By Neha Mehta | Aug 16, 2026
बॉलीवुड की दिग्गज अभिनेत्री शर्मिला टैगोर और पूर्व भारतीय क्रिकेट कप्तान मंसूर अली खान पटौदी की शादी हमेशा से ही लोगों के बीच चर्चा का विषय रही है। दोनों ने अलग-अलग धर्मों से होने के बावजूद साथ जिंदगी बिताने का फैसला किया और शादी के बाद उनके तीन बच्चे हुए—सैफ अली खान, सोहा अली खान और सबा पटौदी। अब उनकी बेटी सबा पटौदी ने अपने बचपन और घर के माहौल को लेकर कुछ ऐसी बातें साझा की हैं, जो इस परिवार की सोच और परवरिश की एक अलग तस्वीर सामने रखती हैं। हाल ही में यूट्यूब चैनल Big Bollywood Buff से बातचीत के दौरान सबा ने बताया कि उनकी परवरिश इस्लाम को समझते हुए हुई, लेकिन उनकी मां शर्मिला टैगोर ने कभी बच्चों पर किसी खास धार्मिक सोच को थोपने की कोशिश नहीं की।
सबा ने साफ किया कि उनकी मां ने उन्हें इस्लाम, रमजान और उससे जुड़ी परंपराओं के बारे में बताया, लेकिन आगे क्या मानना है और किस तरह अपनी जिंदगी जीनी है—यह फैसला बच्चों पर छोड़ दिया। उनके लिए धर्म किसी पर थोपी जाने वाली चीज नहीं है। बचपन में मिली धार्मिक समझ ने उन्हें अपनी आस्था से जुड़ने में मदद जरूर की, लेकिन परिवार में इस बात की पूरी गुंजाइश थी कि हर व्यक्ति अपनी राह खुद चुने। सबा ने यह भी बताया कि उनके भाई-बहनों की जिंदगी में भी धर्म को लेकर कोई बेहद सख्त नियम नहीं रहे। परिवार में अलग-अलग त्योहारों को मनाने की परंपरा रही है और क्रिसमस से लेकर दिवाली और होली तक, कई मौकों पर पूरा परिवार साथ नजर आता था।
सबा के मुताबिक, उनके परिवार की खूबी यही रही कि अलग-अलग धार्मिक पृष्ठभूमि के बावजूद त्योहार और खुशियां सबके साथ साझा की जाती थीं। यही वजह है कि उनके बचपन में धार्मिक पहचान के साथ-साथ दूसरे समुदायों की परंपराओं को जानने और उनका सम्मान करने का माहौल भी रहा। सबा खुद अपनी आस्था से जुड़ी हुई हैं, लेकिन वह मानती हैं कि परिवार के हर सदस्य का विश्वास एक जैसा होना जरूरी नहीं है। उनके भाई-बहनों की शादियां भी अलग धार्मिक पृष्ठभूमि में हुई हैं और किसी ने भी धर्म को लेकर बेहद सख्त रवैया नहीं अपनाया।
शर्मिला टैगोर और मंसूर अली खान पटौदी की शादी के करीब पांच दशक बाद भी उनके परिवार की परवरिश से जुड़ी ये बातें इसलिए दिलचस्प हैं, क्योंकि इसमें धार्मिक पहचान के साथ व्यक्तिगत पसंद और दूसरे विश्वासों के सम्मान—दोनों के लिए जगह दिखाई देती है। सबा की बातों से यही सामने आता है कि उनके घर में धर्म को एक सीख और निजी विश्वास के तौर पर देखा गया, किसी मजबूरी या नियम की तरह नहीं।