में भलाई समझी। यही नहीं हाल ही में रामनवमी पर्व के दौरान जिस तरह कई राज्यों में हिंसा हुई और मीडिया रिपोर्टों से जो चीजें सामने आईं वह भी भीड़तंत्र की बढ़ती हिम्मत का ही सूचक है। यह सब घटनाएं यकीनन देश का माहौल खराब कर रही हैं। केंद्र और राज्य सरकारों को चाहिए कि इस मामले में एकजुटता दिखाते हुए कार्रवाई करें। साथ ही धर्मगुरुओं के माध्यम से समाज के लोगों को समझाया जाना चाहिए कि विकास कार्यों को धर्म के चश्मे से नहीं देखा जाये और महामारी के बाद तेजी से आगे की राह पर दौड़ रही भारतीय अर्थव्यवस्था को पटरी से उतारने की ताकतों को सफल नहीं होने दिया जाये।

-नीरज कुमार दुबे

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