दुष्टों को मार भक्तों की रक्षा करती हैं मां कालरात्रि

By प्रज्ञा पाण्डेय | Oct 05, 2019

दुर्गा के सातवें रूप को मां कालरात्रि के नाम से जाना जाता है। नवरात्र के सातवें दिन इनकी पूजा होती है। देवी कालरात्रि दुष्टों को मार कर भक्तों की रक्षा करती हैं, तो आइए हम आपको मां कालरात्रि की महिमा तथा पूजन विधि के बारे में बताते हैं।

मां कालरात्रि का स्वरूप

नवरात्र के सातवें दिन साधक को अपना चित्त भानु चक्र में स्थिर कर पूजा करनी चाहिए। इसके लिए ब्रह्मांड की सभी सिद्धियों के द्वार खुलने लगते हैं। देवी कालरात्रि को व्यापक रूप से माता देवी- भद्रकाली, काली, महाकाली, भैरवी, मृत्यु, रुद्राणी, चामुंडा, दुर्गा और चंडी कई नामों से जाना जाता है। रौद्री और धुमोरना देवी कालारात्री के अन्य नाम हैं। काली और कालरात्रि एक दूसरे के परिपूरक होती हैं। ऐसी मान्यता है कि देवी के इस रूप से सभी राक्षस, भूत, प्रेत, पिशाच और नकारात्मक ऊर्जाओं का नाश होता है।

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मां कालरात्रि की पूजा विधि

नवरात्र में मां कालरात्रि की विशेष रूप से आराधना की जाती है। देवी को प्रसन्न करने के लिए जातक पूजा करते समय लाल, नीले या सफेद रंग के कपड़े पहन सकते हैं। मां कालरात्रि की प्रातः काल सुबह चार से 6 बजे तक करनी चाहिए। जीवन की कठिनाइयों को कम करने के लिए सात या सौ नींबू की माला देवी को अर्पित कर सकते हैं। सप्तमी की रात में तिल या सरसों के तेल की अखंड ज्योति जलाएं। इसके अलावा अर्गला स्तोत्रम, सिद्धकुंजिका स्तोत्र, काली चालीसा और काली पुराण का पाठ करना चाहिए। सप्तमी की पूरी रात दुर्गा सप्तशती का पाठ करें। देवी कालरात्रि की पूजा करते समय इस बात का ध्यान रखें जिस स्थान पर मां कालरात्रि की मूर्ति है उसके नीचे काले रंग का साफ कपड़ा बिछा दें। देवी की पूजा करते समय चुनरी ओढ़ाकर सुहाग का सामान चढ़ाएं। इसके बाद मां कालरात्रि की मूर्ति के आगे दीप जलाएं।

मां कालरात्रि का महत्व 

देवी कालरात्रि ने राक्षसों के राजा रक्तबीज को मारने के लिए अवतार लिया था। मां की आराधना से घर में सुख-समृद्धि आती है। मां कालरात्रि का रूप भयानक है, लेकिन वह अपने भक्तों को शुभ फल देती हैं। देवी कालरात्रि को याद करने से राक्षस, दानव, दैत्य, भूत-प्रेत डरकर भाग जाते हैं। दुष्टों का दूर भगाने वाली मां कालरात्रि ग्रह बाधाओं को भी खत्म करती हैं।

मां कालरात्रि से जुड़ी कथा

पौराणिक कथा के अनुसार शुंभ-निशुंभ और रक्तबीज नाम के राक्षसों ने तीनों लोकों में सबको दुखी किया था। परेशान होकर अंत में सभी देवता शिव जी के पास गए। शिव जी ने भक्तों की दशा देखकर देवी पार्वती को राक्षसों को मारने को कहा। शिव जी के आदेश पर पार्वती जी ने दुर्गा का रूप धारण किया और शुंभ-निशुंभ को मार दिया। लेकिन देवी दुर्गा ने रक्तबीज को जब मारा तो उसके शरीर से लाखो रक्तबीज पैदा हुए। इसे देखकर दुर्गा जी ने अपने तेज से कालरात्रि को उत्पन्न किया और जब दुर्गा जी ने रक्तबीज को मारा तो उसके शरीर से निकलने वाले रक्त को कालरात्रि ने अपने मुख में भर लिया। इसके बाद सबका गला काटते हुए रक्तबीज का वध कर दिया।

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मां का पसंदीदा भोग

मां कालरात्रि को प्रसन्न करने के लिए सप्तमी के दिन भगवती को गुड़ का नैवेद्य अर्पित करके ब्राह्मण को दान देना चाहिए। ऐसा करने से कोई दुख नहीं होता है।

प्रज्ञा पाण्डेय

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